Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal-Rajasthan


आतिशबाजी खत्म होते ही सब लोग एक साथ उठ खड़े हुए। पांच-सात हजार लोग और बाग की संकड़ी संकड़ी राहें सभी अप्रतिम अनुशासन का परिचय देते हुए आगे बढ़ रहे थे, मजाल है जो किसी एक भी व्यक्ति का पांव किसी क्यारी में पड़ जाये। हमारे यहां तो उद्यानों का उपयोग नेताओं की बड़ी बड़ी रैलीयों में होता है, जब रैली खत्म होती है तो भीड़ समूचे बाग की क्यारियों को रौंदते हुए पूरे बाग को तहस नहस कर देती है।
यहां एक बात समझ में नहीं आ रही थी कि, इतने सारे लोग एक साथ बाग से निकल रहे थे फिर भी लाईटें पूरी नहीं थी। लोग अंधेरे में ही एक दूसरे के पीछे चलते हुए आगे बढे जा रहे थे बाग बहुत बड़ा था, ढेर सारे रास्ते थे, कई रास्ते बाग में ही घूमने के थे, लोगों का हुजुम इन रास्तों पर चल जाये तो बाग में ही घूमता रहे। इसके लिये बाग वालों ने जगह जगह अपने स्वयंसेवक खड़े कर दिये थे। इनके हाथों में एक बहुत बड़ा बिजली का डण्डा था, इस डण्डे को हिला हिला कर वे भीड़ को निर्देशित कर रहे थे कि इधर आना है।
हम उद्यान के महकते फूलों के बीच से गुजर रहे थे। आते वक्त इस महक का नही हुआ था मगर लौटते हुए रात की इस नीरवता में तरह तरह के फूलों सुगन्ध मादक किये जा रही थी। दरअसल बुचार्ट परिवार बाग के विकास में न भी अत्यधिक ध्यान देते हैं। इसके लिये वे दुनिया के कोने कोने से विभिन्न के फूलों के पौधे मंगवाते हैं। तरह तरह के फूलों को मिला कर नई तरह के फूलों की संकर पौध तैयार करने का परीक्षण भी यहां किया जाता रहता है। अकेले ब की यहां सैकड़ों किस्में होंगी। इन फूलों के रख रखाव के लिये चोटि के माली जाते हैं। यो बाग ही क्या जिसका कोई माली नहीं हो। हमारे यहाँ का गुलाब बाग ऐसा ही बना है. यहां कोई माली ही नहीं, माली तो छोड़ो एक मजदूर तक इतने बड़े बाग में कहीं दिखाई नहीं देता है। हाजरियों में जरूर माली भी होंगे, मजदूर भी होंगे, तनखा भी उठाते होंगे मगर सब ड्यूटी करते हैं साहब लोगों के घरों के बगीचे है। ऐसे में बाग तो उजड़ेगा ही।
भीड़ अधिक थी। चेतावनी के बावजूद भी गलत रास्ते पर निकल गई थी। स्वयंसेवकों को दौड़ दौड़ कर वापस उन्हें निकास के सही रास्तों की ओर मोड़ना यह रहा था। बाग में कई स्थानों पर अत्याकर्षक रोशनी भी की हुई थी, अंधेरा रखने का कारण इस रोशनी को और अधिक चमकाना भी हो सकता है। जगह जगह बिजली की रोशनी से नहाए फव्वारे मन मोह रहे थे। बाद में कई रेस्टोरेन्ट और गिफ्ट शोप आये, सब ग्राहकों से अटे पड़े थे। हमारा तो जहाज रवाना होने वाला था इसलिये समय पर पहुँचना जरूरी था। मुनीश को टेन्शन हो रही थी कि देरी हो गई तो जहाज हमें छोड़ कर चला नहीं जाये। जिस बस में हम लौटने वाले थे उस बस में हमारे जहाज के कई यात्री थे इसलिये एसा तो संभव नहीं था पर सबको जल्दी मच ही रही थी।
बस हमारा इन्तजार कर रही थी। हमारे पहुँचने तक लगभग सभी यात्री अपनी अपनी सीटों पर बैठ चुके थे ड्राइवर ने अब सबकी हाजरी लेना शुरू कर दिया। दो यात्री अभी भी कम थे। ड्राइवर बाहर खड़ा होकर उन्हें तलाशने लगा। बसें इतनी अधिक थी कि यात्रियों का इधर उधर भटक जाना बहुत आसान था। दोनों यात्री कहीं किसी अन्य बस के आस पास हमारी बस को नहीं तलाश रहे हों। तभी एक दम्पत्ति बस के पास आई। ये भारतीय थे। ड्राइवर से उनका नाम पूछ पुष्टि होने के बाद इन्हें बस में चढ़ाया। सभी यात्रियों ने तालियां बजा कर इनका स्वागत किया और बस चल पड़ी।
लौटते वक्त भी ड्राइवर का विक्टोरिया के बारे में बखान करना जारी था मगर सब थके हुए थे इसलिये किसी की इसमें दिलचस्पी नहीं थी। आगे बैठे कुछ लोगों ने मना कर दिया तो वह चुप भी हो गया। बस की बत्तियां बुझा दी गई, अब तक कई लोग नींद के आगोश में जा चुके थे, जो नहीं गये थे वे भी अब झोंके लेने लगे। जहाज तक पहुंचे जितने बस खर्राटों की जुगल बन्दी और समवेत स्वरों से गुंजायमान हो गई थी।
प्रीति को जहाज की कम्बले वापस लौटाने की चिन्ता थी। मुनीश ने कहा कि कम्बले कमरे में ही छोड़ देंगे, हाउसकिपींग वाले वहां से ले लेंगे। अब तक सब तेज भूख लग आई थी। हाइनिंग हाल कब का बन्द हो चुका था। कैफेटेरिया में जरूर चाय काफी और हल्का फुल्का नाश्ता मिल रहा था। यही सोच कर कि वहा कुछ खा लेंगे, हम सब केफेटेरिया की तरफ बढे ।
सुबह 7 बजे ही जहाज सीयाटल में लंगर डाल देने वाला था। हमें अपना चेक इन का सामना पेक करके रात को ही कमरों के बाहर रख देना था। इसके लिये हर कमरे में सामान के टेग भेज दिये गये थे। खाने से निपट कर पेकिंग कर सामान बाहर रखने का टेन्शन अलग था। हमारी तकदीर तेज थी, ज्यू ही केफेटेरिया में कदम रखा, सामने ही पीटर नजर आ गया। हम कुछ कहें उसके पहले ही वह बोल उठा, उसके पास कुछ इण्डियन खाना बचा है, खाना हो तो लेकर आउं ?
नेकी और पूछ पूछ ... अंधे को क्या चाहिये ? दो आंखें ! हमने झट से हां कर दी. वह एक वेटर को अपने साथ लेकर गया और 8-10 मिनट में दोनों अपने हाथों में होंगे, प्लेटें वगैरा भरकर हमारी तरफ आये। हमने छक कर भोजन किया, जब भूख हो तो इसका आनन्द ही द्विगुणित हो जाता है।
मुझे तो कुछ पेकिंग करनी थी नहीं, दरअसल मैं कहीं भी जाता हूं तो अपने सामान का बिखेरा नहीं करता, मेरा सारा सामान अटेची में ही पड़ा रहता है, नये ह या मैले अटेची बन्द की और हो गई पेकिंग। राजा को खाने के बाद बाहर डेक पर बैठना था इसलिये हम दोनों उपर ही रूक गये। राजा की भी कोई खास पेकिंग थी नहीं। प्रीति व मुनीश अपने कमरे में चले गये। हम लौटे जितने इनका सामान कमरे के बाहर पड़ा हुआ नजर आया, टेग वेग लगाकर एकदम दुरस्त। हम भी कमरे में गये और अटेची पेक कर ली, आवश्यक सामान हेण्ड बेग के लिये छोड़ दिया। हमने भी ग लगा कर अपनी अटेचियां कमरे के बाहर छोड़ दी।
क हफ्ते की घटनापूर्ण जहाज यात्रा की यह अन्तिम रात्रि थी। सुबह उठने श्री क्यूंकि हम कार किराये लेकर वापस कनाडा जाने वाले थे मगर मुनीश- की उड़ान सुबह 11 बजे थी। बन्दरगाह से उन्हें सीधे एयरपोर्ट जाना था इसलिये इनको जहाज से जल्दी से जल्दी उतरने की कोशिश थी।
सुबह नींद खुली तो सामने ही सीएटल के माउन्ट रेनियर के दर्शन हो गये।। जैसे घर वापस लौट आये हों। मेरा सीएटल से क्या लेना-देना फिर भी इतने अल्प समय में इससे एसा अपनापा हो गया। कमरों के बाहर रखा सामान रात एसा लगा को ही जा चुका था। नहा धोकर तैयार हुए और हाथ का सामान ले कमरों से बाहर निकले। कम्बले कमरे में ही छोड़ दी थी। जहाज के गलियारे लौटते यात्रियों से अटे हे थे। सब एक दूसरे से विदा ले रहे थे। यात्रा सुखद तथा निर्विघ्न रहने की अनुभूति एक दूसरे से बांट रहे थे।
जहाज के गंग प्लेन्क से उतर कर उसी स्थान पर पहुंचे जहां हमारी चेक इन हुई थी और मेरा पासपोर्ट ले लिया गया था। यहां एस्केलेटर से उतर कर वापस उसी बड़े हाल में पहुंचे। इस बार इस हॉल में सभी का चेक इन सामान करीने से लगाया हुआ था। सामान का क्रम कमरों के अनुसार था इसलिये अपना अपना सामान ढूंढने में कोई दिक्कत नहीं हुई।
Editorial

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