Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal-Rajasthan


मैं जहां बैठा था उसके सामने बहुत बड़ा लॉन था, यहां कुर्सियां लगी हुई थी, सब भरी हुई थीं, लोग कम्बल बिछाकर लॉन पर भी बैठे थे। कई लोग अपने साथ फोल्डिंग कुर्सियां लेकर आये थे, वही खोल कर बैठे थे, कई वृद्ध लोग पर भी बैठे थे। पूरा लॉन खचाखच भरा था। लॉन के सामने अत्यन्त सुन्दर पेवेलियन बना हुआ था, यहां दो गायक कोई गीत गा रहे थे, पास ही बहुत बड़े बड़े स्पीकर पड़े थे जिससे गीतों की आवाज समूचे प्रांगण में गुंजायमान हो रही थी। गीत जरूर अत्यन्त लोकप्रिय रहा होगा क्यूंकि चलते फिरते लोग तक गायक के साथ स्वर मिला कर गाये जा रहे थे।
हमें कम्बल बिछा कर यहीं बैठना है या कहीं ओर, मुझे पता नहीं था, प्रीति वगैरह पीछे रह गये थे, अगर यहीं कम्बलें बिछानी है तो अभी भी कुछ हिस्सा खाली नजर आ रहा था, कहीं और बिछानी है तो यहां बैठने की बजाये वहीं जाकर बैठते थोड़ी देर में ये लोग भी आ गये, बेन्थ सड़क किनारे ही थी इसलिये सबकी मुझ पर नजर पड़ गई। मुझे बैठा देख उन्हें तसल्ली हो गई क्यूंकि बाग में भीड़ इतनी थी कि कहीं बैठने का स्थान मिल जाना बहुत बड़ी बात थी।
मैंने इनसे पूछा कि आतिशबाजी के लिये यहीं बैठना है तो इन्हें भी पता नहीं था। लोगों की भीड़ इस स्थान से आगे की तरफ जा रही थी, मुनीश ने कहा यहां तो कन्सर्ट हो रहा है, आतिशबाजी का मैदान जरूर आगे कहीं होगा। हम सब लोग 'आगे बढ़े। कम्बलों का बैग प्रीति ने उठा लिया। आगे फायर वर्क्स के निशान बने हुए थे, हम उन्हीं के सहारे सहारे आगे बढ़ने लगे। बाग बहुत बड़ा था, चल चल कर थक गये तभी सामने एक बोर्ड दिखाई दिया जिस पर लिखा था यहां से आंशिक आतिशबाजी देखी जा सकती है। यह स्थान एकदम खाली था, मैंने कहा यही बैठ जाते हैं। यह हिस्सा साईड में था जिससे यहां आतिशबाजी पूरी नजर नहीं आती, मैंने कहा आतिशबाजी तो वैसे भी उपर होती है, यह तो कहीं से भी नजर आ जायेगी। मुनीश समझ रहा था कि मैं और चलना नहीं चाहता। उसने कहा थोड़ा और चलेंगे तो एकदम सामने पहुँच जायेंगे।
अन्ततः हम आतिशबाजी के मैदान में पहुँचे। यह बहुत बड़ा प्रांगण था, पूरा मैदान हरी हरी घास से ढका हुआ था, पहले ही हजारों की संख्या में लोग अपनी पदरे, कम्बल बिछाकर यहां बैठे हुए थे। आतिशबाजी देखने का श्रेष्ठ स्थान मंच के चद्दरें, एकदम सामने था। यह स्थान खचाखच भर गया था, लोगों की चद्दरें एक दूसरे पर बिछ गई थी मगर सब इस वातावरण का आनन्द लेते हुए शाम घिर आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। लगभग नौ बजे तक अंधेरा छा जाने की उम्मीद थी तभी आतिशबाजी होने वाली थी।
हमें एकदम पीछे स्थान मिला। पूरा मैदान ढालू था, हम जहां बैठे थे वहां से ढलान शुरू होता था जो आगे जाकर समतल हो जाता था। हमारे आसपास कई परिवार भी बैठे थे, लेटे थे। बच्चों को तो जैसे मजा आ गया। वे यहां लोटन मगरी की तरह लेट लेट कर मस्ती कर रहे थे मैं बुरी तरह थक चुका था, इसलिये मैं भी लेट गया। आतिशबाजी लेटे लेटे भी देखी जा सकती थी।
आतिशबाजी में क्या लगता है? अगर यह पर्यटकों को इतनी बड़ी संख्या में लुभा सकती है तो इसका आयोजन किसी भी पर्यटन स्थल पर हो सकता है। हमारे साथ समस्या यह है कि हमने इतिहास, विरासत और प्राचीन स्मारकों को ही पर्यटन समझ लिया है जबकि एक परिवार वक्त निकाल कर घर से बाहर आता है, बूते के बाहर जा कर पैसा खर्च करता है, उसके साथ बच्चे भी होते हैं, इन्हें इतिहास व विरासत के साथ कुछ मौज-मजे की भी आवश्यकता होती है। यह प्रदान करने में हमारे पर्यटन नीतिकार हमेशा असफल रहे हैं। फन टूरिज्म की तरफ अब भी इनका ध्यान नहीं है।
डिजनीलैण्ड में भी आतिशबाजी पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख हिस्सा है। लोग सुबह वहां प्रवेश करते हैं और शाम होते होते थक कर चूर हो जाते हैं, इसके जूद सभी लोग रात को होने वाली आतिशबाजी के लिये रूके रहते हैं। यह आतिशबाजी का स्तर उतना ही शानदार होगा। अंधेरा धीरे धीरे छाने लगा। इसके साथ ही आतिशबाजी शुरू हो गई। हमें मैदान के दायीं तरफ ही जगह मिली थी। यहां से सामने का हिस्सा थोड़ा छिप जाता था। दरअसल मैदान में एक वी.आई.पी. कक्ष था जहां बैठने का भारी टिकिट था। इस कक्ष का थोड़ा सा हिस्सा हमारे आड़े आ रहा था। पहली आतिशबाजी इसी हिस्से में हुई जो हमें नजर नहीं आई। मंच पर ही हुई थी इसलिये छुप गई। अब मुझे अहसास हुआ कि पहले रूके थे वहां बैठ जाते तो कुछ भी नजर नहीं आता। चारों तरफ अंधेरा था, बत्तीयां भी बुझा दी गई थी इसलिये लोग अंधेरे का आतिशबाजी अत्यन्त उत्कृष्ट व भव्य होती है, में सोच रहा था कि यहां भी जरूर • फायदा उठाते धीरे धीरे खिसकते हुए उस स्थान की तरफ बढने लगे जहां से समूची आतिशबाजी स्पष्ट नजर आ जाये।
जैसी आतिशबाजी दायीं तरफ हुई थी, वैसी की वैसी अब बाईं तरफ हुई। यह साफ नजर आई। मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। इतनी साधारण • आतिशबाजी। दुनिया भर से लोग जिसे देखने एकत्र हुए थे वह हमारी किसी छोटी मोटी शादी में होने वाली आतिशबाजी से भी गई गुजरी थी।
अब आतिशबाजी का क्रम चल पड़ा। एक के बाद एक हवाईयां छूटने लगी, ये भी अत्यन्त स्तरहीन थी। दो हवाईयों के छूटने के बीच का अन्तराल इतना अधिक था कि सारा मजा किरकिरा हो जाता था। हवाईयों का मजा तो तब आता है जब एक बुझे उसके पहले ही दूसरे के फूल खिल जायें। मेरी निराशा की कोई सीमा नहीं थी। आश्चर्य इस बात का था कि इतने घटिया प्रदर्शन की भी लोग मुक्त कंठ प्रशंसा कर रहे थे। शायद इन लोगों ने स्तर की आतिशबाजी पहले कभी देखी न होगी।
अभी आतिशबाजी 5-10 मिनट ही चली होगी कि सारा आकाश धुंए से गया। घुप अंधेरे में धुंए के सफेद सफेद बादल स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। ब लगातार उपर उठते जा रहे थे और वायुमण्डल में विलिन होते जा रहे थे।
इसके पश्चात हुई कुछ आतिशबाजी जरूर स्तर की थी मगर कोई विलक्षणता नहीं थी। आम तौर पर देखने को मिल ही जाती है। कुल मिलाकर आतिशबाजी का स्तर डिजनीलेण्ड की आतिशबाजी के आसपास भी नहीं था। वैसे दुनिया के विभिन्न भागों में नव वर्ष पर जो आतिशबाजी होती है वह डिजनीलैण्ड की आतिशबाजी से भी कई गुना बेहतर होती है। इसी तरह अमेरिका के स्वतन्त्रता दिवस 4 जुलाई पर भी देश के प्रमुख शहरों में शानदार आतिशबाजी होती है। इस अवसर पर देश की राजधानी वाशिंगटन डी.सी. में होने वाली आतिशबाजी समूचे विश्व में प्रथम स्थान पर है। दूसरे नम्बर पर सेन फ्रांसिस्को की आतिशबाजी आती है जो वहां के गोल्डनगेट की 75 वीं वर्षगांठ पर की गई थी।
तीसरे नम्बर पर अबूधाबी के राष्ट्रीय दिवस पर की गई आतिशबाजी है, चौथे नम्बर पर नव वर्ष पर दुबई में हुई आतिशबाजी है और पांचवें नम्बर पर नोरवे के सोने में संविधान के 200 वर्ष पूरा होने पर की गई आतिशबाजी है। इनके अलावा भी दुनिया के विभिन्न हिस्सों में एक से आला एक आतिशबाजी होती है। आश्चर्य यह है कि कहीं कोई विघ्न संतोषी इनके खिलाफ खड़ा होने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाता ।
Editorial

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