India's best performance at Asian Games
अनुराग सिंह मकुर : बचपन में एक कहावत बार - बार सुनी थी कि 'खेलोगे कूदोगे तो होगे खराब, पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब।' मैं एक खिलाड़ी रहा हूं और इस कहावत से कई बार दो-चार हुआ हूं। समय के साथ सोच बदला और आज हम उस दौर में खड़े हैं, जहां प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं कि 'खेलोगे तो खिलोगे ।' आज यह बदलाव आया है तो हमारे खिलाड़ियों की कड़ी मेहनत और मोदी सरकार की प्रभावी दूरदर्शी नीतियां इसकी पृष्ठभूमि में हैं। हाल में संपन्न एशियाई खेलों में भारत का प्रदर्शन ऐतिहासिक रहा है, जिसमें देश ने 28 स्वर्ण पदक सहित 107 पदक जीत कर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया । यह सफलता हमारे एथलीटों, प्रशिक्षकों और सहायक कर्मियों की कड़ी मेहनत और समर्पण को दर्शाती है। यह प्रदर्शन प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता को भी प्रतिबिंबित करता है। वह भारत को एक खेल महाशक्ति के रूप में विकसित कर रहे हैं। एशियाई खेलों में 2018 की तुलना में 52 प्रतिशत अधिक पदक मिलने से यह स्पष्ट हो चुका है कि अब भारत का समय आ गया है। जिस आत्मविश्वास के साथ हमारे एथलीटों ने एशियाड में हिस्सा लिया और कई विवादों के बीच डटे रहे, वह उनके सकारात्मक सोच को दर्शाता है कि अब हमारे खिलाड़ी केवल प्रतिस्पर्धा में शामिल होने के लिए नहीं खेल रहे, बल्कि जीतने के लिए हिस्सा ले रहे हैं। जिस दृढ़संकल्प के साथ पारूल चौधरी ने अंतिम 10 सेकेंड में अपने प्रतिद्वंद्वी को पछाड़कर 5000 मीटर दौड़ में स्वर्ण जीता, उससे पता चलता है कि उन्होंने अंत तक हार नहीं मानी और वह रजत से संतुष्ट होने को तैयार नहीं थीं । आज भारत का हर एक एथलीट 'स्वर्ण पदक हासिल करने को अपना लक्ष्य बनाना चाहता है।
खेल प्रशंसकों के मन में यह उठता होगा कि हमारे एथलीटों ने हमेशा कड़ी मेहनत की है तो अब ऐसा क्या बदल गया ? यह बदलाव मोदी सरकार लाई है। आज खेल के मैदान में खिलाड़ी अकेला नहीं उतरता, उसके पीछे देश खड़ा होता है। आज हमारे पास खेल का एक पिरामिडनुमा तंत्र है, जहां हर स्तर पर खिलाड़ियों को जमीनी स्तर से लेकर खुद को विकसित करने में सहयोग दिया जाता है। विशिष्ट श्रेणी के एथलीटों को व्यक्तिगत स्तर पर चुनाव सर्वांगीण सहायता और देखरेख प्रदान करने के लिए 2014 में टारगेट ओलिंपिक पोडियम योजना शुरू करना प्रधानमंत्री के सोच का परिणाम था । इस योजना के अंतर्गत एथलीटों को विदेशी तकनीक का अनुभव, अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण, विश्व के सर्वश्रेष्ठ प्रशिक्षक, खेल उपकरणों और आहार की सुविधा प्रदान की जाती है।
विशिष्ट एथलीटों को प्रतिमाह 50,000 रूपये और डेवलपमेंट एथलीटों के लिए 25,000 रूपये का अनुदान दिया जाता है। । एक स्पोर्टिंग देश तभी बेहतर है जब उसके पास प्रतिभाशाली खिलाड़ी हों । इसलिए प्रधानमंत्री ने 2017 में एक योजना % खेलो इंडिया% का शुभारंभ किया, जिसका उद्देश्य जमीनी स्तर पर प्रतिभा की पहचान करना और उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए तैयार करना है। प्रत्येक वर्ष विभिन्न वर्गों में 1000 नए एथलीटों को खेलो इंडिया योजना से जोड़ा जाता है और प्रत्येक एथलीट को प्रति वर्ष 6.20 लाख रूपये की धनराशि प्रदान की जाती है, जिसमें उनका भोजन, आवास, प्रशिक्षण, विशेष आहार और प्रति महीने 10,000 रूपये का जेब खर्च शामिल होता है। उन्हें अत्याधुनिक 'खेलो इंडिया केंद्रों' और 'भारतीय खेल प्राधिकरण' के केंद्रों में प्रशिक्षित किया जाता है और फिर उन्नत प्रशिक्षण के लिए टारगेट ओलिंपिक पोडियम स्कीम (टाप्स) विकास समूह में शामिल किया जाता है। खेलो इंडिया योजना ने भारत में प्रतिभा संपन्न खिलाडियों के एक समूह के निर्माण करने में चमत्कारी भूमिका निभाई है । यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है कि खेलो इंडिया योजना के तहत प्रशिक्षित 124 एथलीट एशियाई खेलों में भारतीय दल का हिस्सा थे। इनमें से कई एथलीट अब टाप्स डेवलपमेंट ग्रुप का हिस्सा हैं। एथलीटों के बड़े समूह की सहायता के लिए 2020 में टाप्स का जो पुनर्गठन किया गया था, यह उसी का परिणाम है। डेवलपमेंट एथलीटों को 2028 और 2032 ओलिंपिक को ध्यान में रखते हुए प्रशिक्षित किया जा रहा है।
खेलों और हमारी खेल प्रतिभाओं की प्रगति इसी से स्पष्ट है कि हमने रोलर स्केटिंग, नौकायन, घुड़सवारी, स्टीपलचेज सहित विभिन्न खेलों में पहली बार 16 पदक जीते हैं। छह श्रेणियों में हमने कई पदक भी जीते हैं। एथलीटों के लिए सर्वोत्तम सुविधाएं हमारे 'खिलाड़ी-प्रथम' प्रतिबद्धता का एक अटूट भाग है। इसे ध्यान में रखते हए खेल बजट को पिछले साल की तुलना तीन गुना कर दिया गया है। अकेले इस एशियाई खेलों के लिए एथलीटों की 275 से अधिक विदेश यात्राएं हुईं, खिलाड़ियों की सहायता के लिए 49 से अधिक विदेशी विशेषज्ञों और 200 से अधिक खेल विज्ञान विशेषज्ञों की सहायता ली गयी । अभ्यास के लिए 75 विशिष्ट शिविर आयोजित किए गए जहां प्रत्येक एथलीट को 200 से अधिक शिविर दिनों का प्रशिक्षण मिला।
नीरज चोपड़ा (Neeraj Chopra) ने टोक्यो ओलिंपिक (Tokyo Olympics) के बाद से 586 दिनों से अधिक समय तक यूरोप, दक्षिण अफ्रीका (South Africa) और अमेरिका (America) में प्रशिक्षण लिया । साबले ने अमेरिका, स्विट्जरलैंड, हंगरी और मोरक्को में प्रशिक्षण लिया। नौका दौड़ के प्रतिभागियों को 2.88 करोड़ रूपये का विदेशी प्रशिक्षण और उपकरण दिए गए, जबकि निशानेबाजों को जर्मनी, इटली, फ्रांस और चेक गणराज्य में विशेष प्रशिक्षण शिविरों में प्रशिक्षण दिया गया, जिस पर 4 करोड़ रूपये निवेश हुए।
इन सुविधाओं से खिलाड़ियों को उन्नत प्रशिक्षण मिला। ऐसे प्रशिक्षण के बाद पूरा देश उन पर नजरें टिकाए और उनके समर्थन में खड़ा रहा । यह किसी भी खिलाड़ी को उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए प्रेरित करता है। कई खिलाड़ियों ने बताया कि अब जब वे देश का प्रतिनिधित्व करते हैं तो उनमें उत्साह भरा रहता वाली है । उनके पास विश्व के श्रेष्ठ खिलाड़ियों जैसा प्रशिक्षण है, मगर वह चीज जो उन्हें अन्य देश के खिलाड़ियों से अलग करती है, वह है लोगों से मिलने वाला आत्मिक समर्थन । किसी भी प्रमुख प्रतियोगिताओं के लिए रवाना होने से पहले प्रधानमंत्री प्रतिभागियों से मिलते हैं। जीत हो या हार, प्रधानमंत्री उनसे संवाद करते हैं और उनमें ऊर्जा का संचार करते हैं। एशियन गेम्स उस विश्वास और भविष्यवाणी को बल प्रदान करता है कि भारत का युग आ चुका है। (लेखक केंद्रीय खेल मंत्री हैं)
Editorial

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