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आम चुनाव से पहले का अंतिम मुकाबला
By EditorialPublished on
आरती आर जेरथ….को चुनावी बिगुल तो पांच विधानसभा (Assembly) के लिए बजा, लेकिन हलचल राष्ट्रीय राजनीति (National Politics) में भी तेज हो गई । घोषित की गई तिथियों के मुताबिक, अगले माह राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, मिजोरम और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव होंगे, जिनके नतीजों का एलान दिसंबर के पहले हफ्ते में कर दिया जाएगा। चूंकि ये चुनाव परिणाम लोकसभा चुनाव के लिए हवा बनाने - बिगाड़ने में सक्षम हो सकते हैं, इसलिए क्षेत्रीय पार्टियों के साथ-साथ राष्ट्रीय पार्टियां भी अपने-अपने तरकश सजाने लगी हैं।

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आरती आर जेरथ….को चुनावी बिगुल तो पांच विधानसभा (Assembly) के लिए बजा, लेकिन हलचल राष्ट्रीय राजनीति (National Politics) में भी तेज हो गई । घोषित की गई तिथियों के मुताबिक, अगले माह राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, मिजोरम और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव होंगे, जिनके नतीजों का एलान दिसंबर के पहले हफ्ते में कर दिया जाएगा। चूंकि ये चुनाव परिणाम लोकसभा चुनाव के लिए हवा बनाने - बिगाड़ने में सक्षम हो सकते हैं, इसलिए क्षेत्रीय पार्टियों के साथ-साथ राष्ट्रीय पार्टियां भी अपने-अपने तरकश सजाने लगी हैं।
कुछ राजनीतिक पंडित मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनावों को 2024 का ‘सेमीफाइनल' मान रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि जो इन मुकाबलों को जीतेगा, लोकसभा चुनाव का ताज उसी के सिर बंधेगा। मगर ऐसा करते हुए वे शायद 2003 और 2018 के विधानसभा चुनावों को भूल जाते हैं। 2003 के चुनावों में छत्तीसगढ़ में रमन सिंह, तो मध्य प्रदेश में उमा भारती ने दिग्विजय सिंह से सत्ता छीन ली थी, जबकि 2000 में हुए राज्य बंटवारे के बाद यह पहला विधानसभा चुनाव था। इसी तरह, राजस्थान में कांग्रेस के अशोक गहलोत को पटखनी देते हुए वसुंधरा राजे ने राज्य में भागवा पचरम लहराया था। मगर अगले ही साल 2004 में मतदाताओं ने केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को किनारे करके कांग्रेस की अगुवाई वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) को बहुमत दे दिया।
साल 2018 भी ठीक इसी तरह के इतिहास का गवाह बना, जब छत्तीसगढ़ में रमन सिंह की सरकार को कांग्रेसी दिग्गज भूपेश बघेल, शिवराज सिंह चौहान की भगवा सरकार को कमलनाथ और वसुंधरा राजे सरकार को अशोक गहलोत हराने में सफल तो रहे, लेकिन 2019 के आम चुनाव में इन राज्यों की लगभग शत-प्रतिशत सीटें भारतीय जनता पार्टी की झोली में चली गईं। यह संकेत है कि विधानसभा और लोकसभा चुनावों की बीच का फर्क मतदाता समझने लगे हैं। तो सवाल यह कि क्या नवंबर में होने
जा रहे विधानसभा चुनावों का कोई महत्व नहीं है?
निःसंदेह, ये चुनाव महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि 2024 के चुनावी समर से पहले 'इंडिया' और 'एनडीए' का यह आखिरी टकराव है। ये चुनाव पार्टी के पक्ष में जनता का मूड बनाने, उन्हें अपनी ताकत दिखाने और कार्यकर्ताओं के भीतर जोश भरने में मददगार होंगे। खासकर, कांग्रेस के लिए इसकी अहमियत ज्यादा है, क्योंकि पांचों राज्यों में वह सीधे मुकाबले में उतर रही है। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जहां वह अपनी सरकार बचाने का प्रयास करेगी, तो मध्य प्रदेश में सत्ता जीतने का। तेलंगाना में वह सत्तारूढ़ बीआरएस को, तो मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट को सीधी चुनौती दे रही है। रही बात भाजपा की, तो वह हिंदी पट्टी में तो मुकाबले में है, पर पूर्वोत्तर और दक्षिण में पिछड़ती दिख रही है।
भाजपा की रणनीति इस बार काफी दिलचस्प दिख रही है। वह ऐसी पार्टी है, जिसने विधानसभा चुनाव से पूर्व मुख्यमंत्री का चेहरा पेश करने की परंपरा स्थापित की है। 2003 से ही वह ऐसा करते आ रही है, जो काफी सफल रणनीति मानी गई है। इसके बरअक्स, कांग्रेस में हाईकमान की पसंद को बतौर मुख्यमंत्री राज्यों में भेजा जाता रहा है। मगर इस बार ठीक उल्टा हो रहा है। कांग्रेस के पास मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में मुख्यमंत्री का चेहरा है, जबकि भाजपा बिना किसी चेहरे के इन चुनावों में उतर रही है। एक और काम किया है उसने । उसने इस बार केंद्र से मंत्रियों को वापस उनके प्रदेश में भेजा है, ताकि चुनावी माहौल अपने पक्ष में किया जा सके। यह रणनीति इसलिए भी बनाई गई है, क्योंकि इन तीनों सूबों में पार्टी के भीतर काफी तनातनी है। दिल्ली से भेजे गए वरिष्ठ नेता राज्यों में पार्टी को एकजुट रखने का प्रयास करेंगे। मगर बाहरी नेताओं की आमद से स्थानीय नेता निष्क्रिय भी हो सकते हैं। यह भी एक वजह है कि हिंदी पट्टी के इन राज्यों में कई नेता भाजपा का दामन छोड़कर कांग्रेस का हाथ थाम चुके हैं।
लग यह भी रहा है कि भाजपा लोकसभा चुनाव में जीत के लिए विधानसभा चुनावों में जोखिम लेने को तैयार है। शिवराज सिंह चौहान का अभियान देखिए, तो ऐसा लगता है, मानो वह विदाई - रूदन कर रहे हैं। राजस्थान में भी वसुंधरा राजे एक लोकप्रिय नेता हैं, लेकिन उनको किनारे कर दिया गया है। यह बताता है कि भाजपा अब इन राज्यों में ऐसा नेतृत्व चाहती है, जिसमें नई ऊर्जा हो और जो उसे आम चुनाव में फायदा दिला सके। कर्नाटक चुनाव से उसने यह रणनीति बनाई है, जहां उसने येदियुरप्पा को आगे नहीं किया था । बेशक शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह को इस बार टिकट दिया गया है, लेकिन भाजपा का लक्ष्य आम चुनाव ही लग रहा है।
तेलंगाना में भी काफी दिलचस्प मुकाबला होने जा रहा है। वहां पहले लग रहा था कि भाजपा मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में उभर रही है। स्थानीय चुनावों में भी उसने काफी अच्छा प्रदर्शन किया था और बीआरएस को चुनौती दी थी। मगर कर्नाटक चुनाव में हार के बाद यहां कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनने लगा और अब तो ऐसा लग रहा है कि भाजपा बनाम बीआरएस के बजाय कांग्रेस बनाम बीआरएस मुकाबला होगा, और भाजपा नंबर तीन की हैसियत से चुनाव में उतरेगी।
रही बात मिजोरम की, तो मणिपुर की अस्थिरता यहां के चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है। पिछले तीन-चार महीनों से मणिपुर में हिंसा हो रही है और यहां की जनभावना केंद्र सरकार के खिलाफ है। मिजोरम में सत्तारूढ़ मिजो नेशनल फ्रंट, जो भाजपा की सहयोगी थी, अब उससे अलग लड़ने का एलान किया है। यहां का सामाजिक समीकरण उसे भाजपा के साथ जाने से रोक रहा है । इन सबसे कांग्रेस खुश हो रही होगी, क्योंकि इसका फायदा उसे हो सकता है।
साफ है, इन पांचों प्रदेशों में भाजपा बैकफुट पर, तो कांग्रेस फ्रंटफुट पर खेल रही है । इन चुनावों में कांग्रेस अगर मजबूती से उभरती है, तो लोकसभा चुनाव भी वह जीत जाएगी, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन यहां की जीत उसके लिए ऐसा खुराक साबित हो सकती है, जिसका उसे आम चुनाव में लाभ मिलेगा। इस जीत से उसके पक्ष में न सिर्फ हवा बननी शुरू हो सकती है, बल्कि 'इंडिया' के अंदर भी वह कहीं बेहतर मोलभाव कर सकेगी। कांग्रेस को मिलने वाली यह ऊर्जा 2024 के मुकाबले को रोचक बना सकती है, जिसे कभी भाजपा के पक्ष में एकतरफा माना जा रहा था।
- आरती आर जेरथ….को चुनावी बिगुल तो पांच विधानसभा (Assembly) के लिए बजा लेकिन हलचल राष्ट्रीय राजनीति (National Politics) में भी तेज हो गई । घोषित की गई तिथियों के मुताबिक अगले माह राजस्थान मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ मिजोरम और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव होंगे जिनके नतीजों का एलान दिसंबर के पहले हफ्ते में कर दिया जाएगा। चूंकि ये चुनाव परिणाम लोकसभा चुनाव के लिए हवा बनाने - बिगाड़ने में सक्षम हो सकते हैं इसलिए क्षेत्रीय पार्टियों के साथ-साथ राष्ट्रीय पार्टियां भी अपने-अपने तरकश सजाने लगी हैं।Upcoming State Elections

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