Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal-Rajasthan
लगभग घन्टे पर ड्राइवर ने हमें विक्टोरिया के विभिन्न हिस्सों में घुमाया, उसके बाद अपने गंतव्य बुचार्ट गार्डन छोड़ दिया। यह बाग विश्व के कतिपय प्रसिद्ध उद्यानों में से एक है। यह बाग लगभग सौ साल पहले एक सिमेन्ट निर्मा उद्योगपति व उसकी पत्नी द्वारा बनाया गया था। यहां पहले चूना पत्थर की खदान थी। रोबर्ट व उसकी पत्नी जैनी बुचार्ट की कम्पनी पोर्टलेण्ड सीमेन्ट बनाती थी। यह खदान उन्हीं की थी। जैनी को फूलों का बहुत शौक था। 1904 में जब इस खदान का पैन्दा निकल गया तो इसकी उपयोगिता समाप्त हो गई।
उन्हीं दिनों विक्टोरिया में जापानी विशेषज्ञ ट्री गार्डन विकसित करने आये थे। यह उद्यान अत्यन्त सुन्दर बना दूर दूर से लोग इसे देखने यहां आने लगे। जैनी व रोबर्ट भी उससे प्रभावित थे। दोनों ने जापानी विशेषज्ञ को अपनी खदान पर जापानी गार्डन विकसित करने के लिये अनुबन्धित किया। शीघ्र ही यह जापानी गार्डन बहुत लोकप्रिय हो गया। अब उन्होंने इटेलियन गार्डन और रोज गार्डन भी बनवा डाला । गार्डन की कीर्ति बढती रही। गार्डन के 50 साल पूरे होने को आये तब समूचे गार्डन को खोद कर भूमि तल में मीलों लम्बे तार बिछाये गये ताकि स्वर्ण जयन्ती पर समूचा गार्डन विद्युत रोशनी से जगमगा सके।
2004 में इस उद्यान के शताब्दी वर्ष पर इसे कनाडा सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया गया। आज भी यह उद्यान बुचार्ट परिवार के पास ही है।
जेबरा, घोड़े, शुतुरमुर्ग वगैरा 30 तरह के जानवरों की आकृतियां ई है। प्रत्येक आकृति की डिजाईन विश्व प्रसिद्ध विशेषज्ञों द्वारा तैयार में भालू करवाई गई है। बाग में एक बच्चों का परिसर भी है जिसमें विभिन्न प्रकार के झूले और सवारियां हैं।
ज्यू ज्यू उद्यान विश्व भर के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता रहा परिवार इसमें मनोरंजन की गतिविधियां बढाते ही रहे। उद्यान में हर शनिवार को भव्य आतिशबाजी का आयोजन होने लगा तथा शनि-रवि दोनों दिन मेला लगने लगा। उद्यान में प्रवेश हेतु भारी टिकट है जिससे इसके रख रखाव में मदद मिलती है।
हमारे जहाज के साथ साथ दो और क्रूज जहाजों ने लंगर डाला था। तीनों जहाजों के मिल कर 5 हजार से ज्यादा यात्री हो गये होंगे। सबका एक ही लक्ष्य था. बुचार्ट गार्डन और यहां की आतिशबाजी। मैं यह सोच सोच कर ही आश्चर्यचकित कि हमारे यहां तो झोले शादियों तक में आतिशबाजी पर प्रदूषण का हव्या ख कर कोहराम मचा देते हैं। दीपावली तक पर आतिशबाजी नहीं होने देते मगर यहां इस दुनिया के प्रसिद्ध उद्यान में हर शनिवार को घन्टे भर तक आतिशबाजी होती है फिर भी न तो किसी प्रकार का प्रदूषण फैलता और न ही किसी फोके की हिम्मत भी होती है कि प्रदूषण के नाम पर उंगली तक उठाए।
हम ऐसा उत्कृष्ट उद्यान तो बना सकते नहीं मगर छोटी छोटी सी बातों पर हो हल्ला जरूर मचा सकते हैं हो हल्ला भी मचाओ मगर कुछ करके तो बताओ। उदयपुर में गुलाब बाग के नाम पर हमारे पूर्व महाराणाओं ने एक अमूल्य निधि साँची है। हम चाहते तो इस बाग को भी देश का उत्कृष्ट उद्यान बना सकते थे मगर एसा करना तो दूर दिन-ब-दिन इसकी दशा बिगड़ती जा रही है। आज हालत यह है कि फूलों का एक पौधा तक कहीं दिखाई नहीं देता। कुछ साल पहले तक इनके दुक्के चांदनी व कनेर के पेड़ों से लोग पूजा के फूल चुनते दिखाई दे जाते थे आज तो ये भी नहीं। कहीं फ्लोम्स तो कहीं बालसम जैसे साधारण फूल भी क्यारियों में दिख जाते थे उनका भी कहीं नामों निशां नहीं। कोई संकल्प करे, विशेषज्ञों की मदद ले, लेण्डस्केपिंग करवाए तो आज भी यह एक श्रेष्ठ उद्यान बन सकता है।
बस से उतरे तो पर्यटकों का मेला सा उमड़ता नजर आया। चारों तरफ बसें ही बसें और इनसे उतरते यात्री। कई कारें व अन्य छोटे वाहन भी नजर आ रहे थे ससे पता चलता था कि स्थानीय लोग भी यहां आते हैं। दरअसल यहां आयोजित दो दिन का मेला सुबह से ही शुरू हो जाता है। आसपास के तथा स्थानीय लोग दिन भर यहां व्यतीत कर पिकनिक मनाते हैं। सबको प्रवेश देना ही पड़ता है।
प्रीति ने अपने साथ एक बैग ले रखा था जिसमें चारों कम्बलें रख दी थीं। टिकिट हमने पहले ही ले रखे थे मगर भीड़ इतनी अधिक थी कि अन्दर प्रवेश करने हेतु भी लम्बी लम्बी कतारें लगी हुई थी। यह बाग 55 एकड़ क्षेत्र में फैला है, समूचा बाग अद्वितीय फूलों के प्रदर्शन से सजा हुआ है। हर साल कम से कम 700 प्रकार के दस लाख फूलों के पौधे तैयार किये जाते हैं जिससे उद्यान की छटा बरकरार रहे। लगभग दस लाख लोग प्रति वर्ष इस उद्यान को देखने आते हैं। पूरे बगीचे में फूलों के अलग अलग भाग बने हुए हैं। यहां जाने के लिये बने रास्तों के दोनों तरफ क्यारियां बनी हुई हैं जिनमें एक से लाजवाब एक फूल पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। कहीं गुलाब तो कहीं डहेलिया तो कहीं किसी अन्य फूलों से आच्छादित रास्ते हैं। विभिन्न प्रकार के गुलाबों का तो एक समूचा रोज गार्डन अलग से है।
अन्दर प्रवेश करते ही कई रेस्टोरेन्ट नजर आ गये। आखिर इतने लोग अने हैं तो खाने पीने की व्यवस्था तो बहुत जरूरी है इनके साथ ही गिफ्ट व सोवेनियन शोप्स भी थी। उद्यान का प्रमुख आकर्षण चिल्ड्रन्स पेवीलियन है। यहां गुलाब के फूलों से बना केरोसल है जिस पर लकड़ी से बनाए गए तरह तरह के जानवर हैं। बच्चे इन पर बैठ कर मेरी गो राउन्ड का मजा लेते हैं। बच्चों के साथ साथ बड़े लोग भी इस सवारी का आनन्द ले सकते हैं। यहां कई लोग अपने बच्चों की बर्थ डे पार्टियां भी मनाते हैं।
इसी तरह एक स्प्रींग इन्डोर गार्डन है, यह शादियों के आयोजन के लिये दिया जाता है जिससे अच्छा राजस्व आ जाता है। ये लोग तो बहुत धीरे धीरे आगे बढ़ रहे थे, हर फूलों की क्यारी के पास रुक रुक कर फोटो खींच रहे थे। मैं तो इतने में ही थक गया। इतना सुन्दर बगीचा देखकर मेरा मन अन्दर ही अन्दर डाह कर रहा था कि हमारे पास भी इतना बढिया केनवस है मगर उस पर चित्र उतारने वाला कोई योग्य चित्रकार नहीं।
उद्यान में एक संकन गार्डन था, यह सीढीयां उत्तर कर नीचे जाता था, शायद खदान का गड्ढा रहा होगा, इसे अत्यन्त सुन्दर लान्स एवं पौधों में परिवर्तित कर दिया गया था। फूल पत्तों से बने बड़े बड़े जानवर भी आकर्षण का केन्द्र बने हुए थे। सीढीयां उतरने के बाद वापस चढकर उपर आना था, मेरी इतनी हिम्मत नहीं थी। ने कहा- आप आगे चलकर कहीं बैठ जाओ, जितने हम देख कर आते हैं। से उसका बेग मैंने ले लिया।"
कम्बल बिछा कर कहां बैठना है, इसका कुछ पता नहीं चल रहा था नहीं तो वहीं जाकर बैठ जाता। धीरे धीरे चलते हुए में एक बहुत बड़े लॉन के किनारे पहुँचा। यहां बेन्च लगी हुई थी। मैंने सोचा कि यहां जगह मिल जाय तो थोड़ी देर कान उतार लू। एक बेन्च पर चीनी परिवार बैठा था मगर बेन्च के खाली हिस्से में उन्होंने अपना सामान रखा हुआ था। में वहा जाकर खड़ा हो गया, सोचा मेरी उम्र देख कर ये सौजन्यता पूर्वक अपना सामान उठा मुझे बैठने को कहेंगे। मैं इन्तजार करता रहा, चीनी की आंखों में आंखे डालकर भी देखा कि शायद उसे शरम आ जाये मगर वह भी ढिठाई से मेरी तरफ देखता रहा। मैंने सोच लिया कि अब इनसे शरीफाई बरतने का कोई तुक नहीं वरना में उनसे क्षमा मांगते हुए सामान हटाने को कह सकता था, बजाये इसके में खुद ही सामान उठा कर नीचे रखने लगा तब उन्होंने सामान मेरे हाथ से लेते हुए नीचे रख दिया। खाली हुई जगह पर बैठ कर मुझे काफी सुकून का अनुभव हुआ।


Editorial

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