Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal-Rajasthan


जहाज की गति और कम हो गई, ग्लेशियर नजदीक आता गया। अचानक नीरवता छा गई, पार्श्व से कुछ गिरने टूटने सी आवाजें सुनाई देने लगीं। ग्लेशियर के एकदम पास पहुँचने के बाद जहाज का ईन्जन शायद बन्द कर दिया गया था इसलिये एकदम शांति सी हो गई थी। हमारे सामने दुधिया नीले पहाड़ों की श्रृंखला थी, इधर से उधर जहां नजरें घुमाओ नीले सफेद बर्फ की विशाल राशि दिखाई दे रही थी। जिस समुद्र में हमारा जहाज खड़ा था वही इस विशाल हिमराशि की परिणिती थी, अन्तत: उसे इसी जल राशि में विलिन होना था।
पार्श्व में जो आवाजें आ रही थी वे इसी प्रक्रिया की अंग थी। हिमखंड अपनी मूल हिमराशि से टूट रहे थे, टूट टूट कर ये समुद्र में गिरते जा रहे थे। जहाज की आवाज इसीलिये बन्द कर दी थी जिससे पर्यटक ग्लेशियर की इन आवाजों को सुन सकें। कभी मद्धिम तो कभी जोर की गर्जना हो रही थी, एसा लगता था जैसे ये हिमनद बोल रहा हो। हमारा जहाज समुद्र तल से बहुत ऊंचा था मगर बर्फ की ये चट्टानें हम से भी कई फुट ऊंची नजर आ रही थी। लोग जी भर कर इन्हें निहार रहे थे, फोटो खींच रहे थे, वीडियो ले रहे थे। जहाज की एक गाईड माईक लेकर इसका विवरण दिये जा रही थी, यह हमारे पास ही बैठी थी मगर इसकी कमेन्ट्री जहाज के हर हिस्से में सुनी जा रही थी।
अचानक जोर की आवाज आई, जहाज के बन्द हिस्से में भी हमें यह इतने जोर से सुनाई दी तो खुले ठेक के लोगों ने कितनी जोर से सुनी होगी इसकी कल्पना की जा सकती है। सभी लोग आवाज की तरफ देखने लगे, गाईड ने हमारी बाई तरफ इंगित करते हुए बताया कि देखो उस तरफ का ग्लेशियर टूट रहा है, सभी उधर देखने लगे, सबके सामने बर्फ का बड़ा हिस्सा मूल पहाड़ से अलग हुआ और समुद्र में गिर गया। हम लोग अन्दर बैठे थे इसलिये इसका इतना आनन्द नहीं आया। अब कई लोग उठ उठ कर खुले डेकों में जाने लगे।
मैं भी अपने स्थान से उठ गया और सबसे उपर की मंजिल के डेक पर पहुँच गया। यहां ठंड असहनीय थी। जेकेट, टोपा मफलर, मौजे सभी डाटे हुए थे फिर भी यहां खड़ा रहना मुश्किल हो रहा था फिर भी हिम्मत करके मैंने खुले वातावरण में ग्लेशियर के दर्शन करने की ठानी। डेक पूरा भरा हुआ था, कहीं से भी बाहर का नजारा नहीं दिख पा रहा था, मैं आश्चर्यचकित था कि मुझे तो यहां कुछ पल खड़े रहना भी भारी पड़ रहा है और ये लोग यहां से हटने का नाम ही नहीं ले रहे । हकीकत में ग्लेशियर का असली मजा तो यही लोग ले रहे थे।
मैं निराश होकर एक मंजिल नीचे उतरा, यहां का डेक बड़ा था मगर यह जहाज का पिछला हिस्सा था, यहां से ग्लेशियर का एक तरफ का हिस्सा ही नजर यहां लोग ग्लेशियर के साथ सेल्फी ले रहे थे इसलिये अन्य यात्रियों ने लिए अपनी अपनी जगह छोड़ दी थी। मुझे यहां खड़े रहने की जगह मिल गई। लेशियर के एकदम सामने था, वाकई जो अनुभूति यहां हो रही थी वो बन्द वेशन डेक में नहीं थी। कुछ देर के लिये तो मैं ठंड-वंड सब भूल गया और मंत्र सफेद बर्फ की चट्टानों को निहारता रहा। प्रकृति की इस कृति के हमने में नतमस्तक था।
एक बार फिर वैसी ही गर्जना हुई जैसी नीचे सुनी थी, मगर यह बहुत तेज श्री एसा प्रतीत हुआ जैसे कहीं कोई बुलडोजर चल रहा है। इस गर्जना के बाद एक और आवाज आई, यह अलग तरह की थी, जैसे कोई चीज फट रही हो। आवाजों का यह क्रम ऐसे ही चलता रहा जैसे ग्लेशियर और पहाड़ आपस में ही बात कर रहे हव्य-प्रतिध्वनि और उसके पश्चात बर्फ की चट्टान का समुद्र में गिर एक अलग तरह की छपाक की आवाज के साथ पानी का उछलना। सब जादुई था ।
समुद्र में व्याप्त छोटे बड़े हिमखंडों का रहस्य अब सबके सामने था। ग्लेशियर से चट्टाने टूट टूट कर पानी में गिर रही थी, वे ही चारों तरफ तैरती नजर आ रही , थी। काफी देर तक जहाज यहां इसी तरह खड़ा रहा। सब लोगों ने जी भर कर लेशियर को देख लिया तो लोग अपने अपने स्थानों को छोड़ दूसरे स्थानों पर जाने डेक पर भी भीड़ कम हो गई। ओब्जर्वेशन डेक में पहले आगे की कुर्सियों पर बैठने की मारामारी चल रही थी तो अब सब खाली पड़ी थी।
जहाज से ग्लेशियर को देखने का श्रेष्ठ स्थान तीसरी मंजिल का डेक था। यह जहाज का अगला धनुषाकार हिस्सा था जिसे बो कहा जाता है। यह आगे निकला हुआ था इसलिये ग्लेशियर के सबसे नजदीक था, यहां अभी भी भीड़ नजर आ रही थी। मुनीश-प्रीति यहीं थे, मुझे देखकर वे अलग हट गये और अपनी जगह मुझे दे दी। यह हिस्सा नीचे भी था, आगे भी था इसलिये यहां से ग्लेशियर एकदम एसा नजर आ रहा था जैसे हम उसके उपर ही हों। हबार्ड का ग्लेशियर बहुत छोटा माना जाता है फिर भी उसकी विशालता देख हम हतप्रभ थे, इससे बड़ा ग्लेशियर देखेंगे तो क्या अहसास होगा इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते थे। इन्सान चाहे कितना भी बड़ा हो जाये, कुदरत के करिश्मे के सामने उसकी औकात कुछ भी नहीं, यहां खड़े खड़े बार बार इसीका अहसास हो रहा था।
इस अदभुत नजारे से लोगों की प्रसन्नता का पारावार नहीं था। सब एक दूसरे से इसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा कर रहे थे। शीघ्र ही जहाज वापस शुरू हुआ और दायीं तरफ मुड़ने लगा। एक ही स्थान पर खड़े लोगों को अब ग्लेशियर का वो हिस्सा भी नजर आने लगा जो दायीं तरफ था। जहाज पूरा मुड़ गया तो ग्लेशियर का दाया भाग सबके सामने था फिर भी पूरा नहीं हो रहा था। धीरे धीरे जहाज वापस मुडा, अपनी पूर्व स्थिति में आया और अब बायीं तरफ मुड़ गया। इस तरह यात्रियों को समूचे ग्लेशियर के दर्शन हो गये। ग्लेशियर इतना चौड़ा है कि उसका ओर-छोर ही नजर नहीं आ रहा था, जिन पहाड़ों से इसका उद्गम हो रहा था उनके दिखाई देने का तो सवाल ही नहीं था। यह तो हेलीकोप्टर से ही देखा जा सकता था।"
वर्ष का अगस्त माह चल रहा था जो कि ग्रीष्मकालीन होता है, इसी दौरान ग्लेशियरों के पिघलने के सर्वाधिक आसार रहते हैं, बाद में तो बर्फ का जमना ही जमना है। ग्रीष्मकाल में भी ग्लेशियर के पिघलने के कोई संकेत नहीं थे। इसी से स्पष्ट था कि बर्फ का परत दर परत जमना जारी है। छोटी मोटी टूट फूट से इस पर कोई असर नहीं होता।
जहाज अब नियमित रूप से इधर से उधर हो रहा था, कोई यात्री प्रयत्नपूर्वक भी अगर ग्लेशियर नहीं देखना चाहे तो भी ग्लेशियर का हर हिस्सा उसके सामने था। लोग कमरे में हों, बार में हों, केफेटेरिया में हों, हर जगह से ग्लेशियर दिखाई दे रहा था। जहाज ने ग्लेशियर से इतनी दूरी बना रखी थी कि अगर कोई बड़ी चट्टान भी टूट कर पानी में गिरे तो जहाज उससे दूर ही रहे।
यह संयोग ही था कि धूप खिली हुई थी, दिन साफ था जिससे यात्रियों ने ग्लेशियर देखने का भरपूर आनन्द उठाया वरना कई बार मौसम खराब हो, बादलों से अंधेरा छाया रहे तो जहाज भी ग्लेशियर के इतने निकट आने की जोखिम नहीं उठाता।
जहाज काफी देर तक ग्लेशियर के पास रहा, यात्री इसकी उपस्थिति से एसे परिचित हो गये कि यह अजूबा नहीं रहा। ग्लेशियर की नीली-सफेद हिम राशि सबके सामने थी फिर भी इससे अनजान हो लोग अपने अन्य कामों में व्यस्त हो गये जबकि थोड़ी देर पहले ही इसकी एक झलक पाने के लिये भी कशमकश कर रहे थे।
जहाज चार-पांच घंटे ग्लेशियर के पास रहा। अन्तिम बार घूम कर वह वापस उस दिशा में चल पड़ा जिधर से आया था। तभी बहुत जोरों की आवाज से सबके दिल दहल गये। ग्लेशियर से एक बहुत बड़ी चट्टान टूट कर समुद्र में गिरी थी। सब लोग दौड़ कर इस दिशा में देखने लगे। गनीमत थी कि हमारा जहाज चल पड़ा लेशियर के समीप होता तो शायद इस चट्टान का असर हो सकता था। सब लोग उस पल की कल्पना करके ही रोमांचित हुए जा रहे थे।
Editorial

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