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विपक्ष को जोड़ने की बिखरी हुई कवायद
By EditorialPublished on
देश के बहुत से राज्य हैं, जहां दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा की लोकसभा में सौ फीसदी नुमाइंदगी है, तो बहुत से राज्यों में उसने बमुश्किल अपनी उपस्थिति दर्ज करा रखी है, तो दूसरी तरफ, देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस कई राज्यों में शून्य पर है, कहीं छितराई हुई है, तो कुछ जगहों पर अब भी दम-खम बरकरार है। बहुत से प्रदेश ऐसे हैं, जहां अलग-अलग दलों के अपने-अपने राजनीतिक सूर्य चमक रहे हैं, जिन्हें न तो भाजपा के बादल ढक पाए है और न ही कांग्रेस का कुहासा, कहीं पर उस सूर्य का नाम नवीन पटनायक है, तो कहीं ममता बनर्जी

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विजय त्रिवेदी : ठिठुरती दिल्ली (Delhi) में जनवरी के कुहासे और धुंधलके में सुबह सबेरे हाथ को हाथ नहीं सूझता है, गाड़ियां रफ्तार के बजाय रेंगती लगती हैं। बहुत से लोगों को अलाव तापते देख लगता है कि देश भर के मौसम का हाल यही होगा, लेकिन न तो दिल्ली में दिन भर ऐसा मौसम रहता है और न ही पूरे देश के मौसम का हाल ऐसा रहता है। दिन में कई बार धूप निकलती है, फिर कई बार बादल और कोहरा उसे ढकने की कोशिश करते हैं, तो तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात समेत बहुत से राज्य ऐसे हैं, जहां ठंड बिल्कुल नहीं है। और तो और, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड के साथ-साथ पूर्वोत्तर जैसे पहाड़ी राज्यों में ठंड भले ही कितनी हो जाए, लेकिन दिन भर धूप खिली रहती है। मेरी मंशा आपको मौसम का हाल बताने की नहीं है, बल्कि मौसम मुझे हिन्दुस्तान की राजनीति जैसा लगता है, जहां कहीं धूप है, तो कहीं छांव।
देश के बहुत से राज्य हैं, जहां दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा की लोकसभा (Lok Sabha) में सौ फीसदी नुमाइंदगी है, तो बहुत से राज्यों में उसने बमुश्किल अपनी उपस्थिति दर्ज करा रखी है, तो दूसरी तरफ, देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस (Congress) कई राज्यों में शून्य पर है, कहीं छितराई हुई है, तो कुछ जगहों पर अब भी दम-खम बरकरार है। बहुत से प्रदेश ऐसे हैं, जहां अलग-अलग दलों के अपने-अपने राजनीतिक सूर्य चमक रहे हैं, जिन्हें न तो भाजपा के बादल ढक पाए है और न ही कांग्रेस का कुहासा, कहीं पर उस सूर्य का नाम नवीन पटनायक (Naveen Patnaik) है, तो कहीं ममता बनर्जी (Mamata Banerjee), कहीं स्टालिन (Stalin) या विजयन (Vijayan) या फिर के सी चंद्रशेखर (K C Chandrasekhar) और जगन रेड्डी (Jagan Reddy) या फिर नाक के नीचे अरविंद केजरीवाल (Arvind kejriwal) और कभी-कभी 'भारत जोड़ो यात्रा' पर निकले राहुल गांधी की राजनीतिक धूप का भी एहसास होता है। यूं तो नीतीश कुमार के आसमान पर भी उजाला दिख रहा है, तो ऐसे में, क्या राजनीतिक वैज्ञानिक आने वाले दिनों में किसी भी साफ राजनीतिक मौसम का अनुमान लगा सकते हैं या फिर वे भी इस संभावना से इनकार नहीं कर सकते कि दक्षिणी विक्षोभ या पुरवा हवाओं से देश का सियासी मौसम बदल सकता है।
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) को भारत जोड़ो यात्रा में कड़ाके की ठंड के बीच सिर्फ टीशर्ट पहनने को आप बहादुरी समझ रहे हैं, तो हो सकता है कि अपनी इस भूल का एहसास आपको कुछ वक्त बाद हो । भारत जोड़ो यात्रा (Bharat Jodo Yatra) को पूरी तरह से संसदीय सीटों के नतीजे में बदलने के पैमाने पर मत देखिए, लेकिन यह दिवाली से पहले घर की उस सफाई जैसा काम तो है ही, जिससे पुराना घर भी थोड़ा बेहतर लगने लगता है। हां, कांग्रेस और राहुल गांधी, दोनों की छवि इससे बदलने लगी है। जिन-जिन राज्यों से यह यात्रा गुजर रही है, कम से कम उन प्रदेशों में कांग्रेस का कार्यकर्ता जागने लगा है। इस यात्रा ने विरोधियों की उन तमाम कोशिशों को कमजोर करना शुरू कर दिया है, जो राहुल गांधी की छवि एक अपरिपक्व राजनेता के रूप में बनाने में जुटे थे। साथ ही, अब कांग्रेस का जी - 23 ग्रुप भी गायब - सा हो गया है। विपक्षी दलों के बहुत से नेता राहुल की उभरती ताकत को समझना चाहते हैं ।
इसका मतलब कतई यह नहीं समझना चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) के आकर्षण या लोकप्रियता में कोई कमी आई है। आज भी वह देश के सबसे लोकप्रिय नेताओं में पहले नंबर पर बरकरार हैं। बहुत से राजनीतिक दलों का हाल भी कमोबेश ऐसा ही है, जो समझ रहे हैं कि मोदी के सहारे ही अपनी राजनीतिक गाड़ी को चलाया जा सकता है। विरोधी दलों में कई नेता मोदी से मुकाबला करने से ज्यादा अपनी ऊर्जा इस बात में लगा रहे हैं कि कहीं कोई दूसरा विरोधी दल या नेता उससे आगे न निकल जाए। शायद इसी वजह से हर कोई अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश में दिखाई देता है। भारत जोड़ो यात्रा (Bharat Jodo Yatra) भी इस बात का सुबूत है कि मौटे तौर भाजपा (BJP) विरोधी किसी राजनीतिक दल ने राहुल गांधी के साथ अपना हाथ जोड़ना जरूरी नहीं समझा है। मतलब साफ है, अनेक नेता नरेंद्र मोदी से पहले राहुल गांधी को ताकतवर होने से रोकना चाहते हैं। मसला सिर्फ राहुल गांधी का नहीं है, यही बात नीतीश कुमार (Nitish Kumar) को लेकर भी है, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक 'के चंद्रशेखर राव को लेकर भी है। इनमें किसी नेता को कोई अपने कंधे पर बिठाने या ताकत देने के लिए तैयार नहीं है। सरकार में बैठे लोगों की बात छोड़िए, विपक्ष के नाम पर कमजोर हो चुके अखिलेश यादव और मायावती (Akhilesh Yadav and Mayawati) भी साथ नहीं दिखे हैं। विश्व हिंदू परिषद (Vishwa Hindu Parishad) के चंपत राय ने भले ही राहुल गांधी की तारीफ कर दी, लेकिन इतनी दिलदारी ममता बनर्जी या नीतीश कुमार ने नहीं दिखाई है।
साल 2019 में भाजपा (BJP) को करीब 38 फीसदी वोट मिला था, यानी करीब 62 फीसदी वोट देश भर में ऐसा था, जो मोदी या भाजपा के खिलाफ दिया गया था, क्या इन वोटो को साथ लाया जा सकता है? कांग्रेस को भाजपा से करीब आधा वोट मिले थे, पर विपक्षी एकता में शामिल होने वाले ज्यादातर दलों का कुल वोट भी 20 फीसद तक नहीं पहुंच पाया था। यानी अब भी कांग्रेस ही सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के तौर पर सामने है। देश भर में दो सौ से ज्यादा संसदीय सीटें ऐसी हैं, जहां कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला है, इनमें से करीब 90 फीसदी सीटों पर कांग्रेस (Congress) हारी है। बाकी तीन सौ से ज्यादा सीटों पर विपक्षी दलों की क्या रणनीति है, यह अभी तक साफ नहीं हो पाया है। भाजपा ने 2024 के लिए न केवल अपनी रणनीति बनाना, बल्कि उस पर काम करना भी शुरू कर दिया है। करीब उन डेढ़ सौ सीटों पर भाजपा अलग तरीके से तैयारी कर रही है, जो पिछली बार वह हार गई थी, क्या ऐसी ही कोई रणनीति विपक्षी दल बना रहे हैं? क्या वे किसी दोस्ताना मुकाबले के लिए मानसिक या रणनीतिक तौर पर तैयार हो गए हैं ?
पिछले कुछ नतीजे बताते हैं कि जब भी विपक्षी राजनीतिक दलों ने पूरी शिद्दत के साथ लड़ाई लड़ी, उन्हें जीत हासिल हुई। इस साल अगर जम्मू-कश्मीर (Jammu and Kashmir) में भी चुनाव हुए, तो भाजपा से मुकाबला कर उसे कमजोर करने और विपक्षी एकता दिखाने के दस मोर्चे या मौके गैर-भाजपा दलों को मिलेंगे। शेख सादी की इस बात को याद रखिए कि चिड़िया अगर एका कर लें, तो शेर की भी खाल खींच सकती हैं।

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