Haldwani Railway
इस पर आश्चर्य नहीं कि सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने उत्तराखंड (Uttarakhand) के हल्द्वानी में रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण हटाने के प्रस्तावित अभियान पर अंतरिम रोक लगा दी। इसका एक प्रमुख आधार शायद यह रहा कि उत्तराखंड हाई कोर्ट ने एक सप्ताह की नोटिस पर ही अतिक्रमण (Encroachment) हटाने के निर्देश दिए थे। जो हजारों लोग वर्षों से अतिक्रमण वाली जगह पर रह थे, उन्हें वहां से हटने के लिए पर्याप्त समय मिलना ही चाहिए। इसलिए और भी कि एक तो उनकी संख्या अच्छी-खासी है और दूसरे उस जमीन पर स्कूल और अस्पताल भी हैं। यह अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मानवीय पक्ष पर ध्यान दिया, लेकिन देखना यह है कि वह व्यापक सुनवाई के बाद अंतत: किस नतीजे पर पहुंचता है? उस पर इसलिए देश भर की निगाहें होंगी, क्योंकि उसका फैसला नजीर बनेगा। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि जैसे हल्द्वानी
(Haldwani)
में रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण कर वहां पक्के भवन बना लिए गए, उसी तरह की स्थिति देश के अन्य हिस्सों में भी है। शायद ही कोई राज्य ऐसा हो जहां शहरी अथवा ग्रामीण क्षेत्र में रेलवे की जमीनों (Railway Land) पर अतिक्रमण न किया गया | अतिक्रमण केवल रेलवे ही नहीं, अन्य सरकारी विभागों की जमीन पर भी है। चूंकि अतिक्रमण की वर्षों तक अनदेखी की जाती है इसलिए वहां निर्माण कार्यों के साथ बसाहट भी जारी रहती है और फिर एक समय यह स्थिति आती है कि वहां से लोगों को हटाना एक मानवीय समस्या बन जाता है। हल्द्वानी में ऐसा ही हुआ। सरकारी जमीनों पर से अतिक्रमण हटाने के मामले में मानवीय पहलू पर ध्यान दिया ही जाना चाहिए, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं होना चाहिए, जिससे अतिक्रमण को बल मिले। यदि सरकारी जमीनों
(Government Lands)
पर अतिक्रमण की मानवीय आधार पर अनदेखी कर दी जाएगी तो फिर अतिक्रमण और बेलगाम होगा। इतना ही नहीं, इससे विकास के कई महत्वपूर्ण काम भी रूक जाएंगे। रेलवे का विस्तार समय की मांग है, लेकिन वह तभी संभव है, जब उसकी जमीनों पर से अवैध कब्जे हटें। ये कब्जे इसलिए भी हटने चाहिए, क्योंकि कई बार उसकी जमीनों और खासकर रेल पटरियों (Tain Track) के बिल्कुल निकट किया जाने वाला अतिक्रमण रेलों के सुरक्षित संचालन में बाधा बनता है । जैसे यह समझना कठिन है कि रेलवे और अन्य सरकारी विभाग (Government Department) अपनी जमीनों पर अतिक्रमण की अनदेखी क्यों करते रहते हैं, वैसे ही यह भी कि कभी उन लोगों को जवाबदेह क्यों नहीं ठहराया जाता, जो सरकारी जमीनों पर कब्जा होने देते हैं? प्रायः ऐसे कब्जे सरकारी विभागों की अनदेखी और कभी-कभी तो उनकी सहमति और मदद से भी होते हैं । क्या यह विचित्र नहीं कि हल्द्वानी में रेलवे की जिस जमीन पर अतिक्रमण हुआ, वहां बिजली-पानी (Electricity Water) की सुविधा प्रदान किए जाने के साथ ही सरकारी अस्पताल और स्कूल भी बना दिए गए थे? यह तो अंधेरगर्दी है ।
Editorial

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