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उप्र की 75 जिलों की 80 सीटों के हिस्से में राहुल के मात्र 25 घंटे
By EditorialPublished on
भारत जोड़ो यात्रा (Bharat Jodo Yatra) मंगलवार को गाजियाबाद से चली तो राहुल गांधी लोनी से ही दिल्ली लौट गए, जबकि मवीकलां में उनका रात्रि प्रवास था। ऐसा ही यात्रा के अगले दिन बुधवार को हुआ। शामली (Shamli) के एलम में रात्रि प्रवास का प्रस्तावित कार्यक्रम ऐनवक्त पर रद्द कर राहुल बड़ौत से दिल्ली रवाना हो गए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को सूबे की राजनीति की धड़कन माना और कहा जाता रहा है, लेकिन तीन जिलों में राहुल के टूटे टूटे करीब 25 घंटे नाकाफी होने के संकेत दे रहे हैं। राहुल मंगलवार को गाजियाबाद में करीब ढाई घंटा, बु

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बागपत (एजेंसी) : उप्र के केवल तीन जिलों की परिक्रमा से निशाने पर नहीं लगेगा राजनीतिक तीर भारत जोड़ने के लिए सड़क पर उतरे कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की मेहनत में अंतिम चरण की कंजूसी भारी चूक साबित हो सकती है। देश की राजनीति में बड़ा कद और भारी वजूद रखने वाले उत्तर प्रदेश के हिस्से में यात्रा के मात्र 130 किलोमीटर और राहुल के करीब 25 घंटे ही आए हैं। यात्रा गाजियाबाद से होकर बागपत के रास्ते शामली होते हुए हरियाणा में प्रवेश कर जाएगी, लेकिन क्या यह तीन जिले दिल्ली (Delhi) की दूरी तय करने के लिए काफी हैं? शायद नहीं..! राजनीतिक विश्लेषकों के साथ-साथ अन्य राजनीतिक दलों का आकलन भी कुछ ऐसा ही है कि तीन जिले और 25 घंटों के बूते 75 जिलों की 80 लोकसभा (Loksabha) सीटों की हसरत पूरी नहीं हो सकती।
भारत जोड़ो यात्रा (Bharat Jodo Yatra) मंगलवार को गाजियाबाद से चली तो राहुल गांधी लोनी से ही दिल्ली लौट गए, जबकि मवीकलां में उनका रात्रि प्रवास था। ऐसा ही यात्रा के अगले दिन बुधवार को हुआ। शामली (Shamli) के एलम में रात्रि प्रवास का प्रस्तावित कार्यक्रम ऐनवक्त पर रद्द कर राहुल बड़ौत से दिल्ली रवाना हो गए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को सूबे की राजनीति की धड़कन माना और कहा जाता रहा है, लेकिन तीन जिलों में राहुल के टूटे टूटे करीब 25 घंटे नाकाफी होने के संकेत दे रहे हैं। राहुल मंगलवार को गाजियाबाद में करीब ढाई घंटा, बुधवार को बागपत में करीब 12 घंटे रहे। गुरूवार को उन्होंने शामली के एलम से हरियाणा बार्डर तक का सफर करीब दस घंटे में पूरा किया। इसके साथ राहुल ने यात्रा के दौरान करीब 25 घंटे ही उम्र में बिताए ।
पीछे मुड़कर देखें तो 2013 में दंगे के बाद भाजपा (BJP) के हाथ में सत्ता की चाबी सौंपने का आधार तैयार करने वाले मुजफ्फरनगर (Muzaffarnagar) को मायूसी हाथ लगी। याद दिलाना जरूरी है कि दंगे के एक सप्ताह बाद राहुल मां सोनिया गांधी के साथ मुजफ्फरनगर पहुंचे थे। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह (Manmohan Singh) को भी मुजफ्फरनगर का रूख करना पड़ा था। केंद्र में यूपीए की सरकार थी। 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में पासा पलटा और सत्ता में राजनीतिक बदलाव की धुरी मुजफ्फरनगर ही बना था ।

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