✕
नोटबंदी पर फैसला
By EditorialPublished on
नोटबंदी (Demonetisation) के फैसले की पुष्टि करके एक पुरानी बहस को मानो विराम देने की कोशिश की है। 2016 में हुई नोटबंदी को आज भी अनेक आलोचक पचा नहीं पाए हैं और इसकी आलोचना के लिए मंच तलाशे जाते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में भी ऐसी ही कोशिश हुई थी, जिस पर सबकी निगाह थी। सोमवार को 4-1 के बहुमत से सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की नोटबंदी नीति की पुष्टि कर दी है। याद रहे, नोटबंदी या विमुद्रीकरण का वह बड़ा फैसला बहुत प्रभावी रहा था, जिसके तहत एक झटके में 500 और 1000 रूपये के नोट चलन से बाहर कर दिए गए थे। संविधान पीठ में न्

x

सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) की संविधान पीठ ने नोटबंदी (Demonetisation) के फैसले की पुष्टि करके एक पुरानी बहस को मानो विराम देने की कोशिश की है। 2016 में हुई नोटबंदी को आज भी अनेक आलोचक पचा नहीं पाए हैं और इसकी आलोचना के लिए मंच तलाशे जाते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में भी ऐसी ही कोशिश हुई थी, जिस पर सबकी निगाह थी। सोमवार को 4-1 के बहुमत से सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की नोटबंदी नीति की पुष्टि कर दी है। याद रहे, नोटबंदी या विमुद्रीकरण का वह बड़ा फैसला बहुत प्रभावी रहा था, जिसके तहत एक झटके में 500 और 1000 रूपये के नोट चलन से बाहर कर दिए गए थे। संविधान पीठ में न्यायमूर्ति बी आर गवई, न्यायमूर्ति एस ए नजीर, न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रामासुब्रमण्यन एकमत थे, जबकि न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना का पक्ष अलहदा था । बहुमत के फैसले से वह सहमत नहीं थीं। वास्तव में, सरकार के इस फैसले में अदालत को कोई कानूनी या प्रक्रियागत खामी नजर नहीं आई है। अदालत में पेश दस्तावेजों के अनुसार, यह फैसला लेने से पहले केंद्र सरकार (Central Government) और भारतीय रिजर्व बैंक के बीच पर्याप्त विचार-विमर्श हुआ था । नोटबंदी के प्रस्ताव को केवल इसलिए गलत नहीं ठहराया जा सकता कि यह प्रस्ताव केंद्र सरकार की ओर से आया था। केंद्र सरकार को फैसले लेने का हक है और सरकार ने फैसला लागू करने से पहले भारतीय रिजर्व बैंक से विचार-विमर्श किया है। अदालत के फैसले की कुल ध्वनि यही है कि सरकार ऐसे किसी भी नीतिगत फैसले के लिए सक्षम है। चूंकि सरकार ने पुराने नोट बदलने के लिए लोगों को 52 दिन का समय दिया था, इसलिए उंगली उठाने का कोई खास आधार अदालत को नजर नहीं आया। ध्यान रहे कि जब 1978 में नोटबंदी हुई थी, तब महज 8 दिन का समय दिया गया था। भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) ने भी फैसले का बचाव करते हुए कहा कि फैसला मनमाना नहीं था । वह एक वैध मकसद और बेहतर विश्वास के साथ की गई कार्रवाई थी । मतलब, केंद्र सरकार के साथ-साथ रिजर्व बैंक भी जब नोटबंदी के पक्ष में आ गया, तो सर्वोच्च न्यायालय के लिए फैसला लेना आसान हो गया । वास्तव में, न्यायालय का काम केवल यह देखना होता है कि कानून या संविधान (Constitution) की पालना हुई है या नहीं। किसी नीति से किसी को लाभ या हानि संभव है, इस आधार पर उसके कानून सम्मत होने या नहीं होने का फैसला नहीं हो सकता। फिर भी ध्यान देने की बात है कि न्यायमूर्ति नागरत्ना ने इस फैसले को गैर-कानूनी करार दिया, इसे कानूनी और प्रक्रियात्मक मानदंडों का उल्लंघन करार दिया। उन्होंने तो परामर्श प्रक्रिया को भी संदिग्ध ठहरा दिया। बैंकों के केंद्रीय बोर्ड के विपरीत दृष्टिकोण की चर्चा न्यायमूर्ति नागरत्ना ने की है। कुल मिलाकर, ऐसा वर्ग हमेशा रहेगा, जो यह मानेगा कि नोटबंदी से घोषित उद्देश्य हासिल नहीं हुआ । 500 और 1,000 रूपये के नोट बाहर हुए, तो 2,000 रूपये का नोट चलन में आ गया। दो बड़े नोटों को चलन से बाहर किया गया, तो उससे भी बड़े नोट को चलन में लाया गया। वाकई, नवंबर, 2016 के पहले के दौर में हम नहीं लौट सकते, लेकिन पुराने फैसलों से सीख जरूर सकते हैं। यह अब इतिहास है कि 2016 के फैसले के खिलाफ तीन दर्जन से अधिक याचिकाएं दायर की गई थीं, लेकिन अब सर्वोच्च अदालत के फैसले के बाद नीतिगत निर्णय संबंधी आपत्तियों का पटाक्षेप हो जाना चाहिए और देश को आगे देखना चाहिए।

Editorial
Next Story
Related News
X
