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न्याय प्रणाली में सुधार का समय
By EditorialPublished on
कई विशेषज्ञों का कहना है कि अब समय आ गया है जब न्यायाधीशों की जवाबदेही के लिए कुछ विशेष व्यवस्था की जाए। कानून में यह व्यवस्था है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल छह माह में अपने निर्णय देगा, किंतु इसमें करीब चार साल तक लग जाते हैं। इस प्रकार के मामलों में जजों का मूल्यांकन कराया जाना चाहिए और जो समयबद्ध तरीके से कामकाज न कर रहे हों, उनकी पदोन्नति रोकी जानी चाहिए अथवा उन्हें सेवा मुक्त किया जाना चाहिए। इससे होगा यह कि न्यायधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने की जरूरत भी नहीं होगी और न्यायिक कार्यों में कुशलता और न

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लालजी जायसवाल : पिछले दिनों केंद्रीय कानून और न्याय मंत्रालय के न्याय विभाग ने जजों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने के लिए एक संसदीय पैनल को बताया कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने का गलत असर होगा। इससे काम नहीं करने वाले जजों की सेवा की अवधि भी बढ़ सकती है। केंद्र और राज्य स्तर पर सरकारी कर्मचारी भी इसी तरह की मांग उठा सकते हैं। इसलिए इस फैसले को लागू करने से पहले इस पर विचार और इसकी जांच जरूरी है। इसके अलावा न्याय विभाग ने कई न्यायिक प्रक्रियाओं और सुधारों की भी बात कही है। बीते साल जुलाई में कानून मंत्री किरण रिजिजू (Law Minister Kiren Rijiju) ने संसद को सूचित किया था कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। अभी हाई कोर्ट के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु में सेवानिवृत होते हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होते हैं। हाई कोर्ट के न्यायधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष करने के लिए साल 2010 में संसद में संविधान (Constitution) का 114वां संशोधन विधेयक पेश किया गया था। हालांकि तब संसद में उस पर विचार नहीं किया जा सका और 15वीं लोकसभा (Lok Sabha) के विघटन के साथ ही इसकी अवधि भी समाप्त हो गई देखा जाए तो न्याय में जवाबदेही, पारदर्शिता और सुनवाई में लगने वाले समय को लेकर देश में सदैव मंथन होता रहा है। इसके बावजूद भी कुछ विशेष सुधार पर अभी तक नहीं पहुंचा जा सका है। अभी तक इसका भी कोई ठोस उपाय नहीं किए जा सके हैं जिससे लंबित मामलों का त्वरित निपटारा हो सके।
कई विशेषज्ञों का कहना है कि अब समय आ गया है जब न्यायाधीशों की जवाबदेही के लिए कुछ विशेष व्यवस्था की जाए। कानून में यह व्यवस्था है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल छह माह में अपने निर्णय देगा, किंतु इसमें करीब चार साल तक लग जाते हैं। इस प्रकार के मामलों में जजों का मूल्यांकन कराया जाना चाहिए और जो समयबद्ध तरीके से कामकाज न कर रहे हों, उनकी पदोन्नति रोकी जानी चाहिए अथवा उन्हें सेवा मुक्त किया जाना चाहिए। इससे होगा यह कि न्यायधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने की जरूरत भी नहीं होगी और न्यायिक कार्यों में कुशलता और निष्पादन क्षमता में वृद्धि भी होगी। न्यायिक कार्य त्वरित होने लगेंगे और 'ईज आफ जस्टिस' की अवधारणा भी साकार होगी ।
लंबित नियक्तियों पर विचार जरूरी : देश में न्यायिक कार्यों में देरी की सबसे बड़ी वजह जजों की कमी मानी जाती है, जो न्यायिक सेवा की गति प्रभावित करती है । भारत में प्रति दस लाख की जनसंख्या पर मात्र 11 जज हैं। जबकि आस्ट्रेलिया में 42, कनाड़ा में 75 और ब्रिटेन में 51 जज हैं । न्याय मिलने में हो रही देरी से 160 देशों के नागरिकों की तुलना में कहीं अधिक भारतीय न्याय से वंचित हैं। उल्लेखनीय है कि अगस्त 2022 में उच्च न्यायालयों में जजों की 1,108 में से तकरीबन 381 रिक्तियां थीं। निचली अदालतों में स्वीकृत 24,631 में से तकरीबन 5,342 सीटें खाली थीं । अदालतों में अगस्त 2022 तक लगभग 5 करोड़ तक मामले लंबित थे।
एक विस्तृत विश्लेषण से पता चलता है कि 2006 और 2017 के बीच लंबित मामलों में औसत वृद्धि लगभग 2.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष थी। जबकि स्वीकृत न्यायिक पदों में औसत रिक्ति लगभग 21 प्रतिशत थी । यदि स्वीकृत पदों को भरा गया होता तो हर साल लंबित मामलों की संख्या कम हो जाती । न्यायाधीशों के चयन की जिम्मेदारी काफी हद तक न्यायपालिका की ही होती है। ऐसा न कर पाने की स्थिति में उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ही जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
तय अवधि में निपटें मुकदमे : न्यायालयों को मुकदमों के बोझ से निजात दिलाने के लिए केंद्र ने कुछ साल पहले एक राष्ट्रीय मुकदमा नीति बनाने की बात कही थी। इसके अंतर्गत प्रमुख लंबित मुकदमों की औसत अवधि को पंद्रह साल से कम करके तीन साल करने तथा न्यायालय के समय का सदुपयोग करने के लिए सभी न्यायालयों में कोर्ट प्रबंधकों की नियुक्ति करने जैसी बातें शामिल थीं लेकिन दुर्भाग्यवश यह मामला आगे नहीं बढ़ा। हमें ध्यान रखना होगा कि जब तक मुकदमों की एक अवधि तय नहीं की जाएगी, न्यायिक निर्णय आने में कई वर्ष लगते रहेंगे जिससे 'ईज आफ जस्टिस' की अवधारणा दरकिनार ही रहेगी। सर्वविदित है कि ज्यादातर मुकदमे छोटे- छोटे झगड़ों, आपसी अहंकार, यातायात से संबंधित अपराध से संबंधित होते हैं। इस प्रकार के मामलों में दोनों पक्षकारों के बीच बातचीत के जरिये भी समझौता करवाया जा सकता है। इसके लिए अभी लोक अदालतों- समझौता अदालतों की व्यवस्था है। इनका अधिक से अधिक सदुपयोग किया जाना चाहिए।
उच्चतम न्यायालय की गठित हों कई पीठ : इसके साथ-साथ न्याय आयोग की 125वीं और 229वीं रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए उच्चतम न्यायालय को चाहिए कि वह अलग-अलग राज्यों में उच्चतम न्यायालय की पीठ की स्थापना पर पुनर्विचार करे। साथ में एडवोकेट अधिनियम, 1961 के अनुसार बार काउंसिल भी सक्रिय भूमिका निभाए। अगर वह ऐसा करने में सक्षम नहीं है तो यह अधिकार वापस न्यायालय को दे दिया जाए और अपीलीय न्यायालयों की स्थापना की जाए। संविधान के अनुच्छेद 130 के अनुसार उच्चतम न्यायालय को देश के अन्य भागों में भी विशेष न्यायालय आयोजित करने की सलाह दी गई है। किंतु काम की अधिकता के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाता । आजकल हर छोटे-मोटे मामले भी उच्चतम न्यायालय तक पहुंचने लगे हैं। अब उसकी भूमिका अंतिम अपील वाले न्यायालय की न होकर लगता है कि मात्र एक जिला न्यायालय जैसी हो गई है। बहरहाल इस पर विचार किया जाना चाहिए ।
छुट्टियों में कटौती का तर्क कितना सही : न्याय व्यवस्था (judicial system) में कार्य दिवसों की कमी भी न्यायिक कार्यों में विलंब का एक विशेष कारण है। एक अध्ययन के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में वर्ष भर में मात्र 190 दिन ही काम होता है। गर्मी के दो महीने उच्चतम एवं उच्च न्यायालय बंद रहते हैं। ऐसे में न्यायपालिका के सभी स्तरों पर कार्य के दिवस बढ़ाए जाने चाहिए लेकिन हमें ध्यान देना होगा कि सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है। इसके फैसले अगर हड़बड़ी या हर पहलू को बगैर समझे लिए गए तो लोगों का न्याय से विश्वास उठ जाएगा। ऐसे में यह मांग ठीक नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जज लंबी छुट्टियों पर जाने की परंपरा बंद करें, ताकि ज्यादा मामलों का निपटारा हो सके । कम ही लोग जानते हैं कि फैसले के पहले जजों को घर पर देर रात तक घंटों तैयारी करनी होती है । गवाहों और सुबूतों से जुड़े सैंकड़ों हजारों पेज पढ़ने होते हैं जिससे निर्णय तक पहुंचने में मदद मिलती है। संवैधानिक पहलू के अलावा सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक लगभग हर आयाम पर गौर करने के बाद यानी ही फैसले दिए जाते हैं। लिहाजा लोगों के मन में यह गलत धारणा है कि न्यायाधीश अपनी छुट्टियों का आनंद लेते हैं और ऐसे समय में आराम से रहते हैं। इस तरह का सोच सही नहीं है। बता दें कि लगभग सभी न्यायाधीश सप्ताहांत और अदालती छुट्टियों के दौरान भी अनुसंधान करने और लंबित फैसलों को लिखने के लिए काम करना जारी रखते हैं। इस प्रक्रिया में वे अपने जीवन की कई खुशियों को भी खो देते हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति जयंत नाथ ने पिछले साल कहा था कि अदालतों के स्कूलों की तरह छुट्टियों पर जाने की जनता की धारणा सही नहीं है।

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