year full of possibilities 2023
संजय गुप्त : वर्ष हर किसी के लिए नई उमंग लेकर आता है। निजी जीवन में सुखद भविष्य के साथ ही सभी को यह उम्मीद भी होती है कि देश का विकास तेजी के साथ हो और इसका लाभ हर एक को मिले। यदि देश का माहौल सकारात्मक हो तो देशवासियों का जीवन भी सकारात्मकता से भरपूर रहता है। आजादी के बाद से जहां कई वर्ष माहौल सकारात्मक रहा, वहीं कई वर्ष ऐसे भी रहे, जब देश के सामने गंभीर चुनौतियां रहीं । यह स्पष्ट है कि अंतरराष्ट्रीय कारणों के चलते नए वर्ष में देश के सामने आर्थिक चुनौतियां रहेंगी, फिर भी यह वर्ष संभावनाओं भरा दिख रहा है।
बीते वर्ष कोविड के बाद विश्व की आर्थिक स्थिति के पटरी पर लौटने की जो उम्मीद जगी थी, वह पूरी नहीं हो पाई। यूक्रेन और रूस के युद्ध ने आर्थिक मोर्चे पर विश्व के सामने तमाम चुनौतियां पेश कर दीं। जहां यूरोप मंदी का सामना कर रहा है, वहीं अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने से उसकी विकास की गति थमी है। जब विकसित देश मंदी की चपेट में आते हैं तो उसका सीधा असर विकासशील देशों पर पड़ता है। विकासशील देश होने के कारण भारत भी अछूता नहीं रहेगा। यह तो मोदी सरकार की कूटनीतिक सफलता रही कि पिछले वर्ष विश्व के प्रमुख देशों की तमाम आपत्तियों के बाद भी भारत ने रूस से तेल खरीदना जारी रखा। इसके कारण भारत रूस- यूक्रेन युद्ध के असर से एक हद तक बचा रहा। पिछले वर्ष भारत की विकास दर विश्व के तमाम देशों की तुलना में बेहतर रही। कुछ आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि नए वर्ष के पहले चार-पांच महीने चुनौतीपूर्ण रहेंगे, पर यदि सरकार का आम बजट विकासोन्मुख हो और उसमें लोक लुभावन नीतियों की भरमार न हो तो चुनौतियों से निपटा जा सकता है, लेकिन ऐसा तभी होगा, जब उद्योग जगत अपनी कर्मठता दिखाए । विश्व में मंदी के माहौल के बाद भी भारत अपने दम पर आर्थिक विकास को आगे खींच सकता है। जैसे उद्योग-व्यापार जगत से यह उम्मीद है कि वह आर्थिक विकास को लेकर समर्पित रहे, वैसे ही जनता से भी अपेक्षा है कि वह देश के उत्थान को लेकर प्रतिबद्ध रहने के साथ नियम-कानूनों के पालन को लेकर निष्ठावान रहे। आम जनता का समर्पण और अनुशासन ही किसी देश को चुनौतियों से लड़ने में सक्षम बनाता है।
देश के आंतरिक माहौल को सही रखने में राजनीति की एक बड़ी भूमिका होती है। चूंकि इस वर्ष नौ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, लिहाजा पूरे वर्ष राजनीतिक उठापटक जारी रहेगी और पक्ष-विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलेगा । अगले वर्ष यानी 2024 में लोकसभा चुनाव होने के कारण केंद्र सरकार भी इस वर्ष के अंत तक आते-आते चुनावी मोड में जाएगी। चुनावी माहौल में राजनीतिक दल किसी भी विषम परिस्थिति का लाभ लेने और समाज को बरगलाने के लिए तत्पर रहते हैं। ऐसे में देश की जनता से यही अपेक्षित है कि वह अपने विवेक का परिचय देने के साथ समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्यों को लेकर सजग रहे। समाज में सद्भाव कायम रहे, इसकी चिंता भी आम जनता को करनी होगी ।
राजनीतिक दलों के दृष्टिकोण से बीता वर्ष भाजपा के लिए कहीं अधिक ठीक ठाक रहा। उसने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा के साथ मणिपुर में राजनीतिक सफलता हासिल करने के बाद गुजरात चुनाव भी शानदार तरीके से जीता। इसके अलावा वह महाराष्ट्र की सत्ता में साझीदारी करने में सफल रही। देवेंद्र फणनवीस और एकनाथ शिंदे की जोड़ी ने विपक्ष को उसी के खेल में मात दी। एक समय महाराष्ट्र में जो काम उद्धव ठाकरे ने किया था, वही काम बीते वर्ष बिहार में नीतीश कुमार ने किया। उन्होंने भाजपा से नाता तोड़कर राजद के साथ सरकार बनाई। यह भाजपा के लिए ठीक ही रहा, क्योंकि उसे बिहार में खुद के बलबूते अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर मिला। इस वर्ष जो विधानसभा चुनाव होने हैं, उनमें कर्नाटक, मध्यप्रदेश, त्रिपुरा में भाजपा को सत्ता में वापसी के लिए संघर्ष करना पड़ेगा ।
मध्य प्रदेश में दो वर्ष पूर्व ज्योतिरादित्य सिंधिया के पाला बदलकर भाजपा में आने के कारण कमलनाथ की सरकार गिरी थी और शिवराज सिंह सरकार फिर से बनी थी। चूंकि शिवराज सिंह एक लंबे समय से सत्ता में हैं इसलिए भाजपा को सत्ता विरोधी रूझान का सामना करना पड़ेगा । यही हाल कर्नाटक और त्रिपुरा में भी हो सकता है। राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है, लेकिन वहां सत्ता में बदलाव का चलन रहा है। छतीसगढ़ में बघेल सरकार ठीक-ठाक काम कर रही है, पर कांग्रेस की राजनीतिक कमजोरी भाजपा के लिए एक अवसर बन सकती है। इस वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा इसका ध्यान अवश्य रखेगी कि उसे अगले वर्ष लोकसभा चुनाव में उतरना है। इसके चलते वह ऐसे फैसलों से बचना चाहेगी जो जनता को रास न आएं। दूसरी ओर विपक्षी दल जनता को लोक लुभावन सपने दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे । इस कोशिश में वे आर्थिक नियमों की अनदेखी कर सकते हैं। लोगो को ऐसे लोक लुभावने वादों की परख अच्छे से करनी होगी। चूंकि नए वर्ष क आगमन एक ऐसे समय हो रहा है, जब कोविड महामारी के नए सिरे से सिर उठाने का अंदेशा है, इसलिए सतर्कता बरतने की आवश्यकता है।
भले ही चीन कोविड महामारी को नियंत्रण में बता रहा हो और पश्चिमी देशों की समाचार एजेंसियों के दावों को खारिज कर रहा हो, लेकिन उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इस कारण भारत को भी सावधान रहना होगा और देश के लोगों को भी। विशेषज्ञों का कहना है कि टीकाकरण अभियान की सफलता के चलते भारत में हाईब्रिड इम्यूनिटी पैदा हो गई है। आशा करनी चाहिए कि कोवि की चौथी लहर देश को उस तरह प्रभावित नहीं करेगी, जिस तरह डेढ़ वर्ष पूर्व दूसरी लहर ने किया था। लोगों को कोविड से सतर्क रहने के साथ ही अनुशासित नागरिक के तौर पर अपने हिस्से की जिम्मेदारियों का निर्वाह सही तरीके से करने के लिए तत्पर रहना होगा । यदि भारतवासी समर्पण और अनुशासन के साथ राष्ट्र के प्रति सच्ची निष्ठा का परिचय दें तो भारत हर तरह की चुनौती का सामना कर सकता है। आइए हम सब नव वर्ष पर अपनी जिम्मेदारी निभाने का प्रण लें। सभी के लिए नववर्ष मंगलकारी हो ।
Editorial

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