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सुनहरे कल के लिए
By EditorialPublished on
इन्हें शासन और प्रशासन, दोनों की ओर से विकसित करना होगा। जब ऐसा हो जाए तो फिर आम जनता को उनके अनुरूप अपने आचार-व्यवहार को बदलना होगा। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि विभिन्न समस्याओं के समाधान की आवश्यकता तो खूब जताई जाती है, क्योंकि तथ्य यह भी है कि इसे लेकर असहमति का वातावरण बनता रहता है कि किसी समस्या का समाधान किस तरीके से किया जाना है? इसके चलते समस्याएं वर्षों तक समाधान की प्रतीक्षा करती रहती हैं। इससे अच्छा और कुछ नहीं कि इस नए वर्ष में समस्याओं का मिलकर समाधान करने को लेकर सहमति बने और फिर वह एक सा

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वर्ष की प्रतीक्षा समाप्त हुई और इसी के साथ जग उठी इस वर्ष कुछ अच्छा और अनुपम होने की आशा- न केवल व्यक्तिगत जीवन में, बल्कि राष्ट्र जीवन में भी । इसके लिए चिंतन-मनन के स्तर पर भी परिवर्तन लाना होगा और कार्यशैली के स्तर पर भी । यह परिर्वतन न केवल होना चाहिए, बल्कि हर स्तर पर दिखना भी चाहिए, क्योंकि तभी उन समस्याओं से पार पाया जा सकता है, जो देश के समक्ष उपस्थित हैं । समस्याओं की अनदेखी करने अथवा उन्हें टालने की प्रवृत्ति से वे और अधिक बढ़ने के साथ जटिल भी होती हैं। यह आशा की जानी चाहिए इस नए वर्ष में इस प्रवृत्ति से छुटकारा मिलेगा और समस्याओं के तात्कालिक और साथ ही दीर्घकालिक समाधान खोजने के नए एवं प्रभावी तौर-तरीके विकसित किए जाएंगे। इन्हें शासन और प्रशासन, दोनों की ओर से विकसित करना होगा। जब ऐसा हो जाए तो फिर आम जनता को उनके अनुरूप अपने आचार-व्यवहार को बदलना होगा। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि विभिन्न समस्याओं के समाधान की आवश्यकता तो खूब जताई जाती है, क्योंकि तथ्य यह भी है कि इसे लेकर असहमति का वातावरण बनता रहता है कि किसी समस्या का समाधान किस तरीके से किया जाना है? इसके चलते समस्याएं वर्षों तक समाधान की प्रतीक्षा करती रहती हैं। इससे अच्छा और कुछ नहीं कि इस नए वर्ष में समस्याओं का मिलकर समाधान करने को लेकर सहमति बने और फिर वह एक साझा एजेंडे का रूप ले। आने वाले कल को सुनहरा बनाने का यही सर्वोत्तम उपाय है। नया वर्ष न केवल उम्मीदें लेकर आता है, बल्कि चुनौतियां भी। नई चुनौतियों में कुछ पुरानी चुनौतियां भी जुड़ जाती हैं। आने वाले कल को बीते हुए कल से बेहतर करने के लिए यह आवश्यक है कि हमारे नीति नियंता नई-पुरानी चुनौतियों से प्राथमिकता के आधार पर पार पाने का संकल्प लें। हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि सबने यह ठाना था कि देश को आत्मनिर्भर बनाना है, लेकिन इस अभीष्ट की पूर्ति नहीं हो सकी तो इसीलिए, क्योंकि उन तरीकों पर सहमति नहीं बन सकी, जिन पर अमल किया जाना था। कम से कम इस नए वर्ष में तो देश को वास्तव में आत्मनिर्भर बनाने की न केवल ठोस रूपरेखा बने, बल्कि उस पर पूरी गंभीरता साथ अमल भी हो। ऐसा ही कुछ अन्य अनेक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए भी करना होगा। भारत को केवल आत्मनिर्भर ही नहीं बनना, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने कद को भी बढ़ाना और विश्व को राह भी दिखानी है। इसमें सफलता तब मिलेगी, जब हम एक राष्ट्र के रूप में देशवासियों के साथ विश्व समुदाय की अपेक्षाओं पर भी खरा उतरेंगे। अब भारत एक ऐसे मोड़ पर है, जिसमें विश्व भी हमसे कुछ आस लगाए है। इन्हें पूरा करना सबका साझा उद्देश्य बने, इस आशा के साथ नव वर्ष की शुभकामनाएं।

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