✕
लालू और मायावती की याद दिला रहा 'मामा' का 'नायक' अवतार
By EditorialPublished on
साल 1990 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने लालू प्रसाद यादव की अपनी अलग कार्यशैली थी। वे समाज के जिस तबके के समर्थन से सीएम बने थे, उसमें शिक्षा का स्तर बेहद कमजोर था। यह तबका सरकारी अधिकारियों से खौफ खाता था। इस खौफ को दूर करने के लिए लालू ने यह तरीका अपनाया था। वे अक्सर मंच से या लोगों की भीड़ के बीच ही डीएम और एसपी जैसे शीर्ष अधिकारियों को निलंबित करने का फरमान सुना देते थे। इसके जरिए वे अपने समर्थकों को यह संदेश देते कि उनके बीच से निकला शख्स भी अधिकारियों पर अपना आदेश चला सकता है। उत्तर प्रदेश में

x

भोपाल (एजेंसी) : मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इन दिनों अलग ही अंदाज में नजर आ रहे हैं। सिंघम बनकर अपराधियों और माफियाओं को धमकी देने वाले शिवराज अब नायक अवतार में दिख रहे हैं। वे भ्रष्टाचार और लापरवाही के आरोपी अधिकारियों को मंच से ही सस्पेंड कर रहे हैं। बीते एक महीने में वे 15 से ज्यादा अधिकारियों के खिलाफ ऑन द स्पॉट कार्रवाई कर चुके हैं। शिवराज के बदले तेवरों से सरकारी अधिकारियों में हड़कंप मचा हुआ है। उनका यह अंदाज 1990 और 2000 के दशकों में लालू प्रसाद यादव और मायावती की कार्यशैली की यादें ताजा कर रहा है। बिहार और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए ये दोनों नेता भी सरकारी अफसरों के खिलाफ अक्सर मंच से ही कार्रवाई का ऐलान करते थे ।
लालू और मायावती की याद
साल 1990 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने लालू प्रसाद यादव की अपनी अलग कार्यशैली थी। वे समाज के जिस तबके के समर्थन से सीएम बने थे, उसमें शिक्षा का स्तर बेहद कमजोर था। यह तबका सरकारी अधिकारियों से खौफ खाता था। इस खौफ को दूर करने के लिए लालू ने यह तरीका अपनाया था। वे अक्सर मंच से या लोगों की भीड़ के बीच ही डीएम और एसपी जैसे शीर्ष अधिकारियों को निलंबित करने का फरमान सुना देते थे। इसके जरिए वे अपने समर्थकों को यह संदेश देते कि उनके बीच से निकला शख्स भी अधिकारियों पर अपना आदेश चला सकता है। उत्तर प्रदेश में मायावती का भी कमोबेश यही हाल था। मायावती भी अपने समर्थकों को एम्पावरमेंट का अहसास कराने के लिए अधिकारियों के खिलाफ इसी अंदाज में कार्रवाई करती थीं ।
शिवराज के अंदाज वही, हालात अलग
शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश में लालू यादव और मायावती के अंदाज में कार्रवाई कर रहे हैं, लेकिन उनके हालात अलग हैं। शिवराज सबसे लंबे समय से म.प्र. के मुख्यमंत्री हैं। उनकी पार्टी भाजपा की जड़ें भी राज्य में गहरी जमी हुई हैं। शिवराज को उनके समर्थकों को एम्पावर्ड फील कराने की जरूरत नहीं है। अपनी इस शैली से शिवराज दरअल अपनी पुरानी छवि को बदलने की कोशिश कर रहे हैं। शिवराज की छवि एक सौम्य और सहज राजनेता की है। वे सबको साथ लेकर चलने में यकीन करते हैं, लेकिन अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए वे अपनी नो नॉनसेंस छवि लोगों के सामने पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। 2020 में चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के साथ ही उन्होंने इसकी शुरूआत कर दी थी। पहले उनके निशाने पर अपराधी और माफिया हुआ करते थे। अब भ्रष्ट और लापरवाह अधिकारी भी हैं।
नतीजों पर संशय
शिवराज की यह कार्यशैली कितनी कारगर होगी, इसका अंदाजा लगाना फिलहाल मुश्किल है। बिहार और यूपी में यह के लोग आज भी जंगलराज के रूप में याद करते हैं। लालू खुद तरीका खास सफल नहीं रहा था। लालू के कार्यकाल को बिहार के शासनकाल में यूपी में भी भ्रष्टाचार कानून व्यवस्था की हालत भ्रष्टाचार के मामलों में कई साल तक जेल में रह चुके हैं। मायावती बेहद खराब थी। मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद मायावती पर भी भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे।
कामयाब होगा पॉपुलिस्ट अंदाज
अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा को एंटी इनकम्बेंसी का डर सता रहा है। डर इस बात का भी है कि बदलाव पसंद युवा मतदाता भाजपा से दूर न चले जाएं। शिवराज ने अपनी छवि बदलने के लिए इसीलिए यह पॉपुलिस्ट तरीका अपनाया है। अच्छी बात यह है कि जिलों में औचक निरीक्षण के लिए जाने से पहले शिवराज वहां के अधिकारियों का फीडबैक लेते हैं। जिन अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार और लापरवाही की शिकायत होती है, उनके खिलाफ तत्काल कार्रवाई करते हैं। देखना यह है कि उनका यह बदला अंदाज चुनावलों में भाजपा के लिए फायदेमंद साबित होता है या नहीं।

Editorial
Next Story
Related News
X
