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संसद से उठते सवाल
By EditorialPublished on
क्षमता में अंतर प्रक्रियाओं और परिणामों में, नीति निर्माण और सरकारी स्तरों पर इसके कार्यान्वयन में राज्य सरकारों में अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। इसी के चलते विगत अक्तूबर में प्रधानमंत्री ने 18 महीनों में 10 लाख लोगों की भर्ती के लिए रोजगार मेला शुरू किया। लेकिन इस लक्ष्य को व्यवस्थागत उदासीनता ने चुनौती दी है। सवालों और सर्कुलरों के बावजूद पिछले पांच वर्षों में केंद्र सरकार ने 3.77 लाख पदों पर भर्तियां की हैं, यानी मोटे तौर पर एक साल में 62,000 । जैसा कि सबको मालूम है, महामारी के दौरान लाखों बच्चे द

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शंकर अय्यर : संसद का हर सत्र अपने साथ खासकर राज्यों के बारे में कुछ कुछ लेकर आता है। विश्लेषण करने पर सूचनाएं उन जवाबों का खुलासा करती हैं, जो अक्सर शासन की खामियों के बारे में सवाल करते हैं, जिनके साथ लोग जीने को मजबूर होते हैं। पैदा यहां संसद में पेश किए गए कुछ तथ्यों का जिक्र किया जा रहा है।
चीन में संक्रमण बढ़ने के साथ कोविड पर फिर चर्चा शुरू हो गई है । स्वास्थ्य के लिए आवंटन वर्ष 2017-18 के 47,353 करोड़ रू. से बढ़कर 2022-23 में 83,000 करोड़ रू. हो गया है। इसके अलावा स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे के लिए वित्त आयोग ने स्थानीय निकायों को 70,051 करोड़ का अनुदान दिया है। हालांकि धन के आवंटन ने स्वास्थ्यकर्मियों की कमी को दूर नहीं किया है। केंद्र द्वारा प्रबंधित देश भर के 11 प्रमुख अस्पतालों और संस्थानों में डॉक्टरों के स्वीकृत 74,813 पदों में से 30,512 पद रिक्त हैं, जो ज्यादातर दिल्ली के बाहर नए एम्स अस्पतालों में हैं। भारत की मौजूदा 1.4 अरब की आबादी के लिए 13,08,009 एलोपैथिक डॉक्टर (तथा 5.6 लाख आयुष डॉक्टर) हैं और प्रति 1,000 लोग पर दो नर्सों हैं। स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच को प्रभावित करने वाली क्षमता में कमी ग्रामीण भारत में सबसे अधिक है। जिला अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों के 18,900 से अधिक पद खाली हैं। इसके अलावा पैरामेडिक्स, फार्मासिस्ट और टेक्निशियन के पद भी खाली हैं। प्राथमिक केंद्रों को कल्याण केंद्रों में बदलने के वादे पर अब भी काम चल रहा है।
भारत के राजनीतिक आख्यान में बेरोजगारी के मुद्दे पर निरंतर बहस चलती रहती है। बहस के बावजूद भारत अब भी रिक्त पदों और नौकरियों की आवश्यकता के विरोधाभासी सह-अस्तित्व का गवाह बना हुआ है। पे रिसर्च यूनिट की एक रिपोर्ट के हवाले से सरकार ने खुलासा किया केंद्र सरकार के विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) में 9.79 लाख पद खाली पड़े हैं- रक्षा, गृह, रेलवे, डाक और राजस्व मंत्रालयों में 5 लाख से अधिक रिक्त पद हैं।
क्षमता में अंतर प्रक्रियाओं और परिणामों में, नीति निर्माण और सरकारी स्तरों पर इसके कार्यान्वयन में राज्य सरकारों में अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। इसी के चलते विगत अक्तूबर में प्रधानमंत्री ने 18 महीनों में 10 लाख लोगों की भर्ती के लिए रोजगार मेला शुरू किया। लेकिन इस लक्ष्य को व्यवस्थागत उदासीनता ने चुनौती दी है। सवालों और सर्कुलरों के बावजूद पिछले पांच वर्षों में केंद्र सरकार ने 3.77 लाख पदों पर भर्तियां की हैं, यानी मोटे तौर पर एक साल में 62,000 । जैसा कि सबको मालूम है, महामारी के दौरान लाखों बच्चे दो साल तक स्कूल नहीं जा पाए। पिछले हफ्ते सरकार ने संसद को बताया कि वर्ष 2020- 21 और 2021-22 के बीच 20,000 से अधिक स्कूल बंद हो गए हैं और भारतीय स्कूलों में शिक्षकों की संख्या में 1.89 लाख की गिरावट आई है। इसका पहले से ही खराब शैक्षणिक व्यवस्था पर प्रभाव पड़ना लाजिमी है।
बढ़ती अर्थव्यवस्था को कुशल लोगों की जरूरत है। किसी भी कौशल विकास कार्यक्रम की सफलता सफल प्लेसमेंट (रोजगार) पर निर्भर करती है। इसी हफ्ते श्रम मंत्रालय की संसद की स्थायी समिति के एक संक्षिप्त विवरण के अनुसार, 30 जून, 2022 तक पीएम कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई) -3 के तहत प्रशिक्षित 3.99 लाख प्रमाणित उम्मीदवारों में से केवल 30,599 को ही नौकरी मिली। पीएमकेवीवाई के पिछले संस्करणों में 91.38 लाख प्रमाणित उम्मीदवारों में से मुश्किल से एक चौथाई या 21.32 लाख लोगों को रोजगार मिला था। इसके अलावा औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) में भी कौशल प्रदान किए जाते हैं। तथ्य यह है कि इन आईआईटी में प्रशिक्षण का कार्य संकायों की कमी से प्रभावित होता है। श्रम मंत्रालय की नीति और कार्यान्वयन की देख-रेख करने वाली समिति ने पाया कि मई, 2022 तक देश में आईटीआई में संकायों के 1.99 लाख मंजूर पदों में से 1.29 लाख पद खाली पड़े थे ।
दिवालिया कानून (आईबीसी) लागू करने को आर्थिक सुधारों में मील का पत्थर बताया गया था। लेकिन आईबीसी के जरिये बैंकों में बुरे ऋण की सफाई की सफलता नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के कारण बाधित है। संसद में पेश आंकड़े बताते हैं कि विगत 31 अक्तूबर तक एनसीएलटी में 12,871 मामले लंबित थे। दिसंबर, 2021 तक, 444 मामलों में आईबीसी प्रक्रिया से 7.54 लाख करोड़ रूपये में से 2.5 लाख करोड़ रूपये वसूल किए गए हैं। इस बीच पिछले पांच वर्षों में बैंकों ने 10,09,511 करोड़ रूपये को बट्टे खाते में डाल दिया। ग्रामीण भारत का विकास पंचायतों के सशक्तीकरण पर निर्भर है। ग्रामीण विकास पर स्थायी समिति ने पाया कि पंचायतों को पंचायत भवनों के निर्माण, कंप्यूटरीकरण और तकनीकी जनशक्ति के लिए धन की भारी कमी है। राज्य सरकारों द्वारा तय मानदंडों का पालन नहीं किए जाने के कारण धन आवंटित नहीं किया गया।
कहा जाता है कि अगर समस्या की पहचान और माप हो जाए, तो उसे सुधारा जा सकता है। लेकिन भारत में यह जरूरी नहीं है । उद्योगपति साइरस मिस्त्री का निधन भारतीय राजमार्गों पर यातायात के खतरे को रेखांकित करता है। दुर्घटनाओं के कारणों में से एक खराब तरीके से बनाई गई सड़कें हैं। लेकिन सड़क परिवहन मंत्रालय का ट्रांसपोर्ट रिसर्च विंग सड़क इंजीनियरिंग दोषों के आधार पर हुई सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़ों का संकलन नहीं करता है। ध्यान रहे, हमारे देश में हर साल डेढ़ लाख से ज्यादा लोग सड़क हादसों में मारे जाते हैं।
वर्षों से एक के बाद एक आने वाली सरकारों ने सड़कों पर 15 साल से अधिक पुराने वाहनों को प्रतिबंधित करने की वकालत की है। नए वाहन खरीदने की लागत को देखते हुए यह मुद्दा एक राजनीतिक फंदा है। विगत नवंबर में सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर 15 साल पुराने सभी सरकारी वाहनों के पंजीकरण के नवीनीकरण पर रोक लगा दी है । इस तरह से करीब 1.28 लाख वाहन के स्क्रैप (बेकार) हो जाने की आशंका है। सवाल उठता है कि सरकार के पास कितनी वाहनें हैं। इस बीच वाहनों को स्क्रैप किए जाने का फैसला विभागों पर छोड़ दिया गया है।

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