G20 SUMMIT-PM Narendra Modi
जी- 20 इन दिनों चर्चा में है। दिसंबर में ही भारत ने इस वैश्विक समूह की कमान संभाली है। अध्यक्षता संभालने के अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने 'एक पृथ्वी, एक परिवार, एक 'भविष्य' के मंत्र का आह्वान किया। उन्होंने इसके पीछे की संकल्पना का भी उल्लेख किया, 'कोई विकसित दुनिया और कोई तीसरी दुनिया नहीं' और 'एक विश्व' कहने का यही आशय है कि समूची मानवता 'एक परिवार' के रूप में साझा समृद्धि करे और अशक्त पक्ष को 'एक भविष्य' के लिए सहारा देकर सशक्त बनाया जाए। ये सभी बातें तो प्रशंसनीय हैं, लेकिन वास्तविक राजनीतिक प्रकृति को देखते हुए सवाल उनके फलदायी होने को लेकर जुड़ा है। भूराजनीतिक हलचल, दक्षिणपंथी राजनीति, उद्दंड तानाशाही और आर्थिक राष्ट्रवाद जैसी दुर्दात चुनौतियां इस राह में कुछ बड़े अवरोध के रूप में दिखती हैं। साथ ही, रूस- यूक्रेन युद्ध, कोविड महामारी का काला साया जलवायु आपदाएं और भूमंडलीकरण से प्रत्येक स्तर पर विचलन से उपजी बेलगाम महंगाई, ब्याज दरों में तेजी का सिलसिला और निरंतर बढ़ती आर्थिक दुश्वारियां स्थिति को और बिगाड़ने वाली हैं। संप्रति विश्व समुदाय के लिए गंभीर चुनौतियां हैं। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में राजनीतिक विमर्श भी आर्थिक वृद्धि उदासीनता को दर्शाने वाला है।
यहां कुछ तथ्यों की पड़ताल उपयोगी होगी। पिछली सदी के नौवें दशक के मध्य से 2007 के बीच की अवधि को 'व्यापक समभाव' का दौर माना जाता है, जब दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं वृद्धि की ओर उन्मुख हो रही थीं, जिसमें करोड़ों लोगों को भयावह गरीबी और अभावग्रस्तता के दुष्चक्र से बाहर निकाला गया। व्यापक भूराजनीतिक शांति, संयमित राजनीतिक नेतृत्व, कम मुद्रास्फीति, निचली ब्याज दरें, भूमंडलीकरण की गहरी होती पैठ और पूंजी के मुक्त प्रवाह जैसे पहलुओं ने इसमें प्रभावी भूमिका निभाई। डेविड रिकार्डो का तुलनात्मक लाभ सिद्धांत साकार होता दिखने के साथ ही आर्थिक वृद्धि पर भी सार्वभौमिक ध्यान केंद्रित था । दुर्भाग्यवश, ये पहलू अब कमजोर पड़ रहे हैं और दुनिया भर में आर्थिक मुश्किलें एवं असमानता बढ़ती दिख रही है।
विकसित देशों में कामकाजी आबादी, विस्थापन और महिलाओं की व्यापक भागीदारी के साथ ही तकनीकी उन्नयन ने कुल कारक उत्पादकता यानी टीएफपी की वृद्धि में अहम योगदान दिया । टीएफपी कामकाजी आबादी के ज्ञान में आए परिवर्तन और तकनीकी प्रगति के प्रभाव का आकलन करता है। इसके माध्यम से किसी आर्थिक प्रणाली में दीर्घकालिक उत्पादन पर इन परिवर्तनों के प्रभावों के आकलन का प्रयास होता है। फिलहाल जननांकीय स्थिति प्रतिकूल हो रही है, विस्थापन को रोका जा रहा है और महिलाओं की भागीदारी चरम पर पहुंच गई है। कोविड ने काम को लेकर हिचक बढ़ाई है। तकनीकी सुधार अपनी एक सीमा में ही योगदान कर पा रहे हैं। स्मरण रहे कि विकासशील देशों को आउटसोर्सिंग, पूंजी के पर्याप्त प्रवाह और तकनीकी विकास की साझेदारी से लाभ पहुंचा। वहीं, समग्र वैश्विक अर्थव्यवस्था भूराजनीतिक शांति, नरम मुद्रास्फीति, निम्न ब्याज दरों और सस्ते श्रम, ऊर्जा, धातुओं और खनिजों की आपूर्ति से लाभान्वित हुई।
जब आर्थिक वृद्धि और लोगों की बेहतरी पर खतरा मंडरा रहा हो तो पारंपरिक संवादों और परिचर्चाओं की सार्थकता संदिग्ध होने लगती है। एक ऐसे दौर में जब दुनिया कुछ इसी प्रकार की परिस्थितियों से दो-चार हो, तब विकसित विश्व और तीसरी दुनिया के देशों को 'एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य' के सूत्र में पिरोने वाला भारत का विचार और प्रासंगिक हो गया है। ऐसे में सभी बैठकों के मूल में यही बात होनी चाहिए कि हम सभी एक ही नाव पर तैर रहे हैं और नैया पार लगने पर सभी को सहयोग का बराबर लाभ मिलेगा।
स्पष्ट है कि आर्थिक राष्ट्रवाद से आर्थिकी के स्तंभों को आघात नहीं पहुंचना चाहिए। इसके बजाय उसे आर्थिकी से जुड़े जोखिमों को दूर कर उसे सशक्त बनाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। ऐसे में समय की आवश्यकता है कि सामाजिक असंतोष और आर्थिक गतिरोध को रोकते हुए लोगों, पूंजी और वस्तुओं एवं सेवाओं की मुक्त आवाजाही के साथ ही तकनीकी साझेदारी का सिलसिला कायम रहना चाहिए।
दुनिया के किसी भी हिस्से में छिड़ा कोई संघर्ष पूरी दुनिया को प्रभावित करने में सक्षम हैं। रूस- यूक्रेन टकराव इसका ज्वलंत उदाहरण है। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी का यह उद्गार कि 'यह युद्ध का युग नहीं' को लेकर वैश्विक सहमति बने, जो न केवल इस युद्ध पर तत्काल विराम लगाए, बल्कि भविष्य के किसी भी टकराव को रोकने से लिए ढांचे को और सशक्त बनाए। इस समय दक्षिणपंथी राजनीति, आर्थिक राष्ट्रवाद, भूराजनीतिक टकराव, हठधर्मी नेतृत्व और संवाद एवं सहयोग के प्रति अनिच्छा जैसे पहलू असमानता और अभाव जैसी स्थितियों को एक बड़ी हद तक प्रभावित कर रहे हैं। आर्थिक वृद्धि के कुछ उत्तोलक भी असमानता एवं अभाव की स्थिति निर्मित करने में योगदान करते हैं। ऐसे में स्थिति को सुधारने के लिए आवश्यक कदम निश्चित रूप से उठाए जाने चाहिए।
पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति पृथ्वी और यहां जीवन एवं आजीविका की निरंतरता के समक्ष बड़ी चुनौती है। पर्यावरण की स्थिति में गिरावट किसी भौगोलिक क्षेत्र की आर्थिकी एवं आर्थिक समृद्धि पर निर्भर करती + है। जहां पर्यावरणीय विध्वंस को रोकने की जिम्मेदारी और जवाबदेही तो सार्वभौमिक है, किंतु उसकी कीमत हैसियत के हिसाब से साझा की जानी चाहिए। इस दृष्टि से सीओपी - 27 के शर्म अल-शेख सम्मेलन में जलवायु क्षरण की क्षतिपूर्ति निधि की प्रतिबद्धता को मूर्त रूप देना भी महत्वपूर्ण होगा।
अब भारत के बौद्धिक वर्ग को भी जी-20 के नेतृत्व के लिए विचारों, नीतियों और कार्यक्रमों की रूपरेखा खींचकर इन आवश्यक मुद्दों पर सहमति निर्माण में महती योगदान देना चाहिए। मौजूदा मानव जाति स्वास्थ्य, संपदा और जीवन की गुणवत्ता के अप्रत्याशित चक्र में जी रही है। यह उसका दायित्व है कि वह आने वाली पीढ़ियों को बेहतर जीवन गुणवत्ता की विरासत - सौगात सौंपे।
(लेखक सेबी और एलआईसी के पूर्व चैयरमैन हैं)
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