"शिक्षा केवल सुविधा नहीं, बल्कि हर बच्चे का मौलिक अधिकार है"—इस सिद्धांत को धरातल पर उतारने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने एक बड़ा और निर्णायक कदम उठाया है। आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को निजी स्कूलों में शिक्षा दिलाने के सपने को साकार करने के लिए योगी सरकार ने शैक्षणिक सत्र 2026–27 के लिए नए और व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत 25 प्रतिशत सीटों पर दाखिले की प्रक्रिया में अब कोताही या अपारदर्शिता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

क्या है नया आदेश? पुराने नियमों में हुआ बड़ा बदलाव
बेसिक और माध्यमिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा ने 8 जनवरी को सभी जिलाधिकारियों और शिक्षा अधिकारियों को कड़े निर्देश जारी किए। इस नए आदेश ने 8 सितंबर, 2025 को जारी किए गए पुराने शासनादेश को निरस्त कर दिया है। दरअसल, पिछली प्रक्रिया में आधार कार्ड जनरेशन और दस्तावेजों के ऑनलाइन सत्यापन में अभिभावकों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। इन तकनीकी बाधाओं को दूर करने और प्रक्रिया को सुगम बनाने के उद्देश्य से ही यह संशोधित आदेश जारी किया गया है।

निजी स्कूलों के लिए सख्त पैमाना: 25% सीटों पर देना ही होगा प्रवेश
नए दिशा-निर्देशों के मुताबिक, राज्य के सभी गैर-सहायता प्राप्त मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों (Unaided Recognised Private Schools) के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि वे अपनी एंट्री लेवल क्लास (प्री-प्राइमरी या कक्षा 1) की कुल सीटों का कम से कम 25 प्रतिशत हिस्सा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और अलाभित समूह के बच्चों के लिए आरक्षित रखें। यह प्रावधान केवल दाखिले तक सीमित नहीं है; आरटीई अधिनियम की धारा 12(1)(c) के तहत, इन बच्चों को कक्षा 8 तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान की जाएगी।

शिक्षा का अधिकार (RTE): सिर्फ कानून नहीं, बल्कि एक कवच
यह जानना महत्वपूर्ण है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत बच्चों को मिला एक मौलिक अधिकार है। यह 6 से 14 वर्ष की आयु के हर बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है। सरकार द्वारा "मुफ्त शिक्षा" को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है—जिसका अर्थ है कि बच्चे से न केवल ट्यूशन फीस नहीं ली जाएगी, बल्कि पाठ्यपुस्तकों, यूनिफॉर्म और अन्य आवश्यक सामग्री का खर्च भी सरकार वहन करेगी। स्कूलों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के न्यूनतम मानक पूरे करने होंगे।

सामाजिक न्याय की ओर एक ठोस कदम इस आदेश का महत्व केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक भी है। सरकार का उद्देश्य स्पष्ट है—शिक्षा तक सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित करना और स्कूल छोड़ने वाले बच्चों (Dropouts) की संख्या को कम करना। यह पहल अमीरी और गरीबी के बीच की खाई को पाटकर सामाजिक न्याय और समानता लाने का प्रयास है।

उत्तर प्रदेश सरकार का यह संशोधित आदेश उन हजारों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण है, जो अपने बच्चों को बड़े निजी स्कूलों में पढ़ाने का सपना तो देखते थे, लेकिन आर्थिक तंगी और जटिल प्रक्रियाओं के कारण पीछे रह जाते थे। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इन दिशानिर्देशों को कितनी सख्ती से लागू करवा पाता है, ताकि 'सबका साथ, सबका विकास' का नारा शिक्षा के क्षेत्र में भी चरितार्थ हो सके।

Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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