संपूर्ण शिक्षा कवच एआई प्रोग्राम से सरकारी स्कूलों के नतीजों में ऐतिहासिक सुधार
फिलो और राज्य सरकारों की पीपीपी पहल से झारखंड, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में पास प्रतिशत बढ़ा और फेलियर रेट में 70% तक की भारी गिरावट आई।

झारखंड के एक सरकारी स्कूल में 'संपूर्ण शिक्षा कवच' (एसएसके) कार्यक्रम के तहत डिजिटल टूल्स का उपयोग करते छात्र।
जिन सरकारी स्कूलों में कभी फेल होने वाले छात्रों की संख्या सबसे बड़ी चुनौती मानी जाती थी, वहीं अब वही स्कूल रिकॉर्ड रिजल्ट्स दर्ज कर रहे हैं। कई जिलों में पास प्रतिशत सिर्फ 12 महीनों में 87% से बढ़कर 99.3% तक पहुँच गया, जबकि कुछ स्कूलों में फेलियर रेट में 70% तक गिरावट दर्ज की गई। झारखंड, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मेघालय और राजस्थान के सरकारी स्कूलों में लागू 24×7 एआई आधारित पर्सनल ट्यूटरिंग प्रोग्राम ‘संपूर्ण शिक्षा कवच’ (एसएसके) अब सरकारी शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव का मॉडल बनकर उभरा है।
यह प्रोग्राम राज्य सरकारों और दिल्ली स्थित एआई एजुकेशन स्टार्टअप Filo के बीच पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत संचालित किया जा रहा है। फिलो की National Council of Educational Research and Training के साथ औपचारिक अकादमिक साझेदारी भी है। इस मॉडल के तहत सरकारी स्कूलों के छात्रों को स्कूल के भीतर और बाहर, दोनों जगह 24×7 लाइव वन-ऑन-वन पर्सनल टीचर सपोर्ट उपलब्ध कराया जाता है। इसके लिए छात्रों या उनके परिवारों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता। कार्यक्रम का उद्देश्य केवल मेधावी छात्रों को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि उन छात्रों तक भी शैक्षणिक सहायता पहुँचाना है, जिन्हें पढ़ाई में सबसे अधिक मदद की जरूरत होती है।
पिछले दो वर्षों में एसएसके का विस्तार तेजी से कई राज्यों तक हुआ है। मध्य प्रदेश के विदिशा में तीन सरकारी स्कूलों के 275 छात्रों के साथ शुरू हुए जिला स्तरीय पायलट प्रोजेक्ट के पहले चरण में 4,192 लाइव वन-ऑन-वन सेशंस और 4,408 एआई आधारित लर्निंग इंटरैक्शंस दर्ज किए गए। इस प्रोग्राम से जुड़े कई छात्रों ने 2025-26 शैक्षणिक सत्र में 90% से अधिक अंक प्राप्त किए। हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में इस पहल की शुरुआत मुख्यमंत्री द्वारा की गई, जबकि मेघालय और राजस्थान में भी इसे राज्य स्तर पर लागू किया जा चुका है।
महाराष्ट्र के सांगली जिले के शिराला ब्लॉक में 2026 के एसएससी बोर्ड परिणामों ने इस मॉडल के प्रभाव को स्पष्ट रूप से सामने रखा। ब्लॉक के 42 सरकारी स्कूलों में जिन स्कूलों के 50% से अधिक छात्रों ने फिलो के एआई ट्यूटरिंग प्लेटफॉर्म का उपयोग किया और 30,000 से अधिक लर्निंग सेशंस पूरे किए, वहाँ पास प्रतिशत में साल-दर-साल केवल 2.4 प्रतिशत अंकों की गिरावट दर्ज हुई। इसके विपरीत जिन स्कूलों में इसका उपयोग कम रहा, वहाँ पास प्रतिशत 9.2 प्रतिशत अंक तक गिर गया। दोनों के बीच 6.8 प्रतिशत अंकों का अंतर सामने आया। उल्लेखनीय तथ्य यह रहा कि यह बदलाव पाँच महीनों से भी कम समय में दर्ज किया गया, जबकि अन्य क्षेत्रों में रिजल्ट्स लगातार गिर रहे थे।
Rohit Kumar ने कहा, “हम जिस भी जिले में जाते हैं, लोग हमें बताते हैं कि वहाँ की चुनौतियाँ अलग हैं। कहीं भाषा की समस्या है, कहीं पहाड़ी इलाके हैं, तो कहीं शिक्षकों की कमी है। लेकिन पढ़ाई में आने वाली परेशानी हर जगह एक जैसी है। हर बच्चा चाहता है कि रात 10 बजे भी यदि उसे कोई सवाल समझ न आए, तो उसे मदद मिल सके। हमने अपना प्लेटफॉर्म ऐसे ही बच्चों के लिए बनाया है। बोर्ड रिजल्ट्स अब सिर्फ यह बता रहे हैं कि यह मॉडल सही तरीके से काम कर रहा है।”
सबसे उल्लेखनीय परिणाम झारखंड से सामने आए हैं, जहाँ एसएसके सबसे लंबे समय से संचालित हो रहा है। Jharkhand Academic Council द्वारा जारी 2026 बोर्ड परिणामों के अनुसार संघर्षपूर्ण परिस्थितियों वाले लातेहार जिले ने कक्षा 12 साइंस रैंकिंग में 2023 के 13वें स्थान से बढ़कर 2025 में पहला स्थान हासिल किया और 2026 में भी यह रैंक बरकरार रखी। जिले का पास प्रतिशत 93.25% रहा, जो पिछले तीन वर्षों में झारखंड का सबसे अधिक कक्षा 12 साइंस पास प्रतिशत दर्ज किया गया। कक्षा 10 में भी लातेहार 21वें स्थान से चौथे स्थान तक पहुँचा और लगातार दो वर्षों तक उसी रैंक पर बना रहा।
नीति आयोग के एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट्स में शामिल गुमला ने 2025 में कक्षा 10 रैंकिंग में 20वां स्थान हासिल किया था, लेकिन 2026 में यह सीधे राज्य में पहले नंबर पर पहुँच गया। जिले का पास प्रतिशत 87% से बढ़कर 99.3% हो गया, जबकि फर्स्ट डिवीजन प्राप्त करने वाले छात्रों की संख्या में 66% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यही फर्स्ट डिवीजन आगे यूनिवर्सिटी एडमिशन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
दुमका में एसएसके की शुरुआत लगभग चार वर्ष पहले हुई थी और अब यह जिले के लगभग आधे स्कूलों तक पहुँच चुका है। यहाँ कक्षा 10 की रैंकिंग 24वें स्थान से बढ़कर दूसरे स्थान तक पहुँच गई। जिले में एसएसके और गैर-एसएसके स्कूलों के बीच प्रदर्शन का अंतर 20.9 प्रतिशत अंकों का दर्ज किया गया। एसएसके स्कूलों का पास प्रतिशत 98.2% रहा, जबकि अन्य स्कूलों का 77.3%। इससे यह स्पष्ट हुआ कि परिणामों में सुधार केवल संसाधनों या शिक्षकों की वजह से नहीं, बल्कि मॉडल के प्रभाव से आया।
रामगढ़ जिले में एसएसके से जुड़े 21 स्कूलों में एक ही वर्ष में फेलियर रेट 70% तक कम हो गया। जिले के सबसे कमजोर माने जाने वाले पाँच स्कूलों ने 20.8% का सुधार दर्ज किया, जिसे जिले के इतिहास का सबसे बड़ा शैक्षणिक बदलाव माना जा रहा है। वहीं आदिवासी बहुल पश्चिमी सिंहभूम जिले में कक्षा 12 साइंस रैंकिंग दो वर्षों में 18वें स्थान से बढ़कर नौवें स्थान तक पहुँच गई। यहाँ एसएसके स्कूलों का प्रदर्शन अन्य स्कूलों की तुलना में लगभग 15 प्रतिशत अंक बेहतर रहा।
झारखंड के सीबीएसई सरकारी स्कूलों में भी यह प्रभाव स्पष्ट दिखाई दिया। राज्य सरकार ने दो वर्ष पहले अपने प्रमुख सीबीएसई प्रोजेक्ट ‘सीएम स्कूल्स ऑफ एक्सीलेंस’ की शुरुआत की थी। जिन स्कूलों में एसएसके लागू नहीं था, वहाँ प्रदर्शन में लगभग 2% की वृद्धि दर्ज हुई, जबकि एसएसके लागू स्कूलों में यह बढ़ोतरी 12% से अधिक रही। एसएसके से जुड़े तीन सीएम स्कूल ऑफ एक्सीलेंस ने 98% से अधिक पास प्रतिशत हासिल किया, जिनमें दुमका के सीएम स्कूल ऑफ एक्सीलेंस मसालिया ने 100% रिजल्ट दर्ज किया। एसएसके से जुड़े जिलों में फर्स्ट डिवीजन प्राप्त करने वाले छात्रों की संख्या में 50% तक वृद्धि दर्ज की गई।
फिलो के मॉडल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अकादमिक मान्यता मिली है। अमेरिका की Johns Hopkins University द्वारा जेफरसन काउंटी में किए गए अध्ययन में समान परिस्थितियों वाले छात्रों के समूहों की तुलना की गई। अध्ययन में पुरुष छात्रों के मैथ्स प्रदर्शन में 13.7 अंकों और अफ्रीकी-अमेरिकी छात्रों के प्रदर्शन में 10.4 अंकों का सुधार दर्ज किया गया। अध्ययन में यह भी सामने आया कि अधिक ट्यूटरिंग सेशंस लेने वाले छात्रों के इंग्लिश लैंग्वेज आर्ट्स स्कोर भी बेहतर रहे। अध्ययन के अनुसार जिन छात्रों में सबसे अधिक सुधार देखा गया, उनकी परिस्थितियाँ भारत में एसएसके से जुड़े छात्रों जैसी थीं, जहाँ संसाधनों की कमी, अधिक छात्र-शिक्षक अनुपात और सीमित शैक्षणिक सहायता जैसी चुनौतियाँ मौजूद हैं।
भारत सरकार ने भी इस मॉडल को कई राष्ट्रीय मंचों पर सम्मानित किया है। एसएसके को 2025 के 28वें नेशनल अवॉर्ड्स फॉर ई-गवर्नेंस में गोल्ड अवॉर्ड मिला, जबकि 2023 के 26वें नेशनल अवॉर्ड्स फॉर ई-गवर्नेंस में भी इसे गोल्ड अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। नीति आयोग ने ‘नीति फॉर स्टेट्स अवॉर्ड्स 2025’ में शिक्षा श्रेणी में इसे देश की सर्वश्रेष्ठ पहल घोषित किया। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा आयोजित जी20 डिजिटल इनोवेशन अलायंस कार्यक्रम में भी इस मॉडल को सम्मान मिला।
सरकारी शिक्षा व्यवस्था में एसएसके ने एक नई सोच स्थापित की है। यह मॉडल केवल चुनिंदा मेधावी छात्रों पर केंद्रित नहीं है, बल्कि हर छात्र तक पहुँचने का प्रयास करता है, चाहे उसे किसी भी समय, किसी भी भाषा या किसी भी विषय में सहायता की आवश्यकता हो। हजारों छोटे-छोटे लर्निंग सेशंस का यही असर अब बोर्ड परीक्षाओं के परिणामों और जिला रैंकिंग में साफ दिखाई देने लगा है। लातेहार से शिराला और दुमका से विदिशा तक सामने आए परिणाम यह संकेत दे रहे हैं कि एआई आधारित यह शिक्षा मॉडल अब केवल प्रयोग नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था में साबित हो चुका परिवर्तन बन चुका है।

Pratahkal Bureau
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