नई दिल्ली: भारतीय शिक्षा प्रणाली के इतिहास में एक नए स्वर्णिम अध्याय की पटकथा लिखी जा रही है, जो पारंपरिक शिक्षण पद्धतियों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई के साथ एकाकार करने का साहस रखती है। केंद्र सरकार ने 'समग्र शिक्षा 3.0' नामक एक क्रांतिकारी प्रस्ताव पेश किया है, जिसका मुख्य ध्येय एआई को केवल एक विषय के रूप में नहीं, बल्कि स्कूली पाठ्यक्रम के एक अनिवार्य और मुख्य घटक के रूप में एकीकृत करना है। यह महत्वाकांक्षी पहल देश के करोड़ों छात्रों की वैचारिक क्षमता और तकनीकी समझ को वैश्विक स्तर पर लाने का एक बड़ा सरकारी प्रयास माना जा रहा है।

इस प्रस्तावित नीति के क्रियान्वयन का खाका शिक्षा मंत्रालय के उच्चाधिकारियों द्वारा तैयार किया गया है। शिक्षा सचिव संजय मूर्ति के नेतृत्व में हुई उच्च स्तरीय बैठक के दौरान यह चर्चा की गई कि किस प्रकार एआई को प्राथमिक शिक्षा से ही बच्चों के विकास का हिस्सा बनाया जा सकता है। इस योजना को मूर्त रूप देने में स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग के सचिव संजय कुमार की भूमिका महत्वपूर्ण रही है, जिन्होंने पाठ्यक्रम में कोडिंग, डेटा विश्लेषण और एआई नैतिकता जैसे विषयों को शामिल करने पर जोर दिया है। इस पहल के तहत छात्रों को केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसका निर्माता बनाने का लक्ष्य रखा गया है।

मुख्य आयोजन और घोषणाओं के विवरण के अनुसार, इस योजना को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के अगले चरण के रूप में देखा जा रहा है। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) के निदेशक दिनेश प्रसाद सकलानी ने इस बात की पुष्टि की है कि विशेषज्ञों की एक समिति पहले से ही पाठ्यपुस्तकों को पुनर्गठित करने के कार्य में जुटी है। इस समिति में प्रौद्योगिकी क्षेत्र के दिग्गजों और अनुभवी शिक्षाविदों को शामिल किया गया है ताकि एआई का शिक्षण सरल और प्रभावी हो सके। इसके अतिरिक्त, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने विभिन्न मंचों पर इस बात को दोहराया है कि भारत को 'ग्लोबल एआई हब' बनाने के लिए नींव स्कूलों में ही रखनी होगी।

विधिक और आधिकारिक दृष्टिकोण से देखें तो 'समग्र शिक्षा 3.0' के अंतर्गत न केवल बुनियादी ढांचे का विकास किया जाएगा, बल्कि शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए भी एक विशाल नेटवर्क तैयार होगा। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) के अध्यक्ष योगेश सिंह ने बताया कि शिक्षकों को एआई उपकरणों के उपयोग में दक्ष बनाने के लिए विशेष मॉड्यूल विकसित किए जा रहे हैं। योजना के वित्तीय पहलुओं पर वित्त मंत्रालय के वरिष्ठ सलाहकार अनंत नागेश्वरन ने भी सकारात्मक दृष्टिकोण साझा किया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस बड़े बदलाव के लिए पर्याप्त बजट और संसाधन आवंटित किए जाएंगे। इसके साथ ही, डेटा सुरक्षा और छात्र गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन के साथ मिलकर कड़े सुरक्षा मानकों पर भी काम किया जा रहा है।

इस दूरगामी पहल का समापन एक ऐसे भविष्य की ओर संकेत करता है जहाँ तकनीक और शिक्षा के बीच की खाई पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। 'समग्र शिक्षा 3.0' केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि भावी पीढ़ी को इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों के लिए तैयार करने का एक सशक्त माध्यम है। यदि यह प्रस्ताव पूरी तरह से लागू होता है, तो भारत दुनिया के उन अग्रणी देशों में शामिल हो जाएगा जहाँ शिक्षा पद्धति पूरी तरह से भविष्योन्मुखी और तकनीक-सक्षम है। इस बदलाव का प्रभाव आने वाले दशकों में भारतीय कार्यबल और नवाचार की गति पर स्पष्ट रूप से दिखाई देगा, जो अंततः विकसित भारत के संकल्प को सिद्ध करने में मील का पत्थर साबित होगा।

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