केवल डिग्रियों से नहीं बनेगा विकसित भारत, छात्रों में नैतिकता और कर्मयोगी सोच विकसित करना जरूरी
दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े शोध में सामने आया कि परीक्षा का दबाव, अंकों की प्रतिस्पर्धा और मानसिक तनाव विद्यार्थियों में शैक्षणिक बेईमानी को बढ़ा सकते हैं। जानिए मिशन कर्मयोगी और नैतिकता, मानवता व हास्य आधारित हस्तक्षेप कैसे जिम्मेदार नागरिक बनाने में मदद कर सकते हैं।

भारत में शिक्षा व्यवस्था के सामने अब केवल शैक्षणिक उपलब्धियों का नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य, नैतिक मूल्यों और जिम्मेदार नागरिकता के निर्माण का भी सवाल खड़ा हो गया है। परीक्षा में अच्छे अंक हासिल करने और डिग्री प्राप्त करने की होड़ के बीच शैक्षणिक बेईमानी, परीक्षा का भय और मानसिक दबाव जैसी समस्याएं गंभीर रूप ले रही हैं। ऐसे में केवल डिग्रियों के आधार पर विकसित भारत का निर्माण संभव नहीं है। इसके लिए विद्यार्थियों में आंतरिक चरित्र, कर्तव्यबोध और मानवीय मूल्यों का विकास आवश्यक है। इसी विचार को केंद्र में रखते हुए 'कर्मयोगी नागरिक' की अवधारणा पर आधारित एक विशेष वैचारिक एवं मनोवैज्ञानिक शोध प्रस्तुत किया गया है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के अंतर्गत दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर पर शोध एवं नवाचार को प्रोत्साहित करने की दिशा में पहल की गई है। श्री अरबिंदो कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर प्रज्ञेंदु के मार्गदर्शन में निकिता सिंह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कर्मयोगी अवधारणा पर मनोवैज्ञानिक शोध कर रही हैं। प्रोफेसर प्रज्ञेंदु के अनुसार, विद्यार्थियों में शोध के प्रति विकसित हो रही रुचि, जिज्ञासा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का श्रेय दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह के दूरदर्शी नेतृत्व और निरंतर प्रोत्साहन को जाता है। उनके मार्गदर्शन में विकसित हो रही शोधपरक संस्कृति विद्यार्थियों को अकादमिक उत्कृष्टता और नवाचार की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही है।
श्री अरबिंदो कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) के मनोविज्ञान विभाग से निकिता सिंह, प्रोफेसर महेश दारोलिया और प्रोफेसर प्रज्ञेंदु तथा मानव रचना इंटरनेशनल स्कूल, नोएडा की स्कूल काउंसलर रितिका लिमये ने इस विषय को शिक्षा, मनोविज्ञान और राष्ट्र निर्माण के व्यापक संदर्भ में प्रस्तुत किया है।
आलेख में कहा गया है कि जब दिल्ली जैसे प्रमुख शहरों की सड़कों पर हजारों युवा अपनी नाराजगी व्यक्त करने और संरचनात्मक बदलाव की मांग करने के लिए एकत्र होते हैं, तो यह युवाओं की जीवंत लोकतांत्रिक भागीदारी को दर्शाता है। लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन लोगों को अपनी आवाज उठाने का अवसर देते हैं, लेकिन हाल की घटनाएं शैक्षणिक मूल्यों और नागरिक जिम्मेदारी को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करती हैं। असहमति व्यक्त करना किसी की जिम्मेदारी और मानवता की भावना को समाप्त करने का आधार नहीं होना चाहिए। एक सच्चा कर्मयोगी वह है जो नागरिक जिम्मेदारी के साथ काम करे, बिना नफरत के असहमति व्यक्त करे और व्यक्तिगत गरिमा तथा मौलिक सहानुभूति बनाए रखते हुए संरचनात्मक बदलाव की मांग करे।
अंकों की दौड़ में मानसिक स्वास्थ्य और नैतिकता की अनदेखी
आलेख के अनुसार, दशकों से समाज में यह धारणा बनी हुई है कि केवल डिग्री हासिल करने या किसी परीक्षा में शीर्ष स्थान प्राप्त करने से सफल जीवन और मजबूत राष्ट्र का निर्माण हो सकता है। इसी सोच के कारण शिक्षा व्यवस्था में परिणामों, अंकों और कट-ऑफ प्रतिशत को अत्यधिक महत्व दिया गया है, जबकि विद्यार्थियों के भावनात्मक स्वास्थ्य और नैतिक चरित्र की अनदेखी हुई है।
जब विद्यार्थी यह मानने लगते हैं कि उनके अंक ही उनकी योग्यता और भविष्य निर्धारित करते हैं, तो असफलता का डर उन पर हावी होने लगता है। शैक्षणिक दबाव, माता-पिता को निराश करने की आशंका और सहपाठियों के साथ लगातार तुलना उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। इस स्थिति में अंक ही व्यक्ति के मूल्य का एकमात्र पैमाना बन जाते हैं।
ऐसे माहौल में परीक्षा में नकल और शैक्षणिक धोखाधड़ी को केवल नियमों का उल्लंघन मानना पर्याप्त नहीं है। यह उन मूल्यों पर भी सवाल उठाती है जिन्हें विद्यार्थी सीख रहे हैं और उस सफलता पर भी, जिसे शिक्षा व्यवस्था बढ़ावा दे रही है। इसलिए युवाओं में नैतिकता, मानवता और हास्यबोध का शिक्षण असहमति तथा जिम्मेदारी के प्रति संतुलित दृष्टिकोण विकसित करने में सहायक हो सकता है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, वर्ष 2022 में भारत में 13,044 छात्रों ने आत्महत्या की। यह आंकड़ा विद्यार्थियों की भलाई और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीर चिंता सामने रखता है। परीक्षा में विफलता का भय भी आत्महत्या के दर्ज कारणों में शामिल है।
परीक्षा का दबाव और शैक्षणिक बेईमानी के प्रमुख कारण
NEET जैसी उच्च जोखिम वाली प्रवेश परीक्षाओं ने सीखने की प्रक्रिया को कई विद्यार्थियों के लिए ऐसी स्थिति में बदल दिया है, जहां एक परीक्षा का परिणाम ही पूरे भविष्य का निर्धारक माना जाने लगता है। इससे दीर्घकालिक चिंता, निराशा, असफलताओं से निपटने में असमर्थता और गंभीर सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएं सामने आती हैं। जब 17 साल के युवा को यह विश्वास हो जाता है कि एक परीक्षा ही इंसान के रूप में उसका पूरा मूल्य तय करेगी, तो कुछ विद्यार्थियों को बेईमानी के रास्ते ही आगे बढ़ने का एकमात्र विकल्प दिखाई देने लगते हैं।
हाईस्कूल के विद्यार्थियों से एकत्र आंकड़ों के आधार पर आलेख में शैक्षणिक धोखाधड़ी के चार प्रमुख कारण बताए गए हैं। इनमें उच्च जोखिम वाली परीक्षाओं का डर सबसे बड़ा कारण है, जिसका सर्वेक्षण में हिस्सा 42 प्रतिशत रहा। इसके प्रभाव में मूल्यांकन को लेकर गंभीर चिंता और भय शामिल हैं। माता-पिता एवं सामाजिक अपेक्षाएं 28 प्रतिशत विद्यार्थियों के लिए प्रमुख कारण रहीं, जिनसे सामाजिक बहिष्कार और विफलता का डर जुड़ा है। रटंत विद्या और भारी पाठ्यक्रम का हिस्सा 18 प्रतिशत रहा, जिसका प्रभाव संज्ञानात्मक अतिभार के रूप में सामने आया। वहीं, सहपाठियों के बीच धोखाधड़ी का सामान्य होना और कम जोखिम की धारणा 12 प्रतिशत मामलों में प्रमुख कारण रही, जिससे नैतिक सीमाओं का क्षरण होता है।
उच्च शिक्षित कैदियों और अपराध के आंकड़े भी उठाते हैं सवाल
आलेख में यह सवाल भी उठाया गया है कि क्या शिक्षा मात्र किसी व्यक्ति को नैतिक बना सकती है। डिग्री को सामान्यतः ज्ञान, प्रगति और जिम्मेदार नागरिकता का प्रतीक माना जाता है, लेकिन राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की प्रिज़न स्टैटिस्टिक्स इंडिया 2024 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारतीय जेलों में बंद 30,000 से अधिक कैदियों के पास स्नातक, स्नातकोत्तर और पेशेवर डिप्लोमा जैसी औपचारिक उच्च योग्यताएं हैं। इससे स्पष्ट होता है कि केवल शैक्षणिक डिग्रियां आपराधिक व्यवहार को रोकने की गारंटी नहीं देतीं।
जेल रिकॉर्ड में मानव शरीर के खिलाफ अपराधों, जिनमें हत्या और बलात्कार शामिल हैं, से लेकर संपत्ति से जुड़े अपराधों तक के मामले दर्ज हैं। इनमें चोरी, डकैती, सेंधमारी और धोखाधड़ी शामिल हैं। इसके साथ ही अपराधों का स्वरूप भी बदल रहा है। NCRB के आंकड़ों के अनुसार, दर्ज साइबर अपराधों की संख्या वर्ष 2022 में 65,893 थी, जो 2023 में बढ़कर 86,420 और 2024 में 1,01,928 हो गई। वर्ष 2023 में दर्ज लगभग 69 प्रतिशत साइबर अपराध धोखाधड़ी से संबंधित थे। आर्थिक अपराधों के भी वर्ष 2024 में 2,14,379 मामले दर्ज किए गए।
NEET-UG 2024 पेपर लीक मामले को भी इस संदर्भ में उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस मामले ने दिखाया कि शैक्षणिक उपलब्धि अपने आप नैतिक आचरण की गारंटी नहीं देती। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने एम्स पटना जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के मेडिकल छात्रों की पहचान की, जो कथित तौर पर लीक हुए प्रश्नपत्र को हल करने में शामिल थे। जांच में ऐसे 144 उम्मीदवारों की भी पहचान की गई, जिन्होंने कथित तौर पर लीक प्रश्नपत्र प्राप्त करने के लिए भुगतान किया था।
आलेख में कहा गया है कि कर्मयोगी दृष्टिकोण का उद्देश्य महत्वाकांक्षा, बुद्धिमत्ता या व्यावसायिक सफलता को खारिज करना नहीं है, बल्कि उन्हें कर्तव्य, सत्यनिष्ठा, दूसरों के प्रति चिंता और आत्म-अनुशासन से जोड़ना है। मिशन कर्मयोगी में भी कार्यात्मक दक्षताओं के साथ व्यवहारिक दक्षताओं को महत्व दिया गया है।
हाईस्कूल स्तर से शुरू होती है शैक्षणिक बेईमानी की प्रवृत्ति
इंटरनेशनल सेंटर फॉर एकेडमिक इंटीग्रिटी (ICAI) के माध्यम से डोनाल्ड मैकके बे द्वारा 70,000 से अधिक हाईस्कूल विद्यार्थियों पर किए गए शोध का हवाला देते हुए बताया गया है कि शैक्षणिक बेईमानी की शुरुआत उच्च शिक्षा से काफी पहले हो जाती है।
इस शोध में 95 प्रतिशत विद्यार्थियों ने गृहकार्य की नकल सहित किसी न किसी रूप में धोखाधड़ी करने की बात स्वीकार की। 64 प्रतिशत विद्यार्थियों ने मुख्य परीक्षाओं में सीधे नकल करने की बात मानी, जबकि 58 प्रतिशत ने प्रमुख असाइनमेंट में गंभीर साहित्यिक चोरी (Plagiarism) करने की बात स्वीकार की।
आलेख के अनुसार, बेईमानी वयस्क अवस्था में अचानक पैदा होने वाला दोष नहीं है, बल्कि अस्वस्थ प्रतिस्पर्धी दबावों के जवाब में कम उम्र में विकसित होने वाली आदत है। यदि स्कूलों में इस प्रवृत्ति पर ध्यान नहीं दिया गया, तो ऐसे डिग्रीधारक तैयार होंगे जो इन्हीं अनैतिक तरीकों को सार्वजनिक प्रशासन, व्यवसाय और स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों तक ले जा सकते हैं।
स्कूलों में लागू करने की जरूरत है मिशन कर्मयोगी की अवधारणा
भारत सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वर्ष 2020 में सिविल सेवकों को आत्म-जागरूक और सेवा-उन्मुख नेतृत्वकर्ता बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय सिविल सेवा क्षमता निर्माण कार्यक्रम के रूप में मिशन कर्मयोगी शुरू किया था। आलेख में कहा गया है कि नैतिकता सिखाने के लिए किसी व्यक्ति के कार्यस्थल में प्रवेश करने तक इंतजार करना एक अवसर गंवाने जैसा है। विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा और नैतिक भविष्य के निर्माण के लिए कर्मयोगी मूल्यों को सीधे स्कूलों की कक्षाओं में शामिल करना आवश्यक है।
स्कूल उन शुरुआती स्थानों में से हैं जहां युवा निर्णय लेना, असफलता पर प्रतिक्रिया देना, दूसरों के साथ व्यवहार करना और जिम्मेदारी समझना सीखते हैं। कर्मयोगी दृष्टिकोण विद्यार्थियों को केवल अंतिम परिणाम पर ध्यान देने के बजाय उस ईमानदारी और निष्ठा को महत्व देना सिखाता है, जिसके साथ वे अपना काम करते हैं।
आलेख में प्रस्तुत शोध 'स्कूली छात्रों के बीच कर्मयोगी अभिविन्यास विकसित करना: शैक्षणिक धोखाधड़ी को कम करने के लिए नैतिकता, मानवता और हास्य पर आधारित हस्तक्षेपों का तुलनात्मक मूल्यांकन' के अनुसार, नैतिकता विद्यार्थियों को सही और गलत के बीच अंतर समझने के लिए प्रेरित कर सकती है। मानवता उनमें सहानुभूति, दयालुता और दूसरों के प्रति विचार विकसित करती है। वहीं, हास्य सीखने की प्रक्रिया को अधिक आकर्षक बनाता है और असफलता के डर तथा सफलता के दबाव जैसी कठिन परिस्थितियों पर चर्चा करने का स्वस्थ माध्यम प्रदान करता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल सफल विद्यार्थी तैयार करना नहीं, बल्कि जिम्मेदार इंसान बनाना भी है।
इस शोध में कर्मयोगी परिवर्तन की चार अवस्थाएं बताई गई हैं। पहली अवस्था भय प्रणाली की है, जिसमें रटंत स्मृति और परीक्षा का डर सीधे धोखाधड़ी तथा गंभीर मानसिक चिंता की ओर ले जाते हैं। दूसरी अवस्था मानसिकता में बदलाव की है, जिसमें सीखने को भय के बजाय आत्म-खोज, आंतरिक जिज्ञासा और व्यक्तिगत विकास से जोड़ा जाता है। तीसरी अवस्था विद्यालय स्तर पर कर्मयोगी दृष्टिकोण लागू करने की है, जिसमें परिणाम से अधिक कर्तव्य और प्रक्रिया दक्षता के रूप में निष्काम कर्म सिखाया जाता है। चौथी अवस्था नैतिक समाज के निर्माण की है, जहां मानसिक सुरक्षा के माध्यम से बेईमानी और अनैतिकता को जड़ से समाप्त करने का लक्ष्य रखा गया है।
युवा स्वयंसेवा और नागरिक जिम्मेदारी को बढ़ावा देने पर जोर
कर्मयोगी मानसिकता का एक महत्वपूर्ण आधार बिना किसी बाहरी दबाव के निस्वार्थ भाव से सामुदायिक सेवा में भाग लेना है। नागरिक भागीदारी से जुड़े वैश्विक और राष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार, भारत के युवा अनौपचारिक सामुदायिक सहायता, आपदा राहत, रक्तदान शिविरों और जमीनी स्तर पर शिक्षा से जुड़ी गतिविधियों के माध्यम से उल्लेखनीय परोपकार प्रदर्शित करते हैं। राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) और नेहरू युवा केंद्र संगठन (NYKS) जैसी संस्थाएं भी इस दिशा में काम कर रही हैं।
राष्ट्रीय सेवा योजना ने 31 मार्च 2026 तक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 42,53,320 नामांकित स्वयंसेवकों की जानकारी दी है।
हालांकि, चैरिटीज एड फाउंडेशन (CAF) के वर्ल्ड गिविंग इंडेक्स 2024 में, जो वर्ष 2023 के सर्वेक्षण आंकड़ों पर आधारित है, समग्र उदारता के मामले में भारत 142 देशों में 26वें स्थान पर है। स्वयंसेवा दर के मामले में भारत 41 प्रतिशत के साथ अमेरिका के 39 प्रतिशत से आगे है, लेकिन इंडोनेशिया के 65 प्रतिशत और केन्या के 52 प्रतिशत से पीछे है।
वैश्विक तुलना में इंडोनेशिया 65 प्रतिशत स्वयंसेवा दर और 66 प्रतिशत अजनबियों की मदद करने के आंकड़े के साथ समग्र रैंकिंग में पहले स्थान पर है। वहां गोतोंग रोयोंग यानी पारस्परिक सहयोग की परंपरा और जकात को प्रमुख सांस्कृतिक एवं संरचनात्मक कारक बताया गया है। केन्या 52 प्रतिशत स्वयंसेवा दर और 82 प्रतिशत अजनबियों की मदद के आंकड़े के साथ दूसरे स्थान पर है, जहां हरांबे यानी सामुदायिक सहयोग की संस्कृति महत्वपूर्ण है। संयुक्त राज्य अमेरिका 39 प्रतिशत स्वयंसेवा दर और 76 प्रतिशत अजनबियों की मदद के आंकड़े के साथ छठे स्थान पर है। वहां संस्थागत नागरिक क्रेडिट और एनजीओ नेटवर्क प्रमुख कारक हैं।
भारत 41 प्रतिशत स्वयंसेवा दर और 65 प्रतिशत अजनबियों की मदद के आंकड़े के साथ 26वें स्थान पर है। यहां सेवा, दान और अनौपचारिक युवा लामबंदी को प्रमुख सांस्कृतिक एवं संरचनात्मक कारक बताया गया है।
आलेख में भारतीय युवा परोपकार का विश्लेषण करते हुए कहा गया है कि भारत की स्वयंसेवा दर अमेरिका से अधिक होने के बावजूद इंडोनेशिया और केन्या जैसे देशों से कम है। सेवा यानी निष्काम कार्य की भावना भारतीय संस्कृति में गहराई से जुड़ी हुई है, लेकिन आकस्मिक सद्भावना को जीवनभर की नागरिक जिम्मेदारी में बदलने के लिए हाईस्कूल और विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में नागरिक योगदान को अकादमिक क्रेडिट से जोड़ने की आवश्यकता है। इस तुलना के स्रोत के रूप में CAF वर्ल्ड गिविंग इंडेक्स 2024 के 142 देशों के वर्ष 2023 के सर्वेक्षण और भारत सरकार के युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय का उल्लेख किया गया है।
मानवता आधारित हस्तक्षेप को सबसे प्रभावी बताया
शोध में शैक्षणिक बेईमानी कम करने के लिए तीन मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेप मॉडलों की तुलना की गई है। नैतिकता (Morality) आधारित मॉडल में आंतरिक कर्तव्य और व्यक्तिगत गुणों को प्रमुखता दी गई है। इसकी प्रभावकारिता उच्च बताई गई है और यह व्यक्तिगत जवाबदेही की स्पष्ट सीमाएं स्थापित करता है।
मानवता (Humanity) आधारित मॉडल में सहानुभूति, करुणा और सामाजिक देखभाल को मूल आधार बनाया गया है। इसकी प्रभावकारिता सर्वोच्च बताई गई है, क्योंकि यह अलगाव और निराशा की भावनाओं को समाप्त करने में मदद करता है।
हास्य (Humour) आधारित मॉडल में तनाव मुक्ति और सचेत चिंतन को प्रमुखता दी गई है। इसकी प्रभावकारिता मध्यम बताई गई है और यह परीक्षा के डर तथा मूल्यांकन संबंधी चिंता को कम करने में सहायक है।
शोध का शीर्षक 'स्कूली छात्रों के बीच कर्मयोगी अभिविन्यास विकसित करना: शैक्षणिक धोखाधड़ी को कम करने के लिए नैतिकता, मानवता और हास्य पर आधारित हस्तक्षेपों का तुलनात्मक अध्ययन' है। इसकी शोधकर्ता निकिता सिंह हैं और मार्गदर्शन प्रोफेसर प्रज्ञेंदु ने किया है। यह शोध श्री अरबिंदो कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग से संबंधित है।
शोध के समाधान के अनुसार, शैक्षणिक धोखाधड़ी रोकने के लिए बहुआयामी मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है। पारंपरिक नैतिक हस्तक्षेप विद्यार्थियों में जरूरी नैतिक सीमाएं स्थापित करते हैं, जबकि सहानुभूति और साथियों के सहयोग पर आधारित मानवता को शामिल करने से अलगाव की भावनाएं कम होती हैं और बेईमानी के खिलाफ सबसे मजबूत प्रतिरोध विकसित होता है। इसके अतिरिक्त, हास्य तनाव को दूर करने वाले महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक माध्यम के रूप में काम करता है।
शोध में अपेक्षा जताई गई है कि जब स्कूल इस कर्मयोगी ढांचे को अपनाकर विद्यार्थियों को भय से प्रेरित प्रतिस्पर्धा से निकालकर कर्तव्यबद्ध आंतरिक प्रेरणा यानी निष्काम कर्म की ओर ले जाएंगे, तो शैक्षणिक बेईमानी में गिरावट आएगी। ईमानदारी, जिम्मेदारी और दयालुता जैसे मूल्यों का शिक्षण विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनाने में सहायक होगा।
दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) योगेश सिंह के नेतृत्व में विश्वविद्यालय इस ढांचे के कार्यान्वयन और अनुसंधान पर सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है।
आलेख का समापन श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 2 के श्लोक 47 के संदेश के साथ किया गया है: 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥' इसका अर्थ है कि व्यक्ति का अधिकार अपने निर्धारित कर्तव्य को निभाने में है, कर्म के फलों में नहीं। उसे स्वयं को अपने कर्मों के परिणामों का कारण नहीं मानना चाहिए और न ही अकर्मण्यता में आसक्त होना चाहिए।
आलेख में प्रमुख संदर्भों के रूप में NCRB की Accidental Deaths & Suicides in India (ADSI) 2022 रिपोर्ट में दर्ज 13,044 छात्र आत्महत्याओं के आंकड़े, NCRB की Crime in India 2023 रिपोर्ट में वर्ष 2022 से 2023 के बीच साइबर अपराधों में 31 प्रतिशत वृद्धि और लगभग 69 प्रतिशत धोखाधड़ी से जुड़े मामलों, CAF वर्ल्ड गिविंग इंडेक्स 2024 तथा International Center for Academic Integrity (ICAI) के माध्यम से डोनाल्ड मैकके बे के हाईस्कूल विद्यार्थियों में शैक्षणिक बेईमानी संबंधी अध्ययन का उल्लेख किया गया है।
इस शोध का केंद्रीय संदेश है कि विकसित भारत के निर्माण के लिए केवल शैक्षणिक योग्यता पर्याप्त नहीं है। शिक्षा व्यवस्था को विद्यार्थियों में मानसिक सुरक्षा, नैतिकता, सहानुभूति, आत्म-अनुशासन और नागरिक जिम्मेदारी विकसित करने पर भी ध्यान देना होगा।

