सीबीएसई 12वीं परीक्षा परिणाम में गिरावट का सच: ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली पर उपजे विवादों के बीच शिक्षा मंत्रालय ने उठाया बड़ा कदम|
शिक्षा मंत्रालय और सीबीएसई ने ओएसएम सिस्टम पर दी सफाई, छात्रों को राहत देते हुए पुनर्मूल्यांकन और आंसर शीट वेरिफिकेशन शुल्क में की भारी कटौती।

नई दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सीबीएसई के चेयरमैन राहुल सिंह (बाएं) और स्कूल शिक्षा सचिव संजय कुमार (दाएं) मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए।
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा घोषित बारहवीं कक्षा के परीक्षा परिणामों में आई गिरावट ने देश भर के छात्रों, अभिभावकों और शिक्षण संस्थानों के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस वर्ष कुल पास प्रतिशत में दर्ज की गई लगभग तीन प्रतिशत की कमी के बाद बोर्ड की मूल्यांकन पद्धति पर लगातार गंभीर सवाल उठाए जा रहे थे। छात्रों और शिक्षकों के एक बड़े वर्ग ने पहली बार व्यापक स्तर पर लागू की गई ऑन-स्क्रीन डिजिटल मार्किंग प्रणाली के क्रियान्वयन पर असंतोष व्यक्त किया था। इस गहराते विवाद और प्रशासनिक चिंताओं के बीच भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के शीर्ष अधिकारियों ने संयुक्त रूप से स्थिति को स्पष्ट किया है। स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग के सचिव तथा सीबीएसई के अध्यक्ष ने आधिकारिक तौर पर स्पष्ट किया है कि मूल्यांकन प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी है और छात्रों के हितों की रक्षा के लिए पुनर्मूल्यांकन नियमों में अभूतपूर्व बदलाव किए गए हैं।
बोर्ड परीक्षाओं के इतिहास में यह एक बड़ा प्रशासनिक मोड़ माना जा रहा है क्योंकि छात्रों की व्यापक चिंताओं को देखते हुए सीबीएसई ने पुनर्मूल्यांकन और उत्तर पुस्तिकाओं के सत्यापन शुल्क में भारी कटौती करने का निर्णय लिया है। शिक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, पास प्रतिशत अट्ठासी से घटकर पचासी प्रतिशत होने के पीछे कोई तकनीकी त्रुटि नहीं है, बल्कि यह सामान्य वार्षिक उतार-चढ़ाव का हिस्सा है। इसके बावजूद, जिन विद्यार्थियों को अपने प्राप्तांकों को लेकर असंतोष है, उन्हें राहत देने के लिए पूरी आवेदन प्रक्रिया को आर्थिक रूप से बेहद सुलभ बना दिया गया है। बोर्ड का यह कदम उन मेधावी छात्रों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है जिन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे कि जेईई मेन्स में पंचानवे परसेंटाइल या उससे अधिक का उत्कृष्ट स्कोर प्राप्त किया है, परंतु बोर्ड परीक्षाओं में पचहत्तर प्रतिशत की अनिवार्य पात्रता सीमा को पार करने से चूक गए हैं।
इस पूरे विवाद के केंद्र में रही ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली के विषय में तकनीकी और ऐतिहासिक तथ्य सामने रखते हुए स्कूल शिक्षा सचिव ने बताया कि यह अवधारणा पूर्णतः नवीन नहीं है। बोर्ड द्वारा इस पारदर्शी डिजिटल प्रणाली का प्राथमिक प्रयोग वर्ष दो हजार चौदह में ही कर लिया गया था, जिसे वर्तमान सत्र में उन्नत तकनीकी बुनियादी ढांचे के साथ पुनः स्थापित किया गया है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित कई विश्वविद्यालयों और चार्टर्ड अकाउंटेंट्स संस्थानों द्वारा इस प्रणाली का उपयोग मूल्यांकन में मानवीय हस्तक्षेप को न्यूनतम करने तथा निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए किया जाता रहा है। इसके साथ ही, बोर्ड प्रबंधन ने इन भ्रामक खबरों का भी पूरी तरह खंडन किया है कि उत्तर पुस्तिकाओं की जांच में किसी भी प्रकार की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या स्वचालित सॉफ्टवेयर तकनीक का उपयोग किया गया है।
प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष कुल अट्ठानवे लाख छियासी हजार दो सौ बाईस उत्तर पुस्तिकाओं को डिजिटल रूप से स्कैन करके कंप्यूटर स्क्रीन पर जांचा गया। इस विशाल संख्या के बीच केवल तेरह हजार आठ सौ तिरपन कॉपियां ऐसी थीं जिनकी लिखावट या स्याही का रंग अत्यंत हल्का होने के कारण उन्हें मैनुअल तरीके से पारंपरिक पद्धति से जांचना पड़ा। इस विसंगति को दूर करने के लिए आगामी सत्रों से छात्रों के लिए विशेष दिशा-निर्देश जारी करने की योजना बनाई जा रही है ताकि भविष्य में शत-प्रतिशत प्रतियों का डिजिटल मूल्यांकन सुनिश्चित किया जा सके। पूरी पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया को दो स्पष्ट चरणों में विभाजित किया गया है, जिसके अंतर्गत पहले चरण में छात्र ऑनलाइन माध्यम से अपनी मूल उत्तर पुस्तिका की स्कैन कॉपी प्राप्त कर सकेंगे और दूसरे चरण में विशिष्ट प्रश्नों की दोबारा जांच के लिए चुनौती दे सकेंगे।
विधिक और नीतिगत बदलावों के तहत परीक्षा नियंत्रक कार्यालय ने संशोधित शुल्क संरचना लागू कर दी है जिसके तहत प्रति विषय आवेदन शुल्क को सात सौ रुपये से घटाकर मात्र सौ रुपये कर दिया गया है। उत्तर पुस्तिका के सत्यापन की फीस को भी पांच सौ रुपये से कम करके सौ रुपये निर्धारित किया गया है, जबकि किसी एक प्रश्न को चुनौती देने की दर को सौ रुपये से घटाकर केवल पच्चीस रुपये कर दिया गया है। इस पारदर्शी नीति के तहत यदि पुनर्मूल्यांकन के बाद किसी छात्र के अंकों में वृद्धि दर्ज की जाती है, तो बोर्ड द्वारा ली गई अतिरिक्त फीस सीधे छात्र के खाते में वापस स्थानांतरित कर दी जाएगी। इसके अतिरिक्त, बोर्ड ने शैक्षणिक सुधारों को आगे बढ़ाते हुए नौवीं कक्षा से त्रि-भाषा नीति को अनिवार्य रूप से लागू करने की घोषणा की है, जिसमें दो भारतीय भाषाओं का अध्ययन आवश्यक होगा।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
