डूंगरपुर। वागड़ अंचल के ऐतिहासिक शहर डूंगरपुर में बुधवार को मकर संक्रांति का पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि उत्साह, परंपरा और अटूट श्रद्धा का एक ऐसा महाकुंभ बन गया, जिसने शहर की फिजां बदल दी। सूर्य की पहली किरण के साथ ही डूंगरपुर की छतें जीवंत हो उठीं और आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से पट गया। कटी-वो कटी और ‘कट है’ के गूंजते नारों के बीच युवाओं का जोश सातवें आसमान पर नजर आया, जिसने आधुनिकता और पौराणिक मान्यताओं के अनूठे मेल को जीवंत कर दिया।

मकर संक्रांति के इस उल्लासपूर्ण माहौल में आयु की सीमाएं टूटती नजर आईं। जहां एक ओर 50 की उम्र पार कर चुके बुजुर्ग अपने अनुभव से आसमान नाप रहे थे, वहीं दूसरी ओर युवा वर्ग फिल्मी गीतों और रिमिक्स की धुनों पर थिरकते हुए पतंगबाजी का आनंद ले रहा था। शहर की हर छत पर साउंड सिस्टम लगे थे, जहां से निकलते संगीत ने पूरे वातावरण को उत्सवमयी बना दिया। जैसे ही किसी प्रतिद्वंद्वी की पतंग कटती, पूरा मोहल्ला एक ही स्वर में ‘कट है’ चिल्ला उठता। महिलाओं की भागीदारी ने भी इस उत्सव की चमक को दोगुना कर दिया, जो न केवल पतंगबाजी का लुत्फ उठा रही थीं, बल्कि पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद भी साझा कर रही थीं।

जैसे-जैसे दिन ढला, उत्साह कम होने के बजाय और बढ़ गया। शाम के धुंधलके में युवाओं ने कंडील (लालटेन) पतंगें उड़ाकर आसमान को दीपों की माला से सजा दिया। आतिशबाजी के धमाकों ने रात के सन्नाटे को उल्लास में बदल दिया। छतों पर तिल की पपड़ी, मूंगफली की चिक्की और अन्य पकवानों का दौर चलता रहा। इस दौरान हवा के तेज वेग ने पतंगबाजों का भरपूर साथ दिया, जिससे पेंच लड़ाने का मजा दोगुना हो गया। ग्रामीण क्षेत्रों में भी उत्साह की यही लहर देखी गई, जहां ग्रामीणों ने पतंगबाजी के साथ-साथ पारंपरिक खेलों जैसे ‘गिड़ाड़ोट’ और ‘सतोलिया’ खेलकर अपनी संस्कृति को सहेजा।

धार्मिक दृष्टिकोण से भी यह दिन डूंगरपुर के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। जिले के विभिन्न संगम स्थलों पर श्रद्धालुओं ने पवित्र स्नान कर भगवान की पूजा-अर्चना की। दान-पुण्य की पौराणिक परंपरा का निर्वहन करते हुए महिलाओं ने जरूरतमंदों को पुराने वस्त्र और खाद्य सामग्री वितरित की। विशेष रूप से, श्री जैन श्वेताम्बर वीशा पोरवाड़ संघ एवं महिला मंडल के तत्वावधान में एक गरिमामयी सेवा कार्य का आयोजन किया गया। साध्वी यशाश्री जी के कालधर्म दिवस के पुण्य अवसर पर भण्डारिया स्थित महावीर गौ-शाला में बड़ी संख्या में धर्मप्रेमियों ने एकत्रित होकर गो-ग्रास और गुड़ का दान किया। सड़कों पर पशुओं की अनुपस्थिति के बीच सेवाभावी लोग स्वयं गौ-शाला पहुंचे, जो समाज की जीवंत सेवा भावना को दर्शाता है। आस्था, उल्लास और सेवा का यह त्रिवेणी संगम डूंगरपुर की सांस्कृतिक विरासत को और अधिक सुदृढ़ कर गया।

Pratahkal Bureau

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