डूंगरपुर अस्पताल में मरीजों को मिलीं एक्सपायर्ड दवाइयां, स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप
हरिदेव जोशी सामान्य चिकित्सालय में अवधिपार दवाइयां बांटने का मामला आया सामने, नर्सिंग कर्मी पर कार्रवाई के बाद पीएमओ और स्टोर कीपर की भूमिका पर उठे सवाल।

वागड़ अंचल की चिकित्सा व्यवस्था का एक गौरवशाली इतिहास रहा है, जहां आजादी के पूर्व से लेकर वर्ष 1980 तक न केवल स्थानीय जिले के, बल्कि समीपवर्ती गुजरात के कुछ क्षेत्रों व अन्य जिलों के वाशिंदे भी कम संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद चिकित्सा लाभ लेने के लिए आते थे। परंतु आज स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत हो चुकी है। वर्तमान में करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद जिला मुख्यालय पर स्थित मेडिकल कॉलेज के चिकित्सालय सहित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) और सब सेंटरों पर चिकित्सा व्यवस्था इस कदर बिगड़ी हुई है कि आमजन वहां जाने से कतराता है। मरीज गुजरात में महंगी चिकित्सा होने के बावजूद अपनी आर्थिक विषमताओं को दरकिनार करते हुए मजबूरन वहां इलाज के लिए जाने को विवश हैं।
इस बदहाली के बीच, शुक्रवार को जिला मुख्यालय पर स्थित हरिदेव जोशी सामान्य चिकित्सालय में एक बेहद गंभीर मामला सामने आया। चिकित्सालय में रोगियों को निःशुल्क मिलने वाली दवाइयां अवधिपार (एक्सपायर्ड) पाई गईं, जिसने यहां की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की पोल खोलकर रख दी है। इस पूरे मामले में प्रशासन ने एक नर्सिंग कर्मी को बलि का बकरा बनाकर इतिश्री कर ली, जबकि मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य, वर्षों से एक ही पद पर जमे प्रमुख चिकित्सा अधिकारी (पीएमओ) तथा चिकित्सालय के स्टोर कीपर को महज एक चेतावनी तक नहीं दी गई। प्रशासन की इस कार्रवाई से आमजन स्वयं को ठगा सा महसूस कर रहा है।
इस गंभीर लापरवाही पर क्षेत्र के तीनों प्रमुख राजनीतिक दलों की चुप्पी ने जनता के बीच गहरा संशय पैदा कर दिया है। छोटी-छोटी बातों पर हंगामा खड़ा करने वाले और आरोपों की झड़ी लगाने वाले दोनों प्रमुख दल—कांग्रेस व भाजपा—के साथ-साथ क्षेत्रीय दल भी इस मुद्दे पर पूरी तरह मौन हैं। अमूमन सत्तारूढ़ दल की सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं के मोर्चे पर नकारा साबित करने के लिए तत्पर रहने वाले इन राजनेताओं की खामोशी से यह सवाल उठ रहा है कि वे केवल वोटों की राजनीति के लिए ही जनता का उपयोग करते हैं या उनके हितों की रक्षा के लिए आगे आने का मादा भी रखते हैं।
जिला मुख्यालय सहित जिले भर के चिकित्सालयों की बदहाली के किस्से आए दिन सामने आते रहते हैं और हंगामा भी होता है। इस अव्यवस्था के खेल में कई बार मरीज अपनी जान भी गंवा देते हैं, लेकिन यह गंभीर मामले पुलिस के साथ सादा होकर (आपसी समझौते से) मौताणे की राशि के साथ निपटा दिए जाते हैं। दूसरी ओर, यदि कार्मिकों के हितों पर थोड़ी सी भी आंच आ जाए तो चिकित्सा व्यवस्था के सभी संगठन हड़ताल, ज्ञापन सहित विभिन्न कदम उठा लेते हैं, परंतु एक मरीज की जान के साथ हुए इस खिलवाड़ पर सभी की चुप्पी जन चर्चा का विषय बनी हुई है।
इस पूरे प्रकरण में चिकित्सालय के प्रमुख चिकित्सा अधिकारी (पीएमओ) की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। यह सवाल उठ रहा है कि आखिरकार वे कभी दवाइयों के स्टोर सहित वार्डों का निरीक्षण करते भी हैं या नहीं। चिकित्सालय के वार्डों में लाखों रुपया खर्च करने के बावजूद गंदगी का अंबार लगा हुआ है, पंखे व कूलर बंद पड़े हैं तथा शौचालयों की दुर्दशा बनी हुई है, जो यहां की व्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति को उजागर करती है। अब देखना यह है कि क्या जिला प्रशासन व राज्य का स्वास्थ्य विभाग इस पूरे मामले को लेकर गंभीरता दिखाते हुए उच्च स्तरीय जांच सुनिश्चित करेगा या फिर हमेशा की तरह लीपापोती कर इस गंभीर मामले को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।

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