डूंगरपुर: निर्माण श्रमिकों ने बढ़ाई मजदूरी की मांग, प्रदर्शन की रणनीति तैयार
यूनियन ने अकुशल मजदूरों के लिए 600 और कुशल कारीगरों के लिए 900 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी तय करने का प्रस्ताव पारित किया है।

डूंगरपुर। बिल्डिंग वर्कर्स मजदूर कारीगर यूनियन जिला कमेटी, डूंगरपुर की ओर से नेहरू पार्क में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में निर्माण श्रमिकों की दयनीय आर्थिक स्थिति और उनके अधिकारों के हनन पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया गया। जिला उपाध्यक्ष रामलाल की अध्यक्षता में संपन्न इस बैठक में वक्ताओं ने एक स्वर में केंद्र एवं राज्य सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों को श्रमिकों के शोषण का मुख्य कारण बताया। यूनियन नेताओं ने आरोप लगाया कि श्रम कानूनों को समाप्त कर लागू किए गए चार लेबर कोड ने श्रमिकों के हितों को पूरी तरह सुरक्षित करने वाले कानूनी कवच को नष्ट कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप कार्यस्थलों पर अनियंत्रित अनियमितताएं बढ़ गई हैं।
बैठक में महंगाई की मार झेल रहे श्रमिकों की व्यथा को प्रमुखता से उठाया गया। नेताओं ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में मिल रही मजदूरी से परिवार का भरण-पोषण करना असंभव हो गया है, इसलिए अविलंब वेतन वृद्धि अनिवार्य है। निर्माण कार्यों में लगी सुरक्षा व्यवस्था पर भी कड़ा प्रहार करते हुए यूनियन ने कहा कि जिले में बड़े पैमाने पर चल रहे निर्माण कार्यों के दौरान प्रशासन की निरंतर लापरवाही बरती जा रही है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है। प्रशासन द्वारा निर्माण स्थलों की निगरानी न करना और ठेकेदारों द्वारा समय पर पूर्ण वेतन न देने की प्रवृत्ति ने मजदूरों की कमर तोड़ दी है। इसके अतिरिक्त, लैंगिक भेदभाव का मुद्दा उठाते हुए यूनियन ने जोर दिया कि महिला एवं पुरुष श्रमिकों को समान कार्य के लिए समान वेतन मिलना चाहिए, क्योंकि महिलाओं को पुरुष के मुकाबले कम दिहाड़ी देना उनके श्रम का अपमान है।
इन समस्याओं के निराकरण हेतु बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया, जिसके तहत अकुशल मजदूरों के लिए 600 रुपये प्रतिदिन और कुशल कारीगरों के लिए 900 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी सुनिश्चित करने की मांग की गई। अपनी मांगों को मनवाने के लिए यूनियन ने आगामी आंदोलनात्मक रणनीति भी तैयार की है। इस महत्वपूर्ण बैठक के दौरान कांतिलाल ननोमा, कन्हैयालाल, मोतीलाल एवं कमला बाई सहित अनेक पदाधिकारी और यूनियन सदस्य उपस्थित रहे। यह बैठक निर्माण श्रमिकों के सम्मान और उनके आर्थिक अधिकारों की लड़ाई में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है।

