डूंगरपुर में मुख्यमंत्री की बजट घोषणा को ठेंगा: मिड डे मील खाद्यान्न परिवहन में बड़ा खेल, अधिकारियों की चुप्पी ने खड़े किए सवाल
डूंगरपुर में मिड डे मील खाद्यान्न परिवहन को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। मुख्यमंत्री की बजट घोषणा और संयुक्त शासन सचिव के स्पष्ट आदेशों के बावजूद रसद विभाग ने क्रय-विक्रय सहकारी समितियों के बजाय निजी फर्म को तरजीह दी है। आज ठेका खत्म होने के बावजूद नए टेंडर नहीं हुए हैं और अधिकारी अवकाश पर हैं, जिससे स्कूलों में रसद आपूर्ति संकट में है।

डूंगरपुर। राजस्थान के मुख्यमंत्री की बजट घोषणाओं और उच्चाधिकारियों के कड़े निर्देशों को धरातल पर किस तरह ठेंगा दिखाया जाता है, इसकी एक बानगी डूंगरपुर जिले में देखने को मिल रही है। जिले में मिड डे मील योजना के तहत स्कूलों तक पहुंचने वाले निवाले पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं क्योंकि रसद विभाग ने सरकार के स्पष्ट आदेशों के बावजूद खाद्यान्न परिवहन की व्यवस्था को निजी हाथों की कठपुतली बना दिया है। संयुक्त शासन सचिव द्वारा 22 अप्रैल 2025 को जारी आदेश में स्पष्ट किया गया था कि विद्यालयों में खाद्यान्न का परिवहन क्रय-विक्रय सहकारी समितियों (KVS) के माध्यम से ही किया जाए, लेकिन डूंगरपुर में रसद विभाग की कार्यप्रणाली सरकार की पारदर्शिता और मंशा पर पानी फेरती नजर आ रही है।
हैरत की बात यह है कि वर्तमान परिवहन ठेके की मियाद आज 22 जनवरी 2026 को समाप्त हो रही है, लेकिन विभाग ने अब तक नवीन टेंडर प्रक्रिया शुरू करने की जहमत नहीं उठाई। सूत्र बताते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया को लटकाने के लिए संबंधित विभाग के जिम्मेदार अधिकारी 'आकस्मिक अवकाश' पर चले गए हैं, ताकि पुरानी निजी फर्म को ही आगामी तीन महीनों के लिए कार्य विस्तार (एक्सटेंशन) देने का रास्ता साफ किया जा सके। यह सीधे तौर पर मुख्यमंत्री बजट घोषणा 2024-25 और आयुक्त मिड डे मील द्वारा 1 सितंबर 2025 को जारी उन निर्देशों का उल्लंघन है, जिसमें कलेक्टरों को पारदर्शिता के साथ केवीएस से कार्य कराने के निर्देश दिए गए थे।
इस पूरे प्रकरण में आर्थिक गणित भी संदेहास्पद नजर आता है। विभाग ने एक निजी फर्म को मात्र 14.49 रुपये प्रति क्विंटल की दर से ठेका दे रखा है, जबकि वास्तविकता यह है कि एक बोरी को उतारने-चढ़ाने की मजदूरी ही चार चरणों में लगभग 16 रुपये बैठती है। डीजल और अन्य खर्चों को जोड़कर यह लागत 40 रुपये के पार पहुंच जाती है। इतने कम दाम पर ठेका लेने के कारण निजी फर्म समय पर स्कूलों में रसद पहुंचाने में नाकाम रही है, जिससे मिड डे मील व्यवस्था पटरी से उतर चुकी है। पिछले एक दशक से यह कार्य क्रय-विक्रय सहकारी समितियों द्वारा कुशलतापूर्वक किया जा रहा था, जिनके पास करोड़ों की लागत के सुरक्षित गोदाम और अनुभवी कार्मिक हैं। अब केवीएस को दरकिनार किए जाने से जहां समितियों को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है, वहीं जिले की रसद व्यवस्था में मची इस खलबली ने प्रशासनिक निष्पक्षता पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

Pratahkal Bureau
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