महाराष्ट्र के त-हाडी क्षेत्र में इस साल मौसम की बेरुखी ने कपास किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। जून-जुलाई में दमदार बारिश नहीं होने, अगस्त में वर्षा की लंबी खेंच और फसलों पर रोगों के प्रकोप के कारण कपास की पैदावार में भारी गिरावट की आशंका है। हालात ऐसे हैं कि हर साल दिसंबर-जनवरी तक चलने वाला कपास का सीजन इस बार अक्टूबर में ही समाप्त होने के आसार हैं। किसानों के सामने स्थिति ऐसी बन गई है कि फसल पर किया गया खर्च निकालना भी मुश्किल हो रहा है।

किसानों ने मई महीने में कुओं के सीमित पानी के सहारे ड्रिप सिंचाई तकनीक का इस्तेमाल करते हुए बड़े पैमाने पर कपास की बुवाई की थी। हालांकि, जून और जुलाई में एक भी जोरदार बारिश नहीं होने से कपास के पौधों की वृद्धि रुक गई। वहीं, बारिश पर निर्भर कपास की बुवाई जुलाई के आखिरी सप्ताह में होने के कारण फसल को पर्याप्त विकास का अवसर नहीं मिल पाया। पूरे श्रावण महीने में बारिश नहीं होने से वर्षा आधारित फसलें सूख गईं। दूसरी ओर, गर्मियों में बोई गई कपास की फसल पर लाल्या रोग का प्रकोप बढ़ गया, जिससे किसानों के लिए खेती पर किया गया खर्च निकालना भी कठिन हो गया है।

इस साल मौसम की अनिश्चितता, बार-बार होने वाले मौसमी बदलाव और रिमझिम बारिश के कारण फसलों में रोगों का प्रकोप लगातार बढ़ता रहा। फसलों को बचाने के लिए किसानों को बड़ी रकम खर्च करनी पड़ी। इसके बावजूद उत्पादन में भारी गिरावट होने की आशंका है। बढ़ती लागत और घटती पैदावार ने किसानों के सामने आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है।

किसानों ने गर्मियों में बड़े पैमाने पर कपास की खेती की थी। लेकिन फसलों की वृद्धि के महत्वपूर्ण समय में जोरदार बारिश नहीं हुई और कुएं भी सूखने लगे। पानी की कमी के कारण पौधों का विकास प्रभावित हुआ। नतीजतन, कपास के पौधों पर बहुत कम बोंडे यानी कपास की फलियां तैयार हुईं। इससे उत्पादन में बड़ी गिरावट होने की आशंका है। किसानों को लागत के मुकाबले नाममात्र की आमदनी मिलने की स्थिति बन रही है और कई किसानों के लिए खर्च की भरपाई करना भी मुश्किल दिखाई दे रहा है।

श्रावण महीने में बारिश के गायब रहने और फसलों को पर्याप्त पानी नहीं मिलने के कारण कपास की फलियां तैयार होने के समय ही फसल पर लाल्या और मर रोग ने हमला कर दिया। रोगों के प्रकोप से पौधों पर केवल बोंडे ही बची रह गई हैं। फसल की बिगड़ती स्थिति को देखते हुए इस साल कपास का सीजन अक्टूबर में ही समाप्त होने का अनुमान लगाया जा रहा है। इससे उन किसानों की उम्मीदों को झटका लगा है, जो सामान्य तौर पर दिसंबर-जनवरी तक कपास की तुड़ाई और बिक्री जारी रहने की उम्मीद करते हैं।

रबी सीजन की उम्मीदें भी धुंधली

कपास का सीजन समय से पहले समाप्त होने के साथ ही रबी फसलों की खेती को लेकर भी किसानों की चिंताएं बढ़ गई हैं। हर साल दिसंबर-जनवरी तक चलने वाला कपास का सीजन इस बार दिवाली से पहले ही खत्म होने की स्थिति में है। इसकी प्रमुख वजह मानसून के दौरान बेहद कम बारिश होना है, जिसके चलते फसलें सितंबर महीने में ही सूखने लगी थीं।

लगातार पड़ रही तेज धूप के कारण जमीन के भीतर पानी का स्तर भी हर दिन नीचे जा रहा है। कुओं का जलस्तर तेजी से गिर रहा है और पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं होने से खेती पर संकट गहराता जा रहा है। दूसरी ओर, परती की बारिश ने भी साथ नहीं दिया है। ऐसे में कपास की पैदावार घटने के साथ रबी सीजन की संभावनाएं भी कमजोर पड़ती दिखाई दे रही हैं। कम बारिश, सूखते कुओं और फसलों में रोगों के बढ़ते प्रकोप के बीच किसानों के लिए आगामी खेती का इंतजाम करना भी चुनौती बन गया है।

Pratahkal Newsroom

Pratahkal Newsroom

प्रातःकाल न्यूज़-रूम, प्रातःकाल न्यूज़ की वह समर्पित संपादकीय टीम है, जो सटीक, समयबद्ध और निष्पक्ष समाचार पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारा न्यूज़-रूम राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय मामलों में सत्यापित रिपोर्टिंग, गहन विश्लेषण और जिम्मेदार पत्रकारिता पर अपना ध्यान केंद्रित करता है।

Next Story