नई दिल्ली। आपसी सहमति से तलाक के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक महिला के असाधारण निर्णय की सराहना करते हुए उसकी प्रशंसा की। विवाह समाप्त करते समय महिला ने किसी भी प्रकार का गुजारा भत्ता, भरण-पोषण या आर्थिक प्रतिपूर्ति की मांग नहीं की। इतना ही नहीं, उसने विवाह के समय पति की मां से मिले सोने के कंगन भी वापस कर दिए। अदालत ने इसे बेहद दुर्लभ और उल्लेखनीय कदम बताते हुए अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग करते हुए विवाह संबंध समाप्त कर दिया।

यह मामला न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध था। सुनवाई की शुरुआत में ही महिला के वकील ने अदालत को अवगत कराया कि उनकी मुवक्किल किसी भी भरण-पोषण या आर्थिक दावे की इच्छुक नहीं है। अदालत को यह भी बताया गया कि महिला स्वयं वे सोने के कंगन लौटाना चाहती हैं, जिन्हें विवाह के समय पति की मां ने उन्हें उपहारस्वरूप दिए थे।

पहले पल में पीठ को यह गलतफहमी हुई कि पत्नी अपना स्त्री-धन वापस मांग रही है, परंतु जैसे ही स्पष्ट किया गया कि वह उपहार लौटा रही हैं, न्यायमूर्ति पारदीवाला मुस्कुराए और टिप्पणी की कि ऐसा समझौता आज के समय में अत्यंत दुर्लभ है। उन्होंने कहा कि अक्सर तलाक मामलों में लंबी कानूनी लड़ाई, आर्थिक दावे और विवाद देखने को मिलते हैं, लेकिन यह मामला सकारात्मक और असाधारण उदाहरण प्रस्तुत करता है।

अदालत ने अपने लिखित आदेश में भी इस कदम की प्रशंसा की और कहा कि यह उन विरले मामलों में से एक है, जहां किसी भी प्रकार का लेन-देन या आर्थिक विवाद नहीं हुआ। सुनवाई के दौरान जब महिला वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़ीं, तो न्यायमूर्ति पारदीवाला ने व्यक्तिगत रूप से उनकी सराहना करते हुए कहा कि अतीत को पीछे छोड़ कर खुशहाल जीवन बिताएं।

खंडपीठ ने अंत में अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग करते हुए विवाह संबंध को औपचारिक रूप से समाप्त किया और स्पष्ट किया कि दोनों पक्षों के बीच लंबित अन्य कोई कार्यवाही हो तो वह भी इसी आदेश के साथ समाप्त मानी जाएगी।

इस निर्णय ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि आपसी सम्मान और समझदारी से लिए गए फैसले कानूनी प्रक्रिया को सरल बना सकते हैं और समाज के सामने एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं।

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