दर डेयरी ने किया भारत का पहला बड़ा ग्रीन इनोवेशन ; जानिए नए ‘नो प्लास्टिक ट्रेस’ दूध पैकेट से क्या बदलेगा
मदर डेयरी ने भारत का पहला प्राकृतिक रूप से विघटित होने वाला दूध पाउच लॉन्च करने की घोषणा की है। 5 जून 2026 से दिल्ली-एनसीआर में शुरू होने वाली यह पहल प्लास्टिक प्रदूषण कम करने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है। चार वर्षों के शोध से विकसित यह पैकेजिंग मिट्टी में प्राकृतिक रूप से टूट जाती है।

मदर डेयरी के पर्यावरण-अनुकूल डिग्रेडेबल मिल्क पाउच
भारत में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच मदर डेयरी ने एक ऐसी पहल की है, जिसे देश के डेयरी और पैकेजिंग उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है। कंपनी ने भारत के पहले प्राकृतिक रूप से विघटित होने वाले दूध के पाउच की घोषणा की है, जिसका उद्देश्य रोजमर्रा के उपयोग में आने वाले प्लास्टिक पैकेजिंग से होने वाले प्रदूषण को कम करना है। इस नई पहल की शुरुआत 5 जून 2026 को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में की जाएगी।
मदर डेयरी द्वारा पेश किया गया यह नया दूध पाउच पारंपरिक प्लास्टिक पैकेटों से पूरी तरह अलग है। सामान्य प्लास्टिक पैकेजिंग यदि उचित तरीके से पुनर्चक्रित न हो तो पर्यावरण में सैकड़ों वर्षों तक बनी रह सकती है, जबकि नया पाउच मिट्टी में प्राकृतिक रूप से विघटित होने के लिए तैयार किया गया है। कंपनी के अनुसार इस पैकेजिंग में विशेष प्रकार की डिग्रेडेबल तकनीक का उपयोग किया गया है, जो प्राकृतिक परिस्थितियों में पहुंचने पर एक जैव-उपलब्ध मोम जैसी सामग्री में परिवर्तित हो जाती है। इसके बाद मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव इस पदार्थ को प्राकृतिक तत्वों में बदल देते हैं, जिससे किसी भी प्रकार का दृश्यमान प्लास्टिक अवशेष नहीं बचता।
दिल्ली-एनसीआर में इस नई पैकेजिंग की शुरुआत मदर डेयरी के काउ मिल्क वेरिएंट से की जाएगी। कंपनी वर्तमान में विभिन्न राज्यों में प्रतिदिन लगभग 55 लाख लीटर दूध की बिक्री करती है। मदर डेयरी, नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (NDDB) की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है और देश के सबसे बड़े डेयरी ब्रांडों में से एक मानी जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत में प्रतिदिन लाखों प्लास्टिक दूध पाउच उपयोग में आते हैं। हालांकि इनमें से बड़ी संख्या पुनर्चक्रण प्रणाली तक पहुंच जाती है, लेकिन काफी मात्रा में प्लास्टिक कचरा ऐसी व्यवस्था से बाहर रह जाता है और लैंडफिल, नालों, नदियों तथा खुले वातावरण में पहुंचकर प्रदूषण का कारण बनता है। पर्यावरण विशेषज्ञ इसे "फ्यूजिटिव प्लास्टिक" कहते हैं। मदर डेयरी का दावा है कि नई पैकेजिंग इसी समस्या का समाधान करने के उद्देश्य से विकसित की गई है ताकि यदि कोई पाउच गलती से खुले वातावरण में भी पहुंच जाए तो वह समय के साथ प्राकृतिक रूप से विघटित हो सके।
कंपनी के अनुसार यह नई तकनीक पैकेजिंग सामग्री को ऐसे तत्व में परिवर्तित करती है जिसे मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव आसानी से तोड़ सकें। जहां पारंपरिक प्लास्टिक को पूरी तरह समाप्त होने में सदियां लग सकती हैं, वहीं यह नया पाउच कुछ वर्षों के भीतर मिट्टी में विघटित होने के लिए डिजाइन किया गया है।
नई दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मदर डेयरी के प्रबंध निदेशक जयतीर्था चारी ने बताया कि इस तकनीक को विकसित करने में चार वर्षों से अधिक समय तक शोध और परीक्षण किए गए। उन्होंने कहा कि कंपनी का लक्ष्य ऐसी पैकेजिंग तैयार करना था जो पर्यावरण में प्लास्टिक का कोई निशान न छोड़े और साथ ही उपभोक्ताओं को गुणवत्ता एवं सुरक्षा के मामले में किसी प्रकार का समझौता न करना पड़े।
इस परियोजना के तहत चार वर्षों से अधिक समय तक अनुसंधान और परीक्षण किए गए। पैकेजिंग तकनीक विशेषज्ञों के साथ सहयोग स्थापित किया गया, दूध की गुणवत्ता और शेल्फ लाइफ पर प्रभाव का मूल्यांकन किया गया तथा यह सुनिश्चित किया गया कि नई पैकेजिंग मौजूदा वितरण और आपूर्ति प्रणाली के साथ पूरी तरह अनुकूल रहे। कंपनी ने स्पष्ट किया है कि यह पाउच डेयरी उद्योग के सभी आवश्यक सुरक्षा और गुणवत्ता मानकों को पूरा करता है।
मदर डेयरी की योजना फिलहाल दिल्ली-एनसीआर में इस पहल की शुरुआत करने की है। शुरुआती चरण में उपभोक्ताओं की प्रतिक्रिया, वितरण प्रणाली की दक्षता और संचालन संबंधी अनुभवों का मूल्यांकन किया जाएगा। इसके बाद अन्य क्षेत्रों में विस्तार पर निर्णय लिया जा सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कंपनी ने इस पर्यावरण-अनुकूल पहल का बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डालने का फैसला किया है। मदर डेयरी ने स्पष्ट किया है कि नए प्राकृतिक रूप से विघटित होने वाले पाउच में बिकने वाले दूध की कीमतों में कोई अतिरिक्त वृद्धि नहीं की जाएगी।
पर्यावरणीय दृष्टि से यह पहल कई स्तरों पर महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे लंबे समय तक बने रहने वाले प्लास्टिक कचरे में कमी आ सकती है, फेंके गए दूध पैकेटों से होने वाला पर्यावरणीय दबाव घट सकता है और भारत के सर्कुलर इकोनॉमी तथा सतत विकास लक्ष्यों को बल मिल सकता है। साथ ही यह कदम खाद्य एवं पेय उद्योग की अन्य कंपनियों को भी हरित और टिकाऊ पैकेजिंग अपनाने के लिए प्रेरित कर सकता है।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर शुरू होने जा रही यह पहल केवल एक नए उत्पाद की लॉन्चिंग नहीं है, बल्कि भारत में टिकाऊ पैकेजिंग और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत भी है। यदि यह मॉडल बड़े पैमाने पर सफल होता है, तो यह देश के पैकेजिंग उद्योग की दिशा बदलने के साथ-साथ प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के प्रयासों को नई गति दे सकता है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
