दिल्ली की कोर्ट ने 26 साल पुराने केस में CBI के संयुक्त निदेशक और पूर्व ACP को मारपीट व फर्जी रेड का दोषी पाया। सत्ता के दुरुपयोग पर न्यायपालिका का कड़ा प्रहार।

CBI Joint Director convicted : न्याय की चक्की भले ही धीमी चलती है, लेकिन जब वह चलती है तो बड़े से बड़े ओहदेदारों के अहंकार को भी पीस कर रख देती है। दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसले में सत्ता के दुरुपयोग की सीमाओं को लांघने वाले दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को 26 साल पुराने मामले में दोषी ठहराते हुए यह साबित कर दिया है कि कानून के हाथ किसी की भी वर्दी से लंबे होते हैं। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी शशांक नंदन भट्ट ने सीबीआई के वर्तमान संयुक्त निदेशक रामनीश और दिल्ली पुलिस के सेवानिवृत्त सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) वीके पांडे को मारपीट, आपराधिक अतिक्रमण और तोड़फोड़ के गंभीर आरोपों में दोषी करार दिया है। यह फैसला उस 'दुर्भावनापूर्ण' छापेमारी की काली कहानी पर मुहर लगाता है, जिसे वर्ष 2000 में एक ईमानदार अधिकारी के आत्मसम्मान को कुचलने के लिए अंजाम दिया गया था।

इस कानूनी लड़ाई की जड़ें अक्टूबर 2000 की उस सर्द सुबह में दफन हैं, जब सीबीआई की एक टीम ने 1985 बैच के आईआरएस अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल के घर पर धावा बोला था। अग्रवाल उस समय दिल्ली जोन में प्रवर्तन उप निदेशक के पद पर तैनात थे और रसूखदार लोगों से जुड़े संवेदनशील मामलों की जांच कर रहे थे। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यह छापेमारी कोई सामान्य कानूनी प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) के उस आदेश को निष्प्रभावी करने की एक सोची-समझी साजिश थी, जिसमें अग्रवाल के निलंबन की समीक्षा करने का निर्देश दिया गया था। जांच में पाया गया कि सीबीआई अधिकारियों ने नियमों को ताक पर रखकर 18 अक्टूबर की शाम एक गुप्त बैठक की और अगली सुबह सूरज निकलने से पहले ही अग्रवाल के घर की घेराबंदी कर दी।

अदालत के सामने पेश किए गए साक्ष्य किसी फिल्मी पटकथा की तरह खौफनाक थे। 19 अक्टूबर 2000 को तड़के 5:00 बजे जब सुरक्षा गार्ड ने सीबीआई टीम से पहचान पत्र मांगा, तो उसकी बेरहमी से पिटाई की गई। अधिकारी चारदीवारी फांदकर अंदर घुसे और घर का मुख्य स्लाइडिंग दरवाजा तोड़ दिया। मर्यादा की सारी हदें पार करते हुए अधिकारियों ने अग्रवाल के परिवार के सदस्यों को एक कमरे में बंद कर दिया और खुद अग्रवाल को उनके शयनकक्ष से अंतर्वस्त्रों में ही बाहर घसीट लाए। इस दौरान उनके साथ मारपीट की गई और उन्हें पीरगढ़ी चौक के पास एक अज्ञात स्थान पर ले जाकर प्रताड़ित किया गया। बचाव पक्ष के उन दावों को अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि दरवाजा टूटा नहीं था, क्योंकि स्वयं आरोपियों द्वारा उच्च न्यायालय में पेश की गई तलाशी सूची और हलफनामों में चोटों और नुकसान की बात स्वीकार की गई थी।

न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि इन अधिकारियों का कृत्य किसी भी सूरत में 'सरकारी कर्तव्य के निर्वहन' के दायरे में नहीं आता है। न्यायाधीश ने माना कि अभियुक्तों ने कानून द्वारा प्रदत्त शक्तियों का घोर उल्लंघन किया है, इसलिए उन्हें दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के तहत मिलने वाले किसी भी कानूनी संरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता। शिकायतकर्ता अशोक कुमार अग्रवाल, जिन्हें अंततः सीबीआई द्वारा दर्ज सभी फर्जी मामलों में बरी कर दिया गया, ने अपनी जांच के दौरान वरिष्ठों के भारी दबाव की बात भी कही थी। अदालत ने सजा पर बहस के लिए 27 अप्रैल की तारीख तय की है। यह फैसला न केवल सत्ता के गलियारों में बैठे भ्रष्ट तंत्र के लिए एक चेतावनी है, बल्कि आम नागरिक के लिए न्यायपालिका पर अटूट विश्वास का प्रतीक भी है।

Updated On 20 April 2026 3:50 PM IST
Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

Next Story