क्या अब रेगिस्तान की रेट में उगेंगे पौधे ? जानें क्या है अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट
दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में 700 किलोमीटर लंबी हरित पट्टी विकसित कर थार मरुस्थल के विस्तार को रोकने और भूजल स्तर सुधारने की कवायद तेज हुई।

थार मरुस्थल के विस्तार को रोकने और पर्यावरण संतुलन बहाल करने के लिए दिल्ली से गुजरात तक विकसित की जा रही अरावली ग्रीन वॉल परियोजना के तहत लगाए गए पौधों का एक क्षेत्र।
Aravalli Green Wall project progress : भारत के भौगोलिक अस्तित्व और पर्यावरण संतुलन के लिए सदियों से सुरक्षा कवच रही अरावली पर्वत शृंखला को बचाने और थार मरुस्थल के खतरनाक विस्तार को रोकने के लिए शुरू की गई 'अरावली ग्रीन वॉल परियोजना' ने एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक कामयाबी हासिल की है। मार्च 2023 में शुरू की गई इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में फैली प्राचीन अरावली पहाड़ियों के समानांतर 700 किलोमीटर लंबी और 5 किलोमीटर चौड़ी एक अभेद्य हरी पट्टी (ग्रीन बफर) तैयार की जा रही है। साल 2026 के शुरुआती महीनों तक इस परियोजना ने धरातल पर उम्मीद से कहीं अधिक तीव्र प्रगति दिखाई है, जिसने देश के पर्यावरणविदों और नीति निर्माताओं को एक नया विश्वास दिया है। यह विशाल हरित दीवार न केवल मरुस्थलीकरण को रोकने में ढाल बनेगी, बल्कि उत्तर भारत में लगातार आने वाले धूल भरे तूफानों की तीव्रता को कम करने और भूजल स्तर को रिचार्ज करने में भी क्रांतिकारी भूमिका निभा रही है।
इस महा-अभियान के तहत अब तक हुए कार्यों के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले और उत्साहजनक हैं। आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार, शुरुआती चरण से लेकर अब तक कुल 2.7 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र को इस परियोजना के दायरे में लाया जा चुका है। केवल वर्ष 2025 के भीतर ही एक बड़े चमत्कार को अंजाम देते हुए 36,025 हेक्टेयर प्रभावित और बंजर भूमि को पूरी तरह से पुनर्जीवित (रिस्टोर) कर दिया गया है। इस दौरान पारिस्थितिक तंत्र को प्राकृतिक रूप से मजबूत करने के लिए रिकॉर्ड 39 मिलियन (3.9 करोड़) पौधों का रोपण किया गया है। पर्यावरण की अनुकूलता को ध्यान में रखते हुए इस वनीकरण में केवल अरावली की मिट्टी के अनुकूल स्थानीय प्रजातियों जैसे धौ, खेजड़ी, नीम और बबूल को प्राथमिकता दी गई है। इसके साथ ही, पहाड़ियों के पारंपरिक जलसंभरों (वाटरशेड) को पुनर्जीवित करने और बंजर हो चुके घास के मैदानों को दोबारा हरा-भरा बनाने का काम युद्धस्तर पर जारी है।
इस राष्ट्रीय परियोजना की सबसे बड़ी ताकत इसका पूर्णतः लोकतांत्रिक और जन-केंद्रित होना है। अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट केवल सरकारी फाइलों तक सीमित न रहकर एक विशाल जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। स्थानीय स्तर पर पंचायतों के सहयोग से बड़े पैमाने पर नर्सरियों की स्थापना की गई है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के हजारों नए अवसरों का सृजन हुआ है। पर्यावरण संरक्षण के इस महायज्ञ में स्थानीय युवा समूहों और महिला स्वयं सहायता समूहों को सीधे तौर पर जोड़ा गया है, जिससे न केवल वनीकरण को सुरक्षा मिल रही है बल्कि क्षेत्र की जैव विविधता में भी भारी सुधार देखा जा रहा है। स्थानीय समुदायों की यह सक्रिय भागीदारी इस बात का उदाहरण है कि कैसे पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक साथ गति दी जा सकती है।
कानूनी और आधिकारिक प्रतिबद्धताओं के नजरिए से देखा जाए तो यह परियोजना अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के वैश्विक वादों को पूरा करने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम कन्वेंशन (UNCCD) के तहत साल 2030 तक देश की 26 मिलियन हेक्टेयर संकुचित और बंजर भूमि को बहाल करने का वैश्विक संकल्प लिया है। अरावली ग्रीन वॉल की यह तेज रफ्तार भारत की इसी मजबूत प्रतिबद्धता को दर्शाती है। हालांकि, इस मार्ग में अवैध खनन, अनियंत्रित शहरीकरण और भू-माफियाओं जैसी गंभीर प्रशासनिक व कानूनी चुनौतियां भी खड़ी हैं, जिनसे निपटने के लिए चारों राज्यों की सरकारों और केंद्रीय मंत्रालयों के बीच कड़े विनियामक कदम उठाए जा रहे हैं ताकि इस हरित कवच को किसी भी प्रकार के मानवीय हस्तक्षेप से सुरक्षित रखा जा सके।
अरावली ग्रीन वॉल परियोजना की यह असाधारण सफलता आज पूरी दुनिया के लिए मरुस्थलीकरण और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जंग का एक रोल मॉडल बनकर उभरी है। जिस प्राचीन अरावली शृंखला के वजूद पर इंसानी लालच के कारण संकट मंडरा रहा था, उसे इस 'हरित दीवार' के जरिए एक नया जीवनदान मिल रहा है। यह महा-परियोजना आने वाली पीढ़ियों के लिए न केवल शुद्ध हवा और पानी सुनिश्चित करेगी, बल्कि दिल्ली-एनसीआर समेत पूरे उत्तर भारत के पर्यावरण को एक नया सुरक्षा तंत्र प्रदान करेगी। इस ऐतिहासिक पहल का प्रभाव आने वाले दशकों में भारत के मानचित्र पर साफ दिखाई देगा, जो यह सिद्ध करता है कि दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और जनभागीदारी से प्रकृति के क्षरण को न केवल रोका जा सकता है, बल्कि उसे दोबारा समृद्ध भी किया जा सकता है।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
