एम्स दिल्ली के अध्ययन के अनुसार एक साल से कम उम्र के बच्चों में अत्यधिक स्क्रीन टाइम ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर का कारण बन सकता है। \

AIIMS Delhi Autism Study 2026 : आधुनिकता की दौड़ में जिस स्मार्टफोन को हम बच्चों को बहलाने का सबसे आसान जरिया मान बैठे हैं, वही उनकी मानसिक दुनिया को खामोश कर रहा है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के एक नवीनतम और चौंकाने वाले अध्ययन ने अभिभावकों की नींद उड़ा दी है। शोध के अनुसार, एक साल से कम उम्र के शिशुओं में अत्यधिक स्क्रीन टाइम, तीन साल की उम्र तक ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के जोखिम को कई गुना बढ़ा सकता है। यह केवल एक चिकित्सकीय रिपोर्ट नहीं, बल्कि उस डिजिटल खतरे की घंटी है जो हमारी अगली पीढ़ी के सामाजिक और संज्ञानात्मक विकास को अपनी चपेट में ले रही है।

अध्ययन की गंभीरता को समझाते हुए एम्स के बाल रोग विभाग की प्रोफेसर डॉ. शेफाली गुलाटी ने बताया कि शुरुआती उम्र में स्क्रीन का अधिक संपर्क बच्चों के मस्तिष्क विकास और उनके सामाजिक व्यवहार पर गहरा नकारात्मक प्रहार करता है। एम्स के आंकड़ों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ है कि ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों में स्क्रीन एक्सपोजर की शुरुआत बहुत ही कम उम्र में हो गई थी। हालांकि यह समस्या दोनों लिंगों में देखी गई, लेकिन लड़कों में ऑटिज्म के लक्षणों की दर तुलनात्मक रूप से अधिक दर्ज की गई है। ऑटिज्म एक ऐसी जटिल न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है जिसमें बच्चा बाहरी दुनिया से कटने लगता है और उसके संवाद करने की क्षमता बाधित हो जाती है।

वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो स्थिति और भी चिंताजनक प्रतीत होती है। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के 2025 के ताजा अनुमानों के मुताबिक, दुनिया में लगभग हर 31 में से एक व्यक्ति ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर का शिकार पाया जा रहा है। एम्स की यह स्टडी रेखांकित करती है कि कैसे शुरुआती वर्षों में मोबाइल या टीवी का अत्यधिक उपयोग इस खतरे को और अधिक प्रत्यक्ष बना रहा है। ऑटिज्म के लक्षण अक्सर 12 से 18 महीने की उम्र के बीच उभरने लगते हैं, लेकिन सही पहचान न होने के कारण यह समस्या 2 से 3 साल की उम्र तक गंभीर रूप धारण कर लेती है।

इस खतरे से निपटने के लिए विशेषज्ञों ने सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स और इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की संयुक्त गाइडलाइंस स्पष्ट करती हैं कि 18 महीने से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम 'शून्य' होना चाहिए। 18 महीने से 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए केवल सीमित और उद्देश्यपूर्ण स्क्रीन उपयोग की अनुमति है, जबकि 7 वर्ष से बड़े बच्चों के लिए भी यह सीमा अधिकतम दो घंटे निर्धारित की गई है। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि मोबाइल या टीवी बच्चे के लिए माता-पिता के संवाद और स्पर्श का विकल्प कभी नहीं हो सकते।

अध्ययन का निष्कर्ष एक कड़ा संदेश देता है कि बच्चों को गैजेट्स के हवाले करना उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। ऑटिज्म का कोई निश्चित मेडिकल टेस्ट नहीं है, इसकी पहचान केवल बच्चे के व्यवहार और सामाजिक प्रतिक्रिया के सूक्ष्म अवलोकन से ही संभव है। ऐसे में जागरूकता और समय पर हस्तक्षेप ही एकमात्र मार्ग है। यदि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे एक स्वस्थ सामाजिक वातावरण में विकसित हों, तो हमें उनके हाथों से स्मार्टफोन छीनकर उन्हें अपना समय और सीधा संवाद देना होगा, अन्यथा डिजिटल दुनिया का यह आकर्षण उन्हें ऑटिज्म के अंधेरे गलियारे में धकेल सकता है।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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