कामां रोड स्थित लाला मुरारी लाल अग्रवाल स्मृति धर्मशाला एवं सेवा संस्थान ट्रस्ट, अग्रवाल समाज डीग के तत्वावधान में चल रही श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के पांचवें दिन व्यासपीठ पर विराजमान भागवताचार्य पंडित मुरारी लाल पाराशर ने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का भावपूर्ण वर्णन किया।

कथा के दौरान उन्होंने जीवन के आध्यात्मिक संदेश को स्पष्ट करते हुए कहा कि व्यक्ति को सदैव धर्म के मार्ग पर चलते हुए समाज सेवा में अग्रसर रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि मानव जीवन चार प्रमुख व्याधियों—रोग, शोक, वृद्धावस्था और मृत्यु—से प्रभावित रहता है और अंततः इन्हीं के बीच से उसे इस संसार से विदा लेना पड़ता है। इसलिए सांसारिक बंधनों में अत्यधिक आसक्ति मनुष्य को पाप के मार्ग की ओर ले जाती है, जबकि परमात्मा की शरण ही जीवन रूपी नैया को पार लगाने का मार्ग है।

वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए पंडित पाराशर ने कहा कि आज के समय में बढ़ता अविश्वास, स्वार्थ और लोभ समाज में अनेक विकृतियों को जन्म दे रहा है, जिससे दुख और पतन की स्थिति उत्पन्न हो रही है।

कथा प्रसंग में उन्होंने गोवर्धन पूजा की पौराणिक कथा का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने बताया कि जब श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्रदेव की पूजा के स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा का संदेश दिया, तो यह निर्णय देवराज इंद्र के अहंकार को चुनौती के रूप में प्रतीत हुआ। क्रोधित होकर इंद्र ने मूसलाधार वर्षा प्रारंभ कर दी, जिससे ब्रज में हाहाकार मच गया।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर समस्त ब्रजवासियों को उसकी छाया में सुरक्षित कर लिया। अंततः इंद्रदेव को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा याचना की।

कथा के इस प्रसंग ने श्रद्धालुओं को धर्म, अहंकार के त्याग और ईश्वर भक्ति के महत्व का संदेश दिया।

Pratahkal Bureau

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