दौसा, 7 नवम्बर। स्वर्गीय पंडित नवल किशोर शर्मा राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, दौसा में शुक्रवार को “एकीकृत पारिस्थितिकी, अर्थव्यवस्था, नैतिकता, समाजशास्त्र और सतत विकास: विकसित भारत की ओर मार्ग” विषय पर दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ हुआ। इस संगोष्ठी में देश-विदेश के विद्वानों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने भाग लेकर भारतीय संस्कृति और जीवनशैली के माध्यम से सतत विकास के मार्ग पर गहन मंथन किया।

कार्यक्रम के मुख्य संरक्षक एवं महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफेसर लालाराम मीणा ने उद्घाटन सत्र में सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि यह संगोष्ठी विकसित भारत के निर्माण हेतु पारिस्थितिकी, अर्थशास्त्र, नैतिकता और समाजशास्त्र के समन्वय का सशक्त मंच बनेगी। उन्होंने इस वैश्विक विषय पर महाविद्यालय में विमर्श आयोजित होने पर प्रसन्नता व्यक्त की।

संगोष्ठी के संयोजक डॉ. मोहन सिंह ने बताया कि यह दो दिवसीय आयोजन भारतीय दृष्टिकोण से विकास के नए आयामों को समझने का प्रयास है, जिसमें विविध देशों के शोधार्थी अपने शोध पत्र प्रस्तुत करेंगे।

विशिष्ट अतिथि जिला कलेक्टर देवेंद्र कुमार ने अपने उद्बोधन में सतत विकास और ग्रामीण विकास के बीच संतुलन पर जोर देते हुए कहा कि हमें नागरिक अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों का भी पालन करना चाहिए। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा का संकल्प लेने का आह्वान किया।

अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (ABRSM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रोफेसर नारायण लाल गुप्ता ने अपने सारगर्भित व्याख्यान में कहा कि भारतीय संस्कृति सदैव विश्व कल्याण की भावना से संचालित रही है। यहां भूमि, गाय और नदियों को माता के रूप में पूजने की परंपरा रही है, जबकि पश्चिमी सभ्यता ने प्रकृति के दोहन को प्रगति का प्रतीक बना लिया। उन्होंने कहा कि “भारतीय जीवनशैली में उपयोगितावाद, शुभ लाभ, अंत्योदय और सर्वोदय जैसे सिद्धांत सतत उपभोग और संरक्षण के उदाहरण हैं।”

मुख्य अतिथि राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर की कुलपति प्रोफेसर अल्पना कटेजा ने कहा कि आज कार्बन उत्सर्जन से विश्व गंभीर संकट का सामना कर रहा है। उन्होंने बताया कि एक जोड़ी वस्त्र बनाने में लगभग दस हजार लीटर पानी खर्च होता है। आधुनिक उपभोगवाद और पश्चिमी जीवनशैली के कारण पर्यावरणीय असंतुलन तेजी से बढ़ रहा है। प्रोफेसर कटेजा ने कहा कि यदि पृथ्वी को बचाना है तो भारतीय संस्कृति और उसकी जीवनशैली को अपनाना ही एकमात्र समाधान है।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. मीता गर्ग और डॉ. संबोध गोस्वामी ने किया, जबकि आयोजन सचिव डॉ. रमेश चंद मीणा ने आभार ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि संगोष्ठी का तकनीकी सत्र 8 नवम्बर को भी जारी रहेगा, जिसमें विभिन्न विषयों पर शोध पत्र प्रस्तुत किए जाएंगे और सार्थक निष्कर्षों की दिशा में चर्चा आगे बढ़ेगी।

इस दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी ने पर्यावरण, संस्कृति और विकास के त्रिकोणीय संबंधों को एक नई दृष्टि प्रदान की, जो विकसित भारत के निर्माण में भारतीय जीवन मूल्यों की प्रासंगिकता को और सशक्त करती है।

Pratahkal Bureau

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