ब्रिटेन के चर्चित व्हाइट हाउस फार्म हत्याकांड में जेरेमी बम्बर की सजा पर एक नई फॉरेंसिक जांच ने फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्ष 1985 में एक ही परिवार के पांच सदस्यों की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए बम्बर के खिलाफ इस्तेमाल की गई अहम तस्वीरों का नए सिरे से विश्लेषण किया गया है। इस जांच के निष्कर्षों से संकेत मिलता है कि उनकी बहन शीला कैफेल ने परिवार के सदस्यों की हत्या करने के बाद खुद को गोली मारी हो सकती है।

द जस्टिस गैप की 23 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, जेरेमी बम्बर ने पिछले साल के अंत में घटनास्थल की तस्वीरें द गार्जियन को सौंपी थीं। इसके बाद प्रमुख फॉरेंसिक जीवविज्ञानी सू कार्नी-गैनन ने इन तस्वीरों का विश्लेषण किया। रिपोर्ट के मुताबिक, इन तस्वीरों का पहले इस तरह से रक्त के धब्बों के वैज्ञानिक विश्लेषण के जरिए परीक्षण नहीं किया गया था।

कार्नी-गैनन ने रक्त के धब्बों के आकार, आकृति और घटनास्थल पर उनकी स्थिति का अध्ययन किया। इस पद्धति में जीवविज्ञान, रसायन विज्ञान, भौतिकी और गणित का इस्तेमाल करके यह समझने की कोशिश की जाती है कि घटनास्थल पर क्या हुआ था। नए विश्लेषण से संकेत मिलता है कि शीला कैफेल ने अपने दत्तक माता-पिता और अपने जुड़वां बेटों को गोली मारने के बाद खुद को गोली मारी हो सकती है।

मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया था कि शीला के घावों की प्रकृति और बंदूक में साइलेंसर के इस्तेमाल के कारण उनके लिए खुद को गोली मारना संभव नहीं था। नए रक्त-धब्बा विश्लेषण ने इस दावे को चुनौती दी है। इससे पहले की गई फॉरेंसिक जांच में भी यह संभावना सामने आई थी कि शीला ने पहले खुद को ऐसी गोली मारी हो जो जानलेवा नहीं थी और फिर दूसरी बार ट्रिगर दबाया। कार्नी-गैनन के निष्कर्ष द गार्जियन की ओर से फॉरेंसिक चिकित्सक प्रोफेसर जेसन पेन-जेम्स से कराई गई उस जांच के निष्कर्षों का भी समर्थन करते हैं, जिसमें यह पता लगाने की कोशिश की गई थी कि गोली चलाते समय बंदूक में साइलेंसर लगा था या नहीं।

अब 65 वर्ष के जेरेमी बम्बर को वर्ष 1986 में एसेक्स क्राउन कोर्ट ने दोषी ठहराया था। वह लगातार इन अपराधों को अंजाम देने से इनकार करते रहे हैं और अपनी सजा को चुनौती देते आए हैं।

मामले में शीला कैफेल की मानसिक स्वास्थ्य स्थिति और पुलिस जांच की प्रक्रिया भी विवादों में रही है। रिपोर्ट के अनुसार, हत्याओं के समय शीला स्किजोअफेक्टिव डिसऑर्डर के लिए दवा ले रही थीं और उन्होंने मतिभ्रम होने की जानकारी दी थी। पुलिस जांच के दौरान घटनास्थल को 32 दिनों तक सुरक्षित नहीं रखा गया। हत्याओं के तुरंत बाद के घंटों और दिनों में 40 से अधिक पुलिस अधिकारी घर में दाखिल हुए। इस दौरान कपड़े और बिस्तर नष्ट किए गए तथा शवों और हत्या में इस्तेमाल किए गए हथियार को भी स्थानांतरित किया गया।

मामले में साइलेंसर अहम साक्ष्य था। इसे घटना के तीन दिन बाद घर में दाखिल हुए रिश्तेदारों ने खोजा था। रिपोर्ट के अनुसार, इन रिश्तेदारों को बम्बर के दोषी ठहराए जाने की स्थिति में मृतकों की संपत्ति से विरासत मिलने का लाभ हो सकता था।

नए फॉरेंसिक निष्कर्ष अब क्रिमिनल केस रिव्यू कमीशन (CCRC) को सौंपे जाएंगे। ब्रिटेन में यही आयोग किसी मामले को दोबारा अपील अदालत के समक्ष भेजने का अधिकार रखता है। आयोग पहले भी इस मामले में संभावित न्यायिक चूक की जांच में चार साल लगा चुका है, लेकिन अंततः इसे अपील के लिए भेजने से इनकार कर दिया था।

जेरेमी बम्बर के वकील मार्क न्यूबी ने जांच पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “एक और स्वतंत्र रिपोर्ट ने इस दोषसिद्धि और उसकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। द गार्जियन का काम यह दिखाता है कि खोजी पत्रकारिता कितनी महत्वपूर्ण है।”

इस वर्ष बम्बर ने जेल से प्रेस और लगभग अन्य सभी लोगों से बातचीत करने पर लगाए गए प्रतिबंध के खिलाफ भी कानूनी चुनौती शुरू की। यह चुनौती वेकफील्ड जेल के गवर्नर और ब्रिटेन के न्याय मंत्रालय के खिलाफ है। रिपोर्ट के मुताबिक, ये प्रतिबंध द गार्जियन के साइमन हैटनस्टोन और द न्यू यॉर्कर के लिए लिखने वाली हेइडी ब्लेक की जांच के बाद लागू किए गए थे।

नए विश्लेषण ने 1985 के हत्याकांड में इस्तेमाल किए गए फॉरेंसिक साक्ष्यों और पुलिस जांच की विश्वसनीयता पर बहस को फिर तेज कर दिया है। अब इन निष्कर्षों पर क्रिमिनल केस रिव्यू कमीशन का रुख महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि मामले को अपील अदालत तक दोबारा पहुंचाने का अधिकार इसी आयोग के पास है।

Pratahkal Bureau

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