बिहार के वो 10 साल और आज की कड़वी हकीकत ; जानें क्या थी पुत्रपक्षपात की खूनी कीमत
बिहार में 2000-2010 के दशक में महिला भ्रूण हत्या और बाल लिंगानुपात में गिरावट ने सामाजिक संरचना को प्रभावित किया। बेटियों के जन्म पर प्रतिकूल असर, पुत्रपक्षपात और अवैध लिंग-निर्धारण क्लीनिकों ने समस्या को बढ़ाया। कानूनी प्रयासों के बावजूद सुधार सीमित रहा।

सांकेतिक तस्वीर
बीती एक दशक में बिहार में महिला भ्रूण हत्या और लिंगानुपात में असंतुलन ने राज्य की सामाजिक संरचना पर गंभीर प्रभाव डाला है। विशेषज्ञों के अनुसार, गर्भधारण के पहले और दौरान भ्रूण की लिंग पहचान की तकनीकों का गलत उपयोग महिला भ्रूण हत्या के प्रमुख कारणों में शामिल रहा। यह अवैध गतिविधि होने के बावजूद कई क्लीनिकों द्वारा संचालित होती रही, जिससे बेटियों के जन्म पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
राष्ट्रीय स्तर पर आंकड़े बताते हैं कि 1980 के दशक से अब तक कई मिलियन “लापता” महिला जन्म केवल लिंग-आधारित गर्भपात की वजह से हुए हैं। बिहार में भी यह प्रवृत्ति 2000 के दशक में जारी रही, जिससे राज्य के बाल लिंगानुपात में संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो गया।
कानूनी और प्रशासनिक पहल:
बिहार में महिला भ्रूण हत्या और भ्रूण लिंग पहचान के मामलों पर रोक लगाने के लिए कानून मौजूद था। प्री-कंसेप्शन और प्री-नैटल डायग्नोस्टिक टेक्नोलॉजीज (PC-PNDT) एक्ट, 1994 के तहत गर्भ में भ्रूण की लिंग पहचान और लिंग-आधारित गर्भपात पर प्रतिबंध लगाया गया। हालांकि, राज्य में 2000 के दशक में इस कानून का पालन पर्याप्त रूप से नहीं हो पाया और कई गैरकानूनी क्लीनिक सक्रिय रहे। प्रशासनिक निरीक्षण और निगरानी समितियों का गठन किया गया, लेकिन व्यापक स्तर पर उल्लंघन की घटनाएँ रिपोर्ट होती रही।
महिला शिशु हत्या और सामाजिक कारक:
इतिहास और स्थानीय अध्ययनों के अनुसार, बिहार में महिला शिशु हत्या की प्रथा कभी-कभी अब भी बनी हुई थी। बेटियों की मृत्यु दर या उनका लालन-पोषण में भेदभाव सीधे बाल लिंगानुपात पर असर डालता है। सामाजिक कारणों में गहरी पैठ वाले पुत्र पक्षपात, परिवारिक और आर्थिक दबाव जैसे दहेज की परंपरा शामिल हैं। बेटियों को आर्थिक बोझ माना जाना और पारंपरिक रीति-रिवाज भी भ्रूण हत्या और बाल मृत्यु दर में असंतुलन के पीछे प्रमुख कारण रहे।
2000 के दशक के अंत तक राज्य सरकार और प्रशासन ने अवैध क्लीनिकों पर सख्ती बढ़ाई और जागरूकता अभियानों की शुरुआत की। हालांकि व्यापक सुधार 2010 के बाद ही दिखाई देने लगे। नीति निर्माण और कानून प्रवर्तन की कमजोरियों के बावजूद, बिहार में महिला भ्रूण हत्या और लिंगभेदपूर्ण प्रथाओं के प्रभाव को दूर करना चुनौतीपूर्ण बना रहा।
समग्र रूप से देखा जाए, 2000-2010 के दशक में बिहार में महिला भ्रूण हत्या, महिला शिशु हत्या और सामाजिक-आर्थिक कारकों के कारण बेटियों के जन्म और संरक्षण पर गंभीर खतरा रहा। बाल लिंगानुपात में असंतुलन ने राज्य की सामाजिक संरचना पर दीर्घकालिक प्रभाव डाला और महिलाओं के अधिकार और सुरक्षा के महत्व को उजागर किया।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
