बिहार का वो सच जिसने खून से रंगे दाइयों के हाथ ; जानें 1966 की वो दास्तान जो आज भी रोंगटे खड़े कर देगी
ग्रामीण बिहार में 1996 में दाइयों द्वारा कैमरे पर महिला शिशु हत्या की स्वीकारोक्ति ने भारत में पितृसत्ता, गरीबी और दहेज की भयावह सच्चाई उजागर की।

क्या हुआ?- 1996 में बिहार से सामने आया मानवता को झकझोर देने वाला सच
1996 में ग्रामीण बिहार से सामने आई महिला शिशु हत्या की एक भयावह सच्चाई ने भारत ही नहीं, पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया। एक ब्रिटिश टेलीविजन डॉक्यूमेंट्री में गांवों की पारंपरिक दाइयों (midwives) ने कैमरे पर स्वीकार किया कि वे वर्षों से नवजात बच्चियों की हत्या करती आ रही थीं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह नहीं थी कि यह अपराध छिपकर किया जा रहा था, बल्कि यह कि दाइयों ने बिना झिझक और बिना अपराधबोध इसे एक सामाजिक मजबूरी के रूप में स्वीकार किया।
घटना की सूचना- कैसे सामने आया मामला?
यह मामला सामने आया ब्रिटेन के Channel 4 की डॉक्यूमेंट्री “Let Her Die” के माध्यम से, जिसे 1995–96 के बीच फिल्माया और प्रसारित किया गया। डॉक्यूमेंट्री निर्माता को बिहार के दूरदराज़ गांवों तक पहुंच मिली, जहां आज भी उस समय:
- संस्थागत डिलीवरी लगभग नहीं के बराबर थी
- अधिकतर प्रसव घरों में दाइयों द्वारा कराए जाते थे
- प्रशासनिक निगरानी बेहद कमजोर थी
⚠️Terrifying BBC documentary
— Suraj Kumar Bauddh (@SurajKrBauddh) January 16, 2026
"How many children have you k!lled so far?"😭
In 1996, a group of village midwives from India's Bihar confessed on camera how they were forced to k!ll newborn girls.
This happens where people claim to consider girls as goddesses. Horrifying. pic.twitter.com/WeCu8hV51j
कैमरे पर कबूलनामा- दाइयों की स्वीकारोक्ति:
डॉक्यूमेंट्री में पारंपरिक दाइयों ने खुलकर बताया कि:
- परिवारों द्वारा उन्हें बच्ची को जन्म के तुरंत बाद मारने का आदेश दिया जाता था
- हत्याएं पहले से तय होती थीं, कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं
- नकद या अनाज/कपड़ों के रूप में भुगतान किया जाता था
- कई मामलों में मां, सास-ससुर और अन्य परिजन भी जानते थे, लेकिन चुप रहते थे
दाइयों के अनुसार, यह काम अपराध नहीं बल्कि “सामाजिक ज़रूरत” माना जाता था
उनकी आवाज़ में न पछतावा था, न डर- बल्कि एक खौफनाक सामान्यता।
हत्या कैसे की जाती थी?- तरीके और सच्चाई:
डॉक्यूमेंट्री ने किसी भी तरह की सनसनी से बचते हुए, लेकिन बेहद स्पष्ट और तथ्यात्मक शब्दों में यह दर्ज किया कि नवजात बच्चियों की हत्या किस तरह की जाती थी। दाइयों के अनुसार, जन्म के तुरंत बाद ही बच्चियों को मार दिया जाता था ताकि किसी तरह का सवाल या रिकॉर्ड खड़ा न हो सके। इसके लिए सबसे आम तरीका दम घोंटना था, जिससे कुछ ही मिनटों में शिशु की जान चली जाती थी। कई मामलों में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध ज़हरीले पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता था, जबकि कुछ जगहों पर बच्चियों को जानबूझकर देखभाल से वंचित रखा जाता था- न दूध दिया जाता, न शरीर को गर्म रखा जाता- ताकि उनकी मौत स्वाभाविक प्रतीत हो।
अधिकांश मामलों में यह पूरी प्रक्रिया मिनटों या कुछ घंटों के भीतर पूरी कर दी जाती थी। चूंकि बच्ची का कोई आधिकारिक जन्म रिकॉर्ड नहीं बनता था, इसलिए प्रशासनिक स्तर पर उसके अस्तित्व का कोई सबूत ही नहीं रहता था। इसी कारण यह अपराध गांव की सीमाओं से बाहर कभी पहुंच ही नहीं पाता था, और बाहरी दुनिया पूरी तरह अनजान बनी रहती थी।
क्यों मारी जा रही थीं बच्चियां?- कारणों की जड़:
इन कबूलनामों ने समाज के उस क्रूर चेहरे को उजागर किया, जहां गरीबी, पितृसत्ता और सामाजिक भय मिलकर महिला शिशु हत्या को जन्म देते थे। सबसे बड़ा कारण दहेज प्रथा थी, जिसके चलते बेटी को जन्म से ही एक आर्थिक बोझ माना जाता था। अत्यधिक गरीबी वाले परिवारों के लिए एक अतिरिक्त बच्ची का मतलब था- भूख, कर्ज़ और असहायता का बढ़ता खतरा।
इसके साथ ही गहराई से जमी पितृसत्तात्मक सोच भी इस हिंसा को बढ़ावा देती थी, जहां वंश चलाने, अंतिम संस्कार करने और विरासत संभालने का अधिकार सिर्फ बेटे को दिया जाता था। समाज का दबाव इतना तीखा था कि कई बेटियों की मां को खुलेआम ताने दिए जाते, अपमानित किया जाता और दोषी ठहराया जाता।
दाइयों की भूमिका- अपराधी या मजबूर कड़ी?
डॉक्यूमेंट्री में सामने आई दाइयों की स्थिति खुद इस पूरे तंत्र की सबसे कमजोर और त्रासद कड़ी को दर्शाती है। ये महिलाएं अक्सर अशिक्षित, बेहद गरीब और पूरी तरह गांव पर निर्भर थीं। उनकी आजीविका उन्हीं परिवारों से जुड़ी थी जो उनसे यह अमानवीय काम करवाते थे। मना करने की स्थिति में उन्हें बहिष्कार, मारपीट या रोज़गार छिन जाने का डर रहता था।
एक दाई का यह कथन पूरे सामाजिक ढांचे की नृशंसता को उजागर करता है- “लड़की को मारना क्रूर नहीं, उसे भविष्य के दुख से बचाना है।” यह सोच बताती है कि कैसे व्यवस्था ने करुणा और अपराध के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया था, और हिंसा को ‘सामान्य’ बना दिया गया था।
दीर्घकालिक असर- कानून और चेतना:
इस मामले ने आगे चलकर:
- भारत के लिंगानुपात संकट पर बहस तेज की
- PCPNDT कानून जैसे कदमों की ज़मीन तैयार की
- “परंपरा” नहीं, बल्कि संरचनात्मक लैंगिक हिंसा की पहचान कराई
मुख्य बिंदु एक नज़र में:
- वर्ष: 1996
- स्थान: ग्रामीण बिहार
- खुलासा: Channel 4 डॉक्यूमेंट्री “Let Her Die”
- अपराध: नवजात बच्चियों की हत्या
क्यों आज भी ज़रूरी है यह केस?
1996 का बिहार केस इसलिए अहम है क्योंकि:
- अपराधियों ने खुद बोलकर सच उजागर किया
- यह दिखाता है कि कैसे व्यवस्था पीड़ितों को अपराधी बना देती है
- यह चेतावनी है कि चुप्पी भी हिंसा का औजार होती है
- माध्यम: दाइयों की कैमरे पर स्वीकारोक्ति
- कारण: दहेज, गरीबी, पितृसत्ता
- असर: अंतरराष्ट्रीय बहस, नीतिगत बदलाव

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
