Nasarpur Case Death Sentence : महाराष्ट्र के पुणे जिले के नसरपुर में चार साल की मासूम बच्ची के साथ हुई रूह कंपा देने वाली दरिंदगी और बर्बर हत्या के मामले में न्याय की सबसे बड़ी नजीर पेश की गई है। स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट ने इस जघन्यतम अपराध के ६५ वर्षीय दोषी भीमराव कांबले को फांसी के फंदे पर लटकाने का ऐतिहासिक आदेश जारी किया है। फैसला सुनाते हुए अदालत ने बेहद तल्ख टिप्पणी की और कहा कि इस घिनौनी वारदात के लिए उम्रकैद की सजा कतई काफी नहीं है, बल्कि इस हैवानियत के आगे मृत्युदंड की सजा भी छोटी प्रतीत होती है, मगर कानूनन अदालत के पास इससे बड़ी सजा देने का कोई विकल्प मौजूद नहीं है। सोमवार को जब कोर्ट रूम में यह अंतिम आदेश पढ़ा जा रहा था, तब न्याय की आस में बैठा पीड़ित परिवार अपने आंसुओं को रोक नहीं सका। न्यायपालिका के इतिहास में यह अब तक की सबसे त्वरित कानूनी कार्यवाहियों में से एक बन गई है, जहां घटना के महज दो महीने के भीतर न केवल आरोपी को दबोचा गया, बल्कि उसे सूली पर चढ़ाने का मुकम्मल फरमान भी सुना दिया गया।

यह खौफनाक वारदात इसी साल एक मई को पुणे जिले के भोर तालुका अंतर्गत नसरपुर इलाके में घटित हुई थी। मासूम बच्ची अपने घर के सामने खेल रही थी, तभी ६५ वर्षीय भीमराव कांबले की नजर उस पर पड़ी। आरोपी ने बच्ची को अगवा किया और पास ही स्थित एक गौशाला में ले गया, जहां उसने मासूमियत को तार-तार करते हुए उसके साथ दुष्कर्म किया। हैवानियत यहीं नहीं रुकी; अपनी इस घिनौनी करतूत को छिपाने के लिए कांबले ने पत्थर से बेरहमी से कुचलकर बच्ची की हत्या कर दी और उसके शव को गोबर के ढेर के नीचे छिपा दिया। दोपहर तक जब बच्ची का कोई सुराग नहीं मिला, तो परिजनों ने उसकी खोजबीन शुरू की, जिसके बाद गौशाला से उसका क्षत-विक्षत शव बरामद हुआ। इलाके में लगे सीसीटीवी फुटेज ने इस पूरे मामले की कड़ियां जोड़ीं, जिसमें आरोपी मासूम को ले जाता हुआ साफ दिखाई दे रहा था।

कानूनी मोर्चे पर इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट के जज एसआर सालुंके ने रिकॉर्ड समय में सुनवाई पूरी की। कोर्ट ने २५ जून को ही आरोपी को हत्या, दुष्कर्म और पॉक्सो (POCSO) अधिनियम की विभिन्न संगीन धाराओं के तहत सर्वसम्मति से दोषी करार दे दिया था। स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर एडवोकेट मिलिंद पवार ने अदालत के समक्ष इस बात का विशेष उल्लेख किया कि पूरी अदालती कार्यवाही और तफ्तीश के दौरान दोषी के चेहरे पर अपने किए का कोई पछतावा या शिकन तक नहीं थी। यहां तक कि जब २५ जून को जज ने उसे कटघरे में खड़ा कर अपनी गलती का अहसास करने को कहा, तो उसने बेहद संवेदनहीनता के साथ पूरी वारदात को दोहराते हुए कहा कि उसने कुछ भी गलत नहीं किया था।

दोषी के इसी क्रूर और अपरिवर्तनीय रवैये को देखते हुए पीड़ित पक्ष के वकीलों ने शुरुआत से ही मौत की सजा की मांग की थी, जिसे अदालत ने न्यायोचित ठहराया। अदालत ने अपने अंतिम आदेश में स्पष्ट किया कि कांबले का यह कृत्य समाज के माथे पर कलंक है और वह सिर्फ और सिर्फ फांसी का हकदार है। यह फैसला भारतीय न्यायिक प्रणाली की मुस्तैदी और संवेदनशीलता का एक बहुत बड़ा उदाहरण है, जो यह संदेश देता है कि मासूमों के खिलाफ होने वाले अपराधों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा। इस त्वरित न्याय ने न केवल पीड़ित परिवार के घावों पर कुछ हद तक मरहम लगाने का काम किया है, बल्कि समाज में कानून के प्रति विश्वास को और अधिक सुदृढ़ किया है।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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