बेंगलुरु:

कर्नाटक की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में अपनी अलग पहचान रखने वाली वरिष्ठ आईएएस (IAS) अधिकारी रोहिणी सिंधुरी एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह रोहिणी सिंधुरी के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार के मामले में प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने और जांच शुरू करने की मंजूरी दे। यह मामला साल 2021 का है, जब वह मैसूर की जिला उपायुक्त (DC) के रूप में तैनात थीं।

क्या है पूरा विवाद? (₹13 का सामान ₹52 में खरीद)

यह मामला मैसूर जिले में पर्यावरण के अनुकूल 'इको-फ्रेंडली' कपड़ों के थैलों की खरीद से जुड़ा है। मार्च 2021 में, रोहिणी सिंधुरी की अध्यक्षता में एक बैठक हुई थी जिसमें मैसूर को प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए कपड़े के थैलों के इस्तेमाल का निर्णय लिया गया। इसके लिए कर्नाटक हथकरघा विकास निगम (KHDC) को 14.71 लाख बैग सप्लाई करने का वर्क ऑर्डर दिया गया।

शिकायतकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता रविचंद्र गौड़ा एन.आर. का आरोप है कि जो थैले थोक बाजार में मात्र ₹13 प्रति बैग की कीमत पर उपलब्ध थे, उन्हें सरकार ने ₹52 प्रति बैग की अत्यधिक दर पर खरीदा। इस सौदे की कुल लागत ₹7.65 करोड़ थी। याचिकाकर्ता का दावा है कि इस खरीद प्रक्रिया में धांधली हुई, जिससे सरकारी खजाने को लगभग ₹5.88 करोड़ का नुकसान हुआ। साथ ही, यह भी आरोप लगाया गया कि ग्राम पंचायतों की विकास योजनाओं के लिए रखे गए फंड को इन थैलों की खरीद में डायवर्ट कर दिया गया।

अदालत ने सरकार के बचाव को किया खारिज

इस मामले में राज्य सरकार ने दो बार जांच की अनुमति देने से इनकार किया था। 26 मई, 2025 को सरकार ने यह कहते हुए जांच की मांग ठुकरा दी थी कि एक विभागीय जांच (Departmental Inquiry) में रोहिणी सिंधुरी को पहले ही क्लीन चिट मिल चुकी है।

हालांकि, न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्न ने सरकार के इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा:

  • "विभागीय कार्यवाही में दोषमुक्त होना किसी अधिकारी के लिए आपराधिक जांच से बचने का सुरक्षा कवच (Protective Shield) नहीं बन सकता। कानून के तहत आपराधिक जांच की अपनी प्रक्रिया होती है।"
  • अदालत ने पाया कि शिकायत न तो अस्पष्ट थी और न ही काल्पनिक। शिकायतकर्ता ने स्पष्ट दस्तावेजों के साथ यह दिखाया था कि प्रथम दृष्टया पद का दुरुपयोग हुआ है और राज्य को वित्तीय हानि हुई है।

न्याय में देरी पर कोर्ट की टिप्पणी

हाई कोर्ट ने सरकार के रवैये पर भी कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि वह आम तौर पर मामला सरकार को दोबारा विचार के लिए भेजती, लेकिन सरकार ने पहले मिले मौके का सही इस्तेमाल नहीं किया और बिना किसी ठोस आधार के जांच की अनुमति देने से मना कर दिया। अदालत ने सरकार के फैसले को "सतही और तर्कहीन" बताया। न्यायमूर्ति ने कहा कि मामले की गंभीरता को देखते हुए अब एक निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है और इसे और अधिक लटकाना न्याय के हित में नहीं होगा।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A

यह पूरा मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धारा 17A के इर्द-गिर्द घूम रहा है। इस धारा के अनुसार, किसी भी सरकारी अधिकारी के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी (सरकार) की पूर्व अनुमति अनिवार्य होती है। हाई कोर्ट ने अब सरकार को आदेश दिया है कि वह अनिवार्य रूप से यह अनुमति प्रदान करे ताकि लोकायुक्त पुलिस FIR दर्ज कर सके।

मामले के मुख्य तथ्य (Quick Facts):

  • अधिकारी: रोहिणी सिंधुरी (IAS 2009 बैच)।
  • आरोप: मैसूर DC रहते हुए ₹5.88 करोड़ के सरकारी धन का कथित नुकसान।
  • समय: मार्च 2021 (प्लास्टिक बैन अभियान के दौरान)।
  • अदालत का आदेश: सरकार को जांच की मंजूरी देने का निर्देश।
  • अगला कदम: लोकायुक्त पुलिस द्वारा FIR दर्ज कर मामले की गहराई से जांच की जाएगी।

यह फैसला प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। रोहिणी सिंधुरी कर्नाटक की एक प्रभावशाली अधिकारी रही हैं, लेकिन इस अदालती आदेश ने यह साफ कर दिया है कि जब बात सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की आती है, तो प्रक्रिया का पालन होना अनिवार्य है। अब सबकी नजरें लोकायुक्त की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं, जो इस 'बैग घोटाले' की परतों को खोलेगी।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

Next Story