35 साल बाद खुला राज! 1991 के मर्डर केस का आरोपी आखिर कैसे आया दिल्ली पुलिस के हत्थे?
दिल्ली पुलिस ने 1991 में मकान मालकिन की हत्या कर फरार हुए आरोपी छवि लाल वर्मा को दबोचा, पुलिस से बचने के लिए दशकों से पहचान बदलकर रह रहा था अपराधी।

दिल्ली पुलिस के जवानों द्वारा एक संदिग्ध अपराधी को हिरासत में लेकर ले जाने का चित्रण, जो 1991 के पुराने मामले को सुलझाने के संदर्भ में है।
कानून के हाथ लंबे होते हैं और वे अपराधी को पाताल से भी ढूंढ निकालते हैं, यह कहावत दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने चरितार्थ कर दिखाई है। देश की राजधानी में करीब साढ़े तीन दशक पहले हुए एक जघन्य हत्याकांड की गुत्थी को सुलझाते हुए पुलिस ने एक ऐसे भगोड़े को दबोचा है, जो पिछले 35 वर्षों से अपनी पहचान बदलकर पुलिस की आंखों में धूल झोंक रहा था। वर्ष 1991 के उस काले दिन ने एक परिवार को कभी न भरने वाले जख्म दिए थे, लेकिन साढ़े तीन दशक बाद हुई इस गिरफ्तारी ने पीड़ित परिवार को न्याय की एक नई उम्मीद दी है। यह मामला न केवल पुलिस की अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है, बल्कि अपराधियों के लिए एक कड़ा संदेश भी है कि समय कितना भी बीत जाए, जुर्म का हिसाब जरूर होता है।
इस पूरे घटनाक्रम की जड़ें साल 1991 में दर्ज एक सनसनीखेज वारदात से जुड़ी हैं। दिल्ली के एक रिहायशी इलाके में लूट के इरादे से घुसे अपराधियों ने न केवल घर की मालकिन की बर्बरता से हत्या कर दी थी, बल्कि विरोध करने पर उनके मासूम बेटे को भी गंभीर रूप से घायल कर दिया था। वारदात के बाद आरोपी मौके से फरार हो गए और अपनी पहचान छुपाने के लिए अलग-अलग राज्यों में शरण लेते रहे। इस मामले के मुख्य आरोपियों में से एक, छवि लाल वर्मा, तभी से दिल्ली पुलिस की "मोस्ट वांटेड" सूची में शामिल था। दशकों तक चली जांच के दौरान कई बार पुलिस के हाथ खाली रहे, लेकिन जांच टीम ने कभी इस फाइल को बंद नहीं होने दिया।
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल और स्थानीय इंटेलिजेंस ने इस मामले में तकनीकी और मानवीय मुखबिरों का एक जाल बिछाया था। हाल ही में पुलिस को गुप्त सूचना मिली कि 1991 के हत्या मामले का वांछित अपराधी अपनी पहचान बदलकर उत्तर प्रदेश के एक सुदूर इलाके में रह रहा है। सूचना मिलते ही पुलिस की एक विशेष टीम गठित की गई। जांच के दौरान पता चला कि आरोपी छवि लाल वर्मा इतना शातिर था कि उसने पुलिस की पकड़ से बचने के लिए पिछले 35 वर्षों से अपने पैतृक गांव तक कदम नहीं रखा था। उसने अपना हुलिया, नाम और यहाँ तक कि अपने रहने का सलीका भी पूरी तरह बदल लिया था ताकि कोई उसे पहचान न सके।
पुलिस की छापेमारी के दौरान जब छवि लाल वर्मा को हिरासत में लिया गया, तो शुरुआती पूछताछ में उसने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की। हालांकि, जब पुलिस ने उसके पुराने रिकॉर्ड और शिनाख्त की कड़ियों को उसके सामने रखा, तो उसने अपना जुर्म कबूल कर लिया। उसने बताया कि कैसे 1991 में उसने लूट की योजना बनाई थी और विरोध करने पर मकान मालकिन की जान ले ली थी। इतने वर्षों तक वह दिल्ली से दूर गुमनामी की जिंदगी जी रहा था और उसे लगा था कि समय के साथ उसका अपराध भी फाइलों में दब गया होगा। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, आरोपी पर हत्या और जानलेवा हमले की गंभीर धाराएं लागू हैं, जिसके तहत अब कानूनी प्रक्रिया को तेज कर दिया गया है।
इस गिरफ्तारी के बाद न्यायिक प्रक्रिया के तहत आरोपी को अदालत में पेश किया गया, जहाँ से उसे रिमांड पर भेज दिया गया है। दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस ऑपरेशन को एक बड़ी रणनीतिक जीत बताया है। 1991 से अब तक पुलिस की कई पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन न्याय की तलाश खत्म नहीं हुई। पुलिस अब इस मामले से जुड़े अन्य संभावित साक्ष्यों और उन लोगों की भी जांच कर रही है जिन्होंने इतने वर्षों तक अपराधी को पनाह दी या उसकी पहचान छुपाने में मदद की।
यह गिरफ्तारी भारतीय न्याय प्रणाली और जांच एजेंसियों की कार्यक्षमता पर जनता के विश्वास को और मजबूत करती है। 35 साल बाद न्याय की यह दस्तक उन अपराधियों के लिए चेतावनी है जो सोचते हैं कि कानून से बच निकलना आसान है। दिल्ली पुलिस का यह सफल ऑपरेशन न केवल एक मर्डर मिस्ट्री का अंत है, बल्कि यह उस पीड़ित बेटे के लिए भी एक सांत्वना है जिसने दशकों पहले अपनी माँ को खो दिया था। कानून अपनी गति से चलता रहा और अंततः न्याय की जीत हुई।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
