जेल की सलाखों के पीछे छिपा था खौफनाक राज, जानिए कैसे पूर्व डीजीपी अभयानंद ने दिमाग की एक चाल से सुलझाया सात मौतों का रहस्य!
1980 के दशक में औरंगाबाद के एसपी रहते हुए आईपीएस अधिकारी अभयानंद ने जेल के कैदियों के खुफिया नेटवर्क का इस्तेमाल कर सुलझाई थी 7 डकैतों की मौत की गुत्थी।

पूर्व डीजीपी अभयानंद (बाएं), जिन्होंने औरंगाबाद के एसपी रहते हुए बगीचे में मिले 7 लावारिस शवों का 'ब्लाइंड केस' सुलझाया था।
पटना: आपराधिक मामलों के अनुसंधान में सूक्ष्म दृष्टि और रणनीतिक सूझबूझ की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। विकसित देशों जैसे अमेरिका में पुलिस व्यवस्था के भीतर डिटेक्टिव का एक विशिष्ट पद होता है, जो गहन जांच कार्य में महारत हासिल करने के बाद मिलता है। इन जासूसों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे किसी भी ऐसे पेचीदा मामले की गुत्थी सुलझाएं जहां न तो कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह मौजूद हो और न ही प्रारंभिक तौर पर कोई ठोस सुराग उपलब्ध हो। भारतीय पुलिस सेवा में आधिकारिक तौर पर डिटेक्टिव जैसा कोई पृथक पद नहीं है, लेकिन देश के कई पुलिस अधिकारियों ने अपनी तीव्र बुद्धिमानी और लीक से हटकर सोचने की क्षमता के बल पर बेहद जटिल मामलों को सुलझाया है। बिहार के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) अभयानंद की गिनती भी ऐसे ही अधिकारियों में होती है, जिन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान एक अत्यंत संवेदनशील और रहस्यमयी मामले का पर्दाफाश किया था।
यह घटना वर्ष 1980 के दशक की शुरुआत की है, जब अभयानंद औरंगाबाद जिले के पुलिस अधीक्षक (एसपी) के रूप में कार्यरत थे। एक दिन जिला पुलिस मुख्यालय को सूचना मिली कि क्षेत्र के एक सुदूर गांव में स्थित आम के बगीचे में सात अज्ञात शव लावारिस हालत में पड़े हुए हैं। एक साथ इतनी बड़ी संख्या में शवों के मिलने की खबर से संपूर्ण प्रशासनिक अमले और स्थानीय इलाके में तीव्र सनसनी फैल गई। घटना की गंभीरता को देखते हुए तुरंत आसपास के कई थानों की पुलिस टीम को मौके पर रवाना किया गया। स्थानीय स्थिति को समझने और मृतकों की पहचान स्थापित करने के लिए क्षेत्र के कई थानों के चौकीदारों को भी घटना स्थल पर बुलाया गया।
घटना स्थल की भौगोलिक स्थिति जांच में एक बड़ी बाधा बनकर उभरी। वह आम का बगीचा ग्रामीण आबादी क्षेत्र से काफी दूरी पर स्थित था। बगीचा अत्यधिक घना होने के कारण वहां दिन के समय भी सूर्य का प्रकाश बहुत कम पहुंच पाता था। पुलिस टीम ने हर संभव प्रयास किए, लेकिन मौके से न तो कोई चश्मदीद गवाह मिला और न ही कोई ऐसा साक्ष्य मिला जिससे मृतकों की शिनाख्त हो सके। स्थानीय गुप्तचरों और मुखबिरों के नेटवर्क से भी पुलिस को कोई प्रारंभिक जानकारी हासिल नहीं हो पा रही थी। लगातार मिल रही विफलता के बाद पुलिस महानिरीक्षक और एसपी को लगने लगा था कि शायद यह मामला हमेशा के लिए अनसुलझा रह जाएगा। कानूनी और चिकित्सकीय प्रक्रियाओं के कारण शवों को अधिक समय तक बिना पहचान के रखना भी संभव नहीं था।
इस गतिरोध को तोड़ने के लिए पुलिस अधीक्षक अभयानंद ने एक अभूतपूर्व प्रशासनिक निर्णय लिया। उन्होंने सभी सात शवों को सुरक्षित रखने के लिए मुख्यालय से विशेष बक्से मंगवाए। शवों को जब औरंगाबाद जिला मुख्यालय लाया जा रहा था, तब उनके मन में एक रणनीतिक विचार आया। उन्होंने काफिले को सीधे औरंगाबाद मंडल कारागार (जेल) की ओर मोड़ने का निर्देश दिया। उनके इस निर्णय के पीछे यह तार्किक सोच थी कि जेल के भीतर बंद विभिन्न अपराधियों और कैदियों के पास अक्सर स्थानीय अपराध जगत से जुड़ी ऐसी गोपनीय सूचनाएं होती हैं, जो आम पुलिस तंत्र तक काफी देर से पहुंचती हैं। अपराधियों का अपना एक आंतरिक सूचना नेटवर्क होता है जो जेल के भीतर भी सक्रिय रहता है।
एसपी अभयानंद ने औरंगाबाद जेल पहुंचकर तत्कालीन जेलर से संपर्क किया और कानूनी मर्यादाओं के तहत इन सात शवों को शिनाख्त के लिए जेल परिसर के भीतर रखने की विशेष अनुमति मांगी। जेल प्रशासन की सहमति के बाद सभी सात बक्सों को कैदियों के सामने प्रदर्शित किया गया। हालांकि, पहली बार में यह दांव पूरी तरह निष्फल प्रतीत हुआ। सभी कैदी एक-एक करके बक्सों के पास से गुजरे, लेकिन किसी ने भी शवों को पहचानने की बात स्वीकार नहीं की। संभावित कानूनी पचड़ों में फंसने के डर या पुलिस के प्रति अविश्वास के कारण कैदियों ने पूरी तरह चुप्पी साधे रखी। इसके बाद शवों का नियमानुसार अंतिम संस्कार कर दिया गया।
प्रारंभिक असफलता के बावजूद जिला पुलिस प्रमुख ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने तुरंत अपनी रणनीति बदलते हुए जेल के भीतर अपने विशेष भेदियों और आंतरिक मुखबिरों को सक्रिय किया। इन भेदियों को निर्देश दिया गया कि वे जेल के विभिन्न वार्डों में कैदियों के बीच होने वाली अनौपचारिक बातचीत और कानाफूसी पर पैनी नजर रखें। यह पैंतरा पूरी तरह सफल साबित हुआ। जेल की बैरकों में सुरक्षित महसूस कर रहे कैदियों ने आपस में इस घटना पर चर्चा शुरू कर दी थी, जिसे पुलिस के भेदियों ने दर्ज कर लिया।
आंतरिक जांच से यह स्पष्ट हो गया कि वे सातों शव औरंगाबाद के पड़ोसी जिले रोहतास के निवासी अपराधियों के थे। वे सभी एक अंतर-जिला डकैत गिरोह के सक्रिय सदस्य थे। घटना के दिन वे सभी उस घने बगीचे में किसी बड़ी डकैती से लूटे गए माल का आपस में बंटवारा कर रहे थे। इसी दौरान संपत्ति के हिस्सेदारी को लेकर उनके बीच हिंसक विवाद उत्पन्न हो गया और उन्होंने हथियारों से एक-दूसरे पर हमला कर दिया, जिससे सातों की मौत हो गई। इस ठोस सुराग के आधार पर पुलिस ने रोहतास और आसपास के जिलों में स्थित अपराधियों के ठिकानों पर सघन छापेमारी की। इस कार्रवाई के परिणामस्वरूप पूर्व में हुई कई बड़ी डकैतियों का भारी मात्रा में लूटा गया माल और अवैध हथियार बरामद किए गए। इस प्रकार एक प्रशासनिक सूझबूझ और जेल नेटवर्क के कुशल उपयोग से इस बेहद जटिल और अंधेरे मामले का पूर्ण पटाक्षेप हुआ।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
