हिंदू छात्रा पर दबाव का आरोप ; इलाहाबाद HC का मुरादाबाद धर्मांतरण मामले में बड़ा फैसला
मुरादाबाद धर्मांतरण मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने छात्राओं के खिलाफ FIR रद्द करने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया साक्ष्य मौजूद हैं और मामले की विस्तृत जांच जरूरी है। पीड़िता ने बुर्का पहनाने, मांस खाने के लिए दबाव और इस्लाम अपनाने के आरोप लगाए हैं।

मुरादाबाद धर्मांतरण मामले की कानूनी कार्यवाही को दर्शाता एक प्रतीकात्मक चित्रण।
मुरादाबाद के चर्चित धर्मांतरण मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और कड़ा रुख अपनाते हुए आरोपित छात्राओं के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले में प्रथम दृष्टया पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं और विस्तृत जांच के बिना इसे खारिज करना न्यायोचित नहीं होगा। इस टिप्पणी के साथ अदालत ने यह भी कहा कि युवाओं द्वारा किसी पर अपनी धार्मिक मान्यताओं को थोपने की प्रवृत्ति एक “चिंताजनक ट्रेंड” के रूप में उभर रही है।
यह मामला मुरादाबाद के एक ट्यूशन सेंटर से जुड़ा है, जहां कक्षा 12 की एक हिंदू छात्रा ने आरोप लगाया कि उसकी पांच मुस्लिम सहपाठियों ने उस पर लगातार दबाव बनाया। पीड़िता के अनुसार, उसे जबरन बुर्का पहनाया गया, उसकी इच्छा के विरुद्ध मांसाहार करने के लिए उकसाया गया, इस्लामी धार्मिक ग्रंथ पढ़ने के लिए कहा गया और अंततः इस्लाम स्वीकार करने के लिए मानसिक दबाव डाला गया।
दिसंबर 2025 में दर्ज अपने बयान में पीड़िता ने एक विशेष घटना का जिक्र किया, जिसमें आरोपित छात्राएं एक बुर्का लेकर आईं और उसे जबरन पहनाया। उसने यह भी बताया कि सहपाठी नियमित रूप से मांसाहारी भोजन लाती थीं और उसे मांस न खाने की स्थिति में केवल ग्रेवी खाने के लिए लुभाती थीं। एक आरोपी पर यह भी आरोप है कि उसने पीड़िता को इस हद तक प्रभावित किया कि उसकी स्वतंत्र सोचने की क्षमता प्रभावित हो गई। साथ ही, छात्राओं द्वारा बार-बार यह कहा जाता था कि उनका धर्म श्रेष्ठ है, कुरान को चालीस दिनों में पढ़ा जा सकता है और बुर्का पहनने से कहीं भी जाने की स्वतंत्रता मिलती है।
इस मामले में एफआईआर पीड़िता के भाई द्वारा दर्ज कराई गई थी, जिसमें दो आरोपित अलीना और शाबिया वयस्क बताई गई हैं, जबकि अन्य छात्राएं नाबालिग हैं। पीड़िता के बयान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 180 और 183 के तहत दर्ज किए गए।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की पीठ ने अपने 11 पृष्ठों के आदेश में कहा कि सीसीटीवी फुटेज सहित उपलब्ध साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि छात्रा को बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया गया था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह कृत्य “जबरदस्ती” या “प्रलोभन” की श्रेणी में आता है या नहीं, इसका अंतिम निर्धारण विस्तृत जांच के बाद ही संभव है, इसलिए इस प्रारंभिक चरण में एफआईआर को रद्द करना उचित नहीं होगा।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी टिप्पणी की कि यदि कम उम्र के युवाओं में इस प्रकार की प्रवृत्ति विकसित हो रही है, तो यह और भी अधिक चिंताजनक है। यह वह समय होता है जब उन्हें अपनी शिक्षा, कौशल विकास और समाज व राष्ट्र की सेवा की दिशा में ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
यह मामला उसी व्यापक घटना से जुड़ा है, जिसमें पांच नाबालिग छात्राओं पर अपनी सहपाठी पर धार्मिक दबाव बनाने के आरोप में मामला दर्ज किया गया था। हालांकि, हाल के समय में अदालत ने कुछ मामलों में धर्मांतरण कानून के दुरुपयोग की आशंकाओं को भी रेखांकित किया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह मुद्दा कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर जटिल बना हुआ है।
इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल कानून और न्याय व्यवस्था की भूमिका को रेखांकित किया है, बल्कि समाज में बढ़ती संवेदनशीलता और धार्मिक स्वतंत्रता के प्रश्नों को भी केंद्र में ला खड़ा किया है। अब इस मामले की दिशा आगामी जांच और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगी, जो यह तय करेगी कि आरोप कितने प्रमाणित होते हैं और कानून किस प्रकार अपना अंतिम निष्कर्ष प्रस्तुत करता है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
