Umaji Naik freedom manifesto 1831 : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 1857 के विद्रोह को अक्सर पहली चिंगारी माना जाता है, लेकिन उससे दशकों पहले महाराष्ट्र की सह्याद्रि पहाड़ियों में एक ऐसा नायक उभरा था, जिसने अकेले दम पर ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी थी। 'राजे' उमाजी नाईक—एक ऐसा नाम जिससे तत्कालीन बॉम्बे प्रेसीडेंसी के अंग्रेज अफसर थर-थर कांपते थे। आज उनकी पुण्यतिथि पर, आइए जानते हैं उस क्रांतिकारी की गाथा जिसने भारत का पहला 'स्वतंत्रता घोषणापत्र' जारी किया था।

विरासत में मिली देशभक्ति और संघर्ष की शुरुआत :

७ सितंबर १७९१ को पुणे के पुरंदर किले की तलहटी में बसे भिवड़ी गांव में जन्मे उमाजी नाईक को युद्ध कौशल विरासत में मिला था। उनके पिता दादजी खोमणे पुरंदर किले के रखवालदार थे। बचपन से ही तीर-कमान, भाला, तलवारबाजी और दांडपट्टा चलाने में माहिर उमाजी ने महज़ ११ साल की उम्र में पिता के निधन के बाद वतनदारी की जिम्मेदारी संभाली।

संघर्ष की शुरुआत १८०३ में हुई, जब दूसरे बाजीराव पेशवा ने अंग्रेजों की शह पर रामोशी समुदाय से पुरंदर किले का नियंत्रण छीनने की कोशिश की। इसके विरोध में जब रामोशियों ने आवाज उठाई, तो पेशवा ने उनकी जमीनें और अधिकार जब्त कर लिए। यहीं से उमाजी के भीतर अन्याय के खिलाफ विद्रोह का बीज अंकुरित हुआ।

ब्रिटिश हुकूमत को खुली चुनौती :

उमाजी नाईक केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि एक कुशल संगठनकर्ता भी थे। उन्होंने साहूकारों और अत्याचारी जमींदारों को निशाना बनाना शुरू किया और लूटा हुआ धन गरीबों में बांट दिया। १८२४-२५ में जब उन्होंने अपने भाई अमृता के साथ मिलकर अंग्रेजों का 'भांबुर्दा खजाना' लूटा, तब ब्रिटिश प्रशासन की नींद उड़ गई।

अंग्रेजों द्वारा जारी किए गए इनामों का सिलसिला :

  • १८२६: उमाजी को पकड़ने के लिए १०० रुपये का पहला इनाम।
  • १८२७: इनाम राशि बढ़ाकर १२०० रुपये की गई और सख्त नाकाबंदी की गई।
  • दिसंबर १८२७: पुणे के कलेक्टर रॉबर्टसन ने ५००० रुपये का भारी-भरकम इनाम घोषित किया।

'आजादी का घोषणापत्र' और व्यापक विद्रोह :

उमाजी नाईक ने न केवल अंग्रेजों के इनामों का जवाब दिया, बल्कि १६ फरवरी १८३१ को एक ऐतिहासिक घोषणापत्र जारी किया, जिसे 'स्वतंत्रता का घोषणापत्र' कहा जाता है। इस दस्तावेज में उन्होंने आह्वान किया:

  • हिंदुस्तान के सभी राजा, सरदार और आम जनता अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट हों।
  • यूरोपीय अधिकारियों को देखते ही खत्म कर दिया जाए।
  • सरकारी खजाने और राजस्व (महसूल) पर रोक लगाई जाए।
  • ब्रिटिश सेना में कार्यरत भारतीय सैनिक अंग्रेजों का हुक्म मानना बंद करें।

यह केवल एक विद्रोह नहीं था, बल्कि एक 'संयुक्त भारत' की परिकल्पना थी, जिसमें हिंदू और मुसलमान दोनों को शामिल होने का न्योता दिया गया था।

अंतिम संघर्ष और शहादत :

उमाजी की बढ़ती लोकप्रियता और सैन्य शक्ति को देख अंग्रेजों ने छल का सहारा लिया। १५ दिसंबर १८३१ को उनके ही दो साथियों—कालू और नाना—ने लालच में आकर उमाजी को धोखे से पकड़वा दिया। ब्रिटिश अदालत में उन पर राजद्रोह का मुकदमा चला और अंततः ३ फरवरी १८३२ को पुणे में इस महान क्रांतिकारी को फांसी दे दी गई।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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