सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु थी एक सोची समझी साजिश? ख़ुफ़िया दस्तावेजों का हुआ सनसनीखेज खुलासा
इतिहास का बड़ा खुलासा! ब्रिटिश खुफिया दस्तावेजों से पता चला है कि 1941 में अंग्रेजों ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हत्या के आदेश दिए थे। काबुल से जर्मनी यात्रा के दौरान तुर्की में तैनात जासूसों को उन्हें खत्म करने का मिशन मिला था। जानें इतिहासकार यूनन ओ हैल्पिन ने इन गुप्त फाइलों के आधार पर नेताजी के खिलाफ रची गई इस सनसनीखेज साजिश के बारे में क्या बड़े दावे किए हैं।

Netaji Subhash Chandra Bose assassination plot : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रखर नायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लेकर एक ऐसा खुलासा हुआ है जिसने ऐतिहासिक गलियारों में हलचल मचा दी है। हाल ही में सामने आए गोपनीय दस्तावेजों और शोध से यह स्पष्ट हुआ है कि साल 1941 में ब्रिटिश खुफिया एजेंसी ने नेताजी को खत्म करने का औपचारिक आदेश जारी किया था। जब नेताजी ने 'दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है' की नीति अपनाते हुए जर्मनी और जापान से हाथ मिलाया, तब ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें अपने अस्तित्व के लिए सबसे गंभीर खतरा मानते हुए उनके कत्ल की साजिश रची थी।
ब्रिटिश जासूसों को मिला 'किल ऑर्डर' :
आयरिश इतिहासकार और ब्रिटिश खुफिया सेवाओं के विशेषज्ञ यूनन ओ हैल्पिन ने कोलकाता में दिए एक भाषण के दौरान इन गुप्त दस्तावेजों के हवाले से इस साजिश की परतें खोली हैं। हैल्पिन के अनुसार, जब जनवरी 1941 में नेताजी कलकत्ता से अचानक लापता हुए, तो ब्रिटिश एजेंट हफ्तों तक इस बात को लेकर परेशान रहे कि वे आखिर गए कहाँ।
साजिश का घटनाक्रम :
लोकेशन ट्रैक: शुरुआत में खुफिया तंत्र उन्हें सुदूर पूर्व में खोज रहा था, लेकिन एक इतालवी (Italian) संदेश के पकड़े जाने से पता चला कि नेताजी काबुल में हैं और मध्य पूर्व (Middle East) के रास्ते जर्मनी जाने की योजना बना रहे हैं।
तुर्की में जाल: लंदन स्थित मुख्यालय से तुर्की में तैनात दो जासूसों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि वे नेताजी के जर्मनी पहुँचने से पहले ही उनका रास्ता रोककर उन्हें खत्म कर दें।
विफलता की वजह: ब्रिटिश एजेंटों की यह साजिश इसलिए विफल रही क्योंकि नेताजी ने अनुमानित रास्ता बदल दिया था। वे मध्य एशिया और रूस के गुप्त रास्तों का इस्तेमाल करते हुए सुरक्षित बर्लिन पहुँच गए, जिससे ब्रिटिश जासूस हाथ मलते रह गए।
इतिहासकारों की नजर में ब्रिटिश डर :
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और नेताजी के पड़पोते सुगत बोस का मानना है कि अंग्रेजों के पास ऐसा घातक कदम उठाने का ठोस कारण था। उन्होंने बताया कि नेताजी जिस तरह से भारतीय सैनिकों की वफादारी को ब्रिटिश क्राउन के खिलाफ मोड़कर देशहित में प्रेरित कर रहे थे, उससे ब्रिटिश सेना की नींव हिल गई थी।
कोलकाता की इतिहासकार लिपि घोष के अनुसार, ये दस्तावेज साबित करते हैं कि ब्रिटिश हुकूमत ने बोस से मिलने वाली चुनौती का बिल्कुल सही आकलन किया था। वे जानते थे कि अगर बोस अंतरराष्ट्रीय मदद पाने में सफल रहे, तो भारत पर अंग्रेजों का कब्जा ज्यादा दिन टिक नहीं पाएगा।
एक योद्धा जो मौत को मात दे गया :
ब्रिटिश हुकूमत द्वारा रची गई यह हत्या की साजिश न केवल विफल रही, बल्कि इसने नेताजी के संकल्प को और मजबूत कर दिया। हत्या की कोशिशों को नाकाम करते हुए उन्होंने न केवल जर्मनी का सफल सफर किया, बल्कि आगे चलकर 'आजाद हिंद फौज' का गठन कर पूर्वोत्तर भारत के मोर्चे पर ब्रिटिश साम्राज्य को सीधी सैन्य चुनौती दी। हालांकि 1945 में ताइवान विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु पर आज भी विवाद जारी है, लेकिन 1941 के ये दस्तावेजी साक्ष्य यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि ब्रिटिश साम्राज्य एक निहत्थे क्रांतिकारी के विचारों और साहस से किस कदर भयभीत था।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
