नागपुर में वसंत पंचमी: श्रद्धा और आध्यात्मिकता के रंग में रंगा दयालबाग का पावन उत्सव
नागपुर में राधास्वामी सत्संग दयालबाग द्वारा वसंत पंचमी का पर्व अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। परमपूज्य गुरु महाराज प्रो. प्रेम सरन सत्संगी साहब की उपस्थिति में आयोजित इस कार्यक्रम में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और 'राधास्वामी' के जयघोषों ने आध्यात्मिक चेतना का संचार किया। निष्काम सेवा और भक्ति के इस महापर्व की विस्तृत रिपोर्ट यहाँ पढ़ें।

नागपुर। "ऋतु बसन्त आये सतगुरु जग में, चलो चरनन पर सीस धरो री" — इन पावन पंक्तियों की गूंज और भक्तिमय वातावरण के बीच नागपुर सहित देशभर में राधास्वामी मत का स्थापना दिवस और वसंत पंचमी का पर्व अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। बसंत की इस पावन ऋतु को न केवल प्रकृति के नव-श्रृंगार का प्रतीक माना जाता है, बल्कि राधास्वामी सत्संग दयालबाग के अनुयायियों के लिए यह दिन आध्यात्मिक चेतना के अवतरण का महापर्व है। इस वर्ष भी नागपुर की धरती पर आस्था और सेवा का अनूठा संगम देखने को मिला, जहाँ सत्संगियों ने निष्काम सेवा के संकल्प को दोहराते हुए इस उत्सव को यादगार बना दिया।
सृष्टि के कण-कण में नई ऊर्जा का संचार करने वाली वसंत पंचमी का राधास्वामी मत में गहरा ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व है। उल्लेख है कि 15 फरवरी 1861 को मत के प्रथम गुरु, परम पुरुष पूरन धनी हुज़ूर स्वामीजी महाराज ने मानवता के कल्याण के लिए सत्संग के द्वार खोले थे। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए 20 जनवरी 1915 को पंचम गुरु सर साहबजी महाराज ने दयालबाग की नींव रखी थी। वर्तमान में, परमपूज्य गुरु महाराज प्रो. प्रेम सरन सत्संगी साहब के सान्निध्य में यह संस्था आधुनिकता और आध्यात्मिकता का अद्भुत संतुलन पेश कर रही है। नागपुर शाखा में आयोजित इस कार्यक्रम का सीधा जुड़ाव दयालबाग के मुख्य केंद्र से रहा, जहाँ 580 से अधिक केंद्रों पर लाइव प्रसारण के जरिए लाखों भक्त एक सूत्र में बंधे नजर आए।
नागपुर में आयोजित इस भव्य समारोह के दौरान बच्चों, महिलाओं और पुरुषों ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों और खेलकूद प्रतियोगिताओं में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। वातावरण उस समय पूरी तरह ऊर्जावान हो उठा जब "ब्रावो-सुप्रेमल-ऑक्टेवो" और "राधास्वामी" के सामूहिक उद्घोषों ने आकाश को गुंजायमान कर दिया। यह आयोजन केवल एक धार्मिक उत्सव मात्र नहीं था, बल्कि यह दयालबाग के उस मूल आधार 'निष्काम सेवा' की जीवंत प्रस्तुति थी, जहाँ फल की इच्छा किए बिना कर्तव्य पथ पर बढ़ने की प्रेरणा दी जाती है। इस महापर्व ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि सामूहिक भक्ति और अनुशासित जीवन ही मानवीय चेतना के उत्थान का मार्ग है।

Pratahkal Bureau
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