Bose escape story from Kolkata to Peshawar : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे नाटकीय अध्यायों में से एक—नेताजी सुभाष चंद्र बोस का ब्रिटिश नजरबंदी से पलायन—आज भी इतिहास के पन्नों में रोमांच और रहस्य के साथ दर्ज है। यह केवल एक व्यक्ति का फरार होना नहीं था, बल्कि एक सटीक योजना, कई भेषों और पूर्ण गोपनीयता के सहारे अंजाम दिया गया ऐसा अभियान था, जिसने ब्रिटिश खुफिया तंत्र को असहज और शर्मिंदा कर दिया।

आधी रात की शुरुआत: मोहम्मद ज़ियाउद्दीन का भेष

इतिहासकार सौगत बोस अपनी चर्चित पुस्तक ‘हिज़ मेजेस्टीज़ अपोनेंट’ में लिखते हैं कि जनवरी 1941 की एक सर्द रात, करीब 1 बजकर 35 मिनट पर सुभाष चंद्र बोस ने अपना रूप बदला। उन्होंने वर्षों बाद सोने के रिम वाला चश्मा पहना और काबुली चप्पलों के बजाय लंबी यात्रा के लिए फ़ीतेदार चमड़े के जूते चुने।

भतीजे शिशिर कुमार बोस की वांडरर कार (नंबर BLA 7169) के पिछले सीट पर बैठकर नेताजी एल्गिन रोड स्थित अपने घर से निकल पड़े। भ्रम बनाए रखने के लिए उनके शयनकक्ष की बत्ती अगले एक घंटे तक जलती छोड़ दी गई।

कलकत्ता से गोमो तक का सफर :

जब पूरा कलकत्ता गहरी नींद में था, चाचा-भतीजे लोअर सर्कुलर रोड, सियालदह और हैरिसन रोड होते हुए हावड़ा ब्रिज पार कर चंद्रनगर और फिर आसनसोल पहुंचे।

सुबह करीब साढ़े आठ बजे, धनबाद के बरारी इलाके में, शिशिर ने नेताजी को अपने भाई अशोक के घर से कुछ दूरी पर उतारा। यहाँ सुभाष चंद्र बोस ने एक बीमा एजेंट ‘मोहम्मद ज़ियाउद्दीन’ के रूप में घर में प्रवेश किया—इतनी सहजता से कि कोई संदेह न हुआ।

रेल यात्रा और पेशावर पहुंच :

शाम को यह तय हुआ कि ज़ियाउद्दीन गोमो स्टेशन से कालका मेल पकड़ेंगे। देर रात स्टेशन पर एक कुली ने उनका सामान उठाया। कुछ ही देर में ट्रेन आगे बढ़ गई—और इसी के साथ सुभाष चंद्र बोस ब्रिटिश निगरानी से और दूर निकल गए।

दिल्ली पहुंचने के बाद उन्होंने फ्रंटियर मेल से पेशावर की राह ली। 19 जनवरी की देर शाम, पेशावर कैंट स्टेशन पर क्रांतिकारी संपर्ककर्ता मियाँ अकबर शाह उन्हें पहचान गए और सुरक्षित ठिकाने तक पहुंचाने की व्यवस्था की।

भेष बदलते नेताजी और गुप्त ठिकाने :

पेशावर में पहले डीन होटल और फिर ताजमहल होटल में ठहरने के बाद, नेताजी को अकबर शाह ने अपने सहयोगी आबाद ख़ान के घर शिफ्ट कर दिया। यहां उन्होंने ज़ियाउद्दीन का भेष त्याग कर एक बहरे पठान का रूप धारण किया—क्योंकि वे पश्तो भाषा नहीं जानते थे और संदेह से बचना आवश्यक था।

कलकत्ता में भ्रम की रणनीति :

इधर शिशिर बोस 18 जनवरी को कलकत्ता लौट आए। नेताजी की गैरमौजूदगी छिपाने के लिए एल्गिन रोड स्थित उनके कमरे में रोज खाना भेजा जाता रहा, जिसे परिवार के सदस्य खाते थे।

27 जनवरी को अदालत में नेताजी के खिलाफ मुकदमे की सुनवाई होनी थी। उसी दिन आधिकारिक रूप से बताया गया कि वे घर से गायब हैं। यह खबर पहले आनंद बाज़ार पत्रिका और हिंदुस्तान हेरल्ड में छपी, फिर रॉयटर्स के जरिए पूरी दुनिया में फैल गई।

ब्रिटिश हुकूमत की किरकिरी :

इस समाचार ने ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों को स्तब्ध कर दिया। नेताजी की योजना इतनी सफल रही कि हफ्तों तक उनके पलायन का रहस्य बना रहा। शिशिर कुमार बोस के अनुसार, परिवार ने जानबूझकर यह संकेत भी फैलाया कि सुभाष ने संन्यास ले लिया है।

यह ऐतिहासिक पलायन आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेताजी की भूमिका के लिए निर्णायक सिद्ध हुआ।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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