महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) द्वारा पूरे राज्य में खुले और फुटकर दूध की बिक्री पर तत्काल प्रभाव से लगाए गए प्रतिबंध ने डेयरी कारोबार से जुड़े लाखों लोगों के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। सरकार ने इस आदेश को मिलावट रोकने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लागू किया है, लेकिन इसका सबसे गहरा असर उन पारंपरिक दूध व्यवसायियों पर पड़ता दिखाई दे रहा है, जो वर्षों से खुले पाश्चुरीकृत दूध की आपूर्ति कर अपनी आजीविका चला रहे हैं। इस फैसले से महाराष्ट्र में दुग्ध व्यवसाय से जुड़े करीब 15 लाख लोगों की आजीविका प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। इनमें राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र से मुंबई आए करीब 2 लाख प्रवासी भी शामिल हैं, जो पीढ़ियों से मुंबई और आसपास के क्षेत्रों में दूध आपूर्ति की महत्वपूर्ण कड़ी बने हुए हैं।


दूध व्यवसाय से जुड़े संगठनों का कहना है कि यह केवल कारोबार का संकट नहीं, बल्कि एक लंबे सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास पर भी चोट है। उनका कहना है कि जब मुंबई में पैकेज्ड दूध की व्यवस्था नहीं थी, तब मेवाड़ क्षेत्र से आए प्रवासियों ने अन्य राज्यों के लोगों के साथ मिलकर साइकिलों से घर-घर ताजा दूध पहुंचाने की परंपरा शुरू की थी। आज पालीवाल, मेनारिया, आमेटा, नागदा ब्राह्मण, राजपूत, डागी पटेल, कुम्हार, गायरी, जाट और गुर्जर समाज के हजारों परिवारों की तीसरी और चौथी पीढ़ी इसी पारंपरिक व्यवसाय के माध्यम से मुंबईकरों तक दूध पहुंचा रही है। व्यवसायियों का कहना है कि बाजार में कई बड़े पैकेज्ड ब्रांड मौजूद होने के बावजूद बड़ी संख्या में उपभोक्ता आज भी खुले पाश्चुरीकृत दूध को उसकी ताजगी, शुद्धता, गुणवत्ता और अपेक्षाकृत किफायती कीमत के कारण पसंद करते हैं। उनका कहना है कि इस फैसले ने पीढ़ियों से चले आ रहे इस व्यवसाय को बंद होने की कगार पर ला खड़ा किया है।

नए नियमों के तहत दूध केवल सीलबंद और उचित लेबल वाले प्लास्टिक पैकेट में ही बेचा जा सकेगा। छोटे डेयरी संचालकों का कहना है कि बड़ी कंपनियों के लिए पैकेजिंग व्यवस्था तैयार करना आसान हो सकता है, लेकिन सीमित संसाधनों वाले छोटे कारोबारियों के लिए ऑटोमैटिक पैकेजिंग यूनिट स्थापित करना आर्थिक रूप से संभव नहीं है। उनका कहना है कि यही इस फैसले की सबसे बड़ी व्यावहारिक चुनौती है।

वर्तमान में पाश्चुरीकृत खुला दूध बाजार में लगभग 68 रुपये प्रति लीटर उपलब्ध है, जबकि तबेले का ताजा कच्चा दूध करीब 98 रुपये प्रति लीटर बिकता है। नालासोपारा में साइकिल पर दूध वितरण करने वाले राकेश रावल का कहना है कि यदि छोटे व्यवसायियों को पैकेजिंग, मशीनरी, लेबलिंग और कोल्ड चेन के सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य किया गया तो प्रति लीटर लागत में भारी वृद्धि होगी। इसका सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ेगा और दूध महंगा हो जाएगा। उनका कहना है कि ऐसे हालात में साइकिल और दुपहिया वाहनों से गली-मोहल्लों में दूध बेचने वाले छोटे व्यवसायियों के पास कारोबार बंद कर गांव लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।

सरकार ने नियमों के उल्लंघन पर 3 लाख रुपये से 10 लाख रुपये तक के जुर्माने और लाइसेंस रद्द करने का प्रावधान भी किया है। व्यवसायियों का कहना है कि इस दंडात्मक व्यवस्था के कारण मुंबई और पूरे मुंबई महानगर क्षेत्र (MMR) की सैकड़ों पारंपरिक डेयरियों ने पहले ही अपने प्रतिष्ठान बंद कर दिए हैं, जिससे वहां कार्यरत कर्मचारी बेरोजगार हो गए हैं। नए नियमों के अनुसार कच्चे दूध के कंटेनर पर 'RAW MILK' और 'उबालकर पिएं' लिखना भी अनिवार्य किया गया है।

तकनीकी आंकड़ों के अनुसार मुंबई में प्रतिदिन लगभग 50 लाख लीटर तथा पूरे एमएमआर क्षेत्र में करीब 60 लाख लीटर दूध की मांग है। व्यवसायियों का कहना है कि कुल मांग का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा आज भी खुले थोक और खुदरा विक्रेताओं के माध्यम से पूरा किया जाता है। यह दूध मुख्य रूप से कोल्हापुर, सातारा, नासिक, पुणे और सांगली से मुंबई पहुंचता है। उनका कहना है कि इस फैसले का सबसे अधिक असर मेवाड़ मूल के दूध व्यवसायियों के अलावा मिठाई की दुकानों और आइसक्रीम पार्लरों जैसे थोक उपभोक्ताओं पर पड़ेगा, क्योंकि उनके लिए खुला दूध प्रोसेस करना आसान होने के साथ पैकेट वाले दूध की तुलना में 2 से 4 रुपये प्रति लीटर तक सस्ता पड़ता है।

इस प्रतिबंध के बाद मेवाड़ समाज और दुग्ध संगठनों ने सरकार की नीति पर सवाल उठाए हैं। व्यवसायियों का कहना है कि जब मुंबई में वड़ा पाव, पाव भाजी, पानी पुरी, जूस, छाछ, लस्सी, खुली मछली, खुला आटा, खुले मसाले, खाद्य तेल और विभिन्न प्रकार की मिठाइयां खुले रूप में बिक रही हैं, तब केवल दूध विक्रेताओं के लिए ही अनिवार्य पैकेजिंग का नियम लागू करना उचित नहीं है। उनका आरोप है कि सरकार केवल छोटे दूध व्यवसायियों को निशाना बना रही है।

इस बीच मेवाड़ एकता फाउंडेशन की दूध वितरण विंग ने प्रभावित व्यवसायियों के समर्थन में मोर्चा खोल दिया है। फाउंडेशन के अध्यक्ष जिवन सिंघवी के नेतृत्व में दक्षिण मुंबई स्थित प्रसिद्ध बामण हेडा की ओरी मंदिर में आपातकालीन बैठक और जागरण का आयोजन किया गया। बैठक में बड़ी संख्या में मौजूद मेवाड़वासियों ने अपनी आजीविका बचाने के लिए संघर्ष का संकल्प लिया।

अतुल जोशी ने बताया कि बैठक में मौजूद लोगों ने स्पष्ट किया कि उनका संगठन दूध में मिलावट करने वालों और होलसेल स्तर पर हेराफेरी करने वाले असामाजिक तत्वों के खिलाफ सरकार की सख्त कार्रवाई का समर्थन करता है। उनका कहना था कि मिलावटखोरों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन उसकी आड़ में वर्षों से ईमानदारी और निष्ठा के साथ कार्य कर रहे छोटे और गरीब दुग्ध व्यवसायियों को परेशान नहीं किया जाना चाहिए। फाउंडेशन के पदाधिकारियों ने कहा कि वे अपने समाज के व्यवसायियों के हक की लड़ाई में पूरी मजबूती से साथ खड़े रहेंगे। उनका कहना है कि संगठन पहले सरकार से आवेदन और निवेदन के माध्यम से व्यावहारिक समाधान निकालने का प्रयास करेगा, लेकिन यदि आजीविका की अनदेखी की गई तो लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से तीव्र आंदोलन किया जाएगा।

संगठन के दुर्गेश जोशी ने बताया कि व्यवसायियों की प्रमुख मांग है कि एफडीए के नए नियमों को तत्काल लागू करने के बजाय छोटे कारोबारियों को तैयारी और आवश्यक बदलाव के लिए कम से कम 4 से 6 महीने का समय दिया जाए। उन्होंने कहा कि सरकार को सभी संबंधित पक्षों और दुग्ध संगठनों के साथ बैठक कर व्यावहारिक समाधान निकालना चाहिए, ताकि कारोबारियों के बीच फैले भय और असमंजस को दूर किया जा सके।

नालासोपारा में दूध डेयरी संचालित करने वाले अर्जुन जोशी ने कहा कि खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता संबंधी नियमों का पालन करने के लिए हर छोटा-बड़ा व्यवसायी तैयार है, लेकिन नई व्यवस्था लागू करते समय लाखों गरीब परिवारों की रोजी-रोटी की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

अंधेरी वर्सोवा में पिछले 30 वर्षों से दूध डेयरी संचालित कर रहे मेवाड़ के केसुली गांव निवासी राधेश्याम जोशी ने कहा कि यह स्थिति मेवाड़वासियों के लिए बेहद पीड़ादायक और चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि दूध की डेयरी चलाने वाले और साइकिल या मोटरसाइकिल से गली-गली दूध पहुंचाने वाले हजारों गरीब लोग आज भय के माहौल में जी रहे हैं। उनका कहना है कि यदि सरकार ने इस संवेदनशील विषय पर शीघ्र न्यायपूर्ण निर्णय नहीं लिया तो लाखों परिवारों की आजीविका संकट में पड़ जाएगी और पीढ़ियों से चला आ रहा उनका पुश्तैनी व्यवसाय समाप्त होने की कगार पर पहुंच जाएगा।

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मनीष पालीवाल

मनीष पालीवाल

मनिष पालीवाल, मुंबई स्थित अनुभवी पत्रकार हैं, जो सामाजिक, राजनीतिक और स्थानीय खबरों की रिपोर्टिंग में माहिर हैं। अपनी गहन जांच और सटीक रिपोर्टिंग के लिए जाने जाने वाले मनिष हमेशा ताजा और विश्वसनीय समाचार पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं। उनके लेखों में निष्पक्षता, तथ्यपरक विश्लेषण और स्थानीय घटनाओं की गहराई दिखाई देती है, जिससे पाठकों को समाचार का पूरा परिप्रेक्ष्य समझ में आता है। प्रात:काल में, मनिष पालीवाल की रिपोर्टिंग ने पाठकों के बीच विश्वास और लोकप्रियता दोनों ही अर्जित की है। मुलरुप से पालीवाल मेवाड़ नाथद्वारा क्षेत्र के केसुली गांव के निवासी है। यह दै.प्रात:काल के साथ 2003 से कार्यरत है।


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