उदयपुर। महाराणा प्रताप के छोटे भ्राता और शक्तावत वंश के संस्थापक महाराज शक्तिसिंह की 484वीं जयंती उदयपुर के सुखाड़िया रंगमंच, टाउन हॉल में भव्य समारोह के रूप में आयोजित की गई। महाराज शक्तिसिंह स्मारक समिति एवं प्रताप शक्ति सेवा संस्थान के तत्वावधान में आयोजित इस गरिमामयी समारोह में सर्व समाज की व्यापक उपस्थिति रही। समारोह की अध्यक्षता महारानी महिमा कुमारी मेवाड़ ने की, जबकि महाराणा विश्वराज सिंह मेवाड़ ने मुख्य अतिथि के रूप में कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।

समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में इतिहासकार चंद्रशेखर शर्मा, वीर रस के कवि सिद्धार्थ देवल, सोशल मीडिया विशेषज्ञ गोविंद मालवीय और चित्रकार ओमप्रकाश सोनी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में मेवाड़ के प्रमुख उमरावों, जिनमें राजराणा घनश्याम सिंह बड़ी सादड़ी, रावत महेश प्रताप सिंह कोठारिया, रावत महा सिंह बेंगू, रावत जयवर्धन सिंह आमेट, ठाकुर महिपाल सिंह लावा सरदारगढ़, रावत नरेन्द्र सिंह विजयपुर, रावत विक्रम सिंह बोहेड़ा और रावत विश्विजय सिंह लूणदा सहित रावत युग प्रदीप सिंह हमीरगढ़ की उपस्थिति विशेष रही। साथ ही शहर विधायक ताराचन्द जैन, पूर्व विधायक प्रीति गजेन्द्र शक्तावत, भाजपा शहर जिलाध्यक्ष गजपाल सिंह राठौड़, मेवाड़ क्षत्रीय महासभा के अध्यक्ष अशोक सिंह मेतवाला, पूर्व उपमहापौर महेन्द्र सिंह शेखावत, पूर्व प्रधान तखत सिंह शक्तावत, गजेन्द्र सिंह बांसी, तेज सिंह बांसी, चन्द्रभान सिंह पीपलिया और शूरवीर सिंह बोहेड़ा समेत अनेक गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।

मुख्य अतिथि महाराणा विश्वराज सिंह मेवाड़ ने अपने संबोधन में कहा कि इतिहासकारों में मतभिन्नता संभव है, परंतु यह सर्वविदित सत्य है कि महाराज शक्तिसिंह ने सदैव सच्चाई का साथ दिया और मेवाड़ के हितों के लिए अडिग रहे। उन्होंने कहा कि जयंती मनाने की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब हम उनके महान व्यक्तित्व से प्रेरणा ग्रहण करें।





इतिहासकार चंद्रशेखर शर्मा ने महाराज शक्तिसिंह के योगदान के पुनर्मूल्यांकन पर जोर देते हुए कहा कि स्वतंत्र चेता होने के बावजूद वे कुल गौरव की रक्षा के लिए सदैव सावचेत रहे। हल्दीघाटी युद्ध के निर्णायक पलों में उनके कर्तव्य निर्वहन ने महाराणा प्रताप के संघर्ष को निष्कंटक बनाया। वेनगढ़ और भैंसरोड़गढ़ को मुगल आधिपत्य से मुक्त कराकर उन्होंने मेवाड़ की सुरक्षा मजबूत की। उन्होंने स्पष्ट किया कि साहित्य में उनके योगदान को लेकर व्याप्त भ्रांतियां तथ्यहीन हैं; शक्तिसिंह त्यागी और स्वदेश प्रेम के प्रतिमूर्ति थे। चित्तौड़ युद्ध की गुरिल्ला रणनीति में उनकी सूचनाएं मेवाड़ राजवंश के लिए सुरक्षा का आधार बनीं।

वीर रस के कवि सिद्धार्थ देवल ने अपनी कविता—"अपने राणा उदय सिंह का मान नहीं तोड़ा मैंने, मैं गया कहीं पर मेवाड़ी गुणगान नहीं छोड़ा मैंने..." के माध्यम से वातावरण में जोश भर दिया। वहीं, युवा इतिहासकार गोविन्द मालवीय ने कहा कि शक्तिसिंह 'ध्वनि युद्ध' और 'गुरिल्ला वारफेयर' जैसी सैन्य तकनीकों के ज्ञाता थे। हल्दीघाटी में उनका त्याग आज भी एकजुटता का बड़ा संदेश है।

समारोह के दौरान शिक्षा, खेलकूद और राजकीय सेवा सहित विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाली समाज की 35 प्रतिभाओं को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में चित्रकार ओमप्रकाश सोनी द्वारा निर्मित महाराज शक्तिसिंह की कृति का अनावरण किया गया। संस्थान के पदाधिकारियों ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि हनुमान सिंह बारहठ ने स्वरचित गीत प्रस्तुत किया। स्वागत उद्बोधन महाराज रणधीर सिंह भीण्डर ने दिया और आभार ऋतुराज सिंह ओछड़ी ने व्यक्त किया। मंच का सफल संचालन अरविन्द सिंह खोड़ियाखेड़ा एवं दिलीप सिंह रुद ने किया।

Pratahkal Newsroom

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