इतिहास का सबसे बड़ा 'छलावा' जब जासूसों की फौज के बीच से निकले थे नेताजी ; जाने क्या है वो अनसुनी कहानी ..
इतिहास का सबसे रोमांचक पलायन! जानें कैसे 1941 की आधी रात को नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजों के कड़े पहरे और जासूसों की आंखों में धूल झोंककर कलकत्ता से फरार हुए। भतीजे शिशिर बोस के साथ 'मोहम्मद जियाउद्दीन' बनकर वांडरर कार में शुरू हुआ 'द ग्रेट एस्केप' जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी। पढ़िए पूरी कहानी।

Netaji Subhash Chandra Bose : यह साल 1940 का दौर था, जब द्वितीय विश्व युद्ध की आग में पूरी दुनिया जल रही थी। हिटलर के बमवर्षक लंदन पर कहर बरपा रहे थे, तो दूसरी ओर भारत में ब्रिटिश हुकूमत अपने सबसे बड़े और प्रखर दुश्मन सुभाष चंद्र बोस को कुचलने की कोशिश में जुटी थी। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। 38/2 एल्गिन रोड स्थित बोस के आवास से शुरू हुई वह कहानी, जिसे आज 'द ग्रेट एस्केप' के नाम से जाना जाता है, भारतीय स्वाधीनता संग्राम का सबसे रोमांचक अध्याय है।
जेल की सलाखों से घर की नजरबंदी तक :
ब्रिटिश सरकार ने 2 जुलाई, 1940 को राजद्रोह के आरोप में सुभाष चंद्र बोस को प्रेसिडेंसी जेल में डाल दिया था। जेल के भीतर बोस ने ऐतिहासिक भूख हड़ताल शुरू कर दी। एक सप्ताह बीतते-बीतते उनकी सेहत बिगड़ने लगी। तत्कालीन गवर्नर जॉन हरबर्ट डरे हुए थे कि यदि जेल में बोस को कुछ हुआ, तो पूरे देश में विद्रोह की ज्वाला भड़क उठेगी। अंततः 5 दिसंबर को एक एंबुलेंस के जरिए उन्हें उनके घर भेज दिया गया, लेकिन बाहर सादे कपड़ों में पुलिस का ऐसा पहरा बिठाया गया कि परिंदा भी पर न मार सके।
षड्यंत्र और तैयारी: 'क्या तुम मेरा एक काम करोगे?'
घर के भीतर जासूस 'एजेंट 207' उनकी हर हरकत पर नजर रख रहा था। इसी बीच, बोस ने अपने 20 वर्षीय भतीजे शिशिर कुमार बोस को अपने पास बुलाया। शिशिर के हाथ को अपने हाथ में थामकर बोस ने धीमे स्वर में पूछा— "आमार एकटा काज कौरते पारबे?" (क्या तुम मेरा एक काम करोगे?)। यहीं से शुरू हुई भारत से गुप्त रूप से बाहर निकलने की वो अभूतपूर्व योजना।
पलायन के लिए संसाधनों का चुनाव बेहद सावधानी से किया गया:
- वाहन का चुनाव: अमेरिकी 'स्टूडबेकर प्रेसिडेंट' कार बड़ी और ध्यान आकर्षित करने वाली थी, इसलिए यात्रा के लिए साधारण दिखने वाली जर्मन 'वांडरर' कार को चुना गया।
- भेष बदलना: मोहम्मद जियाउद्दीन के रूप में एक नई पहचान गढ़ी गई। इसके लिए ढीली सलवारें, एक फैज़ टोपी और विज़िटिंग कार्ड छपवाए गए, जिस पर उन्हें 'ट्रैवलिंग इंस्पेक्टर' बताया गया था।
- गोपनीयता: योजना को इतना गुप्त रखा गया कि नेताजी की अपनी माँ को भी इसकी भनक नहीं लगने दी गई। यहाँ तक कि पुराने सूटकेस पर लिखे नाम 'SCB' को मिटाकर स्याही से 'MZ' (मोहम्मद जियाउद्दीन) कर दिया गया।
वह ऐतिहासिक रात: 16 जनवरी 1941
रात का सन्नाटा गहरा रहा था। पुलिस के पहरेदार बाहर मुस्तैद थे। घर के भीतर सदस्य जाग रहे थे, जिसके कारण निकलने में थोड़ी देरी हुई। लेकिन जैसे ही मौका मिला, मोहम्मद जियाउद्दीन के भेष में सुभाष चंद्र बोस, शिशिर के साथ वांडरर कार में बैठकर मुख्य द्वार से बाहर निकल गए। ब्रिटिश जासूसों को लगा कि कोई साधारण अतिथि जा रहा है, जबकि उस कार में भारत की आजादी का 'महानायक' सरहदें पार करने निकल पड़ा था।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
