यूजीसी नियमों के खिलाफ चित्तौड़गढ़ में विप्र फाउंडेशन का प्रदर्शन
विप्र फाउंडेशन और सवर्ण संगठनों ने यूजीसी की नई अधिसूचना को समानता के अधिकार के विरुद्ध बताते हुए प्रधानमंत्री के नाम उपजिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा।

चित्तौड़गढ़ में यूजीसी नियमों को वापस लेने की मांग को लेकर उपजिला कलेक्टर प्रभा गौतम को ज्ञापन सौंपते विप्र फाउंडेशन और सवर्ण संगठनों के पदाधिकारी।
चित्तौड़गढ़। विप्र फाउंडेशन चित्तौड़गढ़ व स्वर्ण संगठनों के पदाधिकारियों ने यूजीसी नियमों के खिलाफ उपजिला कलेक्टर प्रभा गौतम को प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन देते हुए तत्काल प्रभाव से वापस नहीं लेने पर बड़े आंदोलन की चेतावनी दी।
यूजीसी अधिसूचना और विरोध का मुख्य कारण
प्रदेश सचिव सत्यनारायण ओझा, चंद्र सिंह शेखावत व हिमांशु मंगल के नेतृत्व में दिए ज्ञापन में पदाधिकारियों ने बताया कि “विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जनवरी में जारी की गई यूजीसी विज्ञप्ति जिसे 13 जनवरी को भारत के राजपत्र में अधिसूचित कर तत्काल प्रभाव से लागू किया गया जो अत्यंत गंभीर, संवैधानिक, विधिक एवं सामाजिक प्रश्न उत्पन्न करती है।” यह अधिसूचना उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से लाई गई बताई जा रही है जिसके अंतर्गत:
- सभी विश्वविद्यालयों एवं उच्च शिक्षा संस्थानों में 90 दिनों के भीतर इक्विटी कमेटियों का गठन का प्रावधान किया गया हैं।
- इन कमेटियों को शिकायतों की जांच का व्यापक अधिकार प्रदान किया गया हैं।
विप्र फाउंडेशन एवं सभी सवर्ण समाज व संगठनों का यह स्पष्ट एवं दृढ़ मत है कि उक्त अधिसूचना भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के मूल अधिकारों विशेषतः अनुच्छेद 14, 15 एवं 21 की भावना के अनुरूप नहीं हैं।
सामाजिक समरसता और संवैधानिक अधिकारों पर प्रभाव
पदाधिकारियों का तर्क है कि “वास्तव में ये कानून सामाजिक समरसता को समाप्त करने वाला एवं चुगली संस्कृति को बढ़ावा देने वाला है।” संविधान सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता हैं लेकिन यह अधिसूचना समानता की समग्र अवधारणा को स्थापित करने के स्थान पर केवल कुछ वर्गों के अधिकारों पर केंद्रित प्रतीत होती हैं, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों के अधिकारों एवं संवैधानिक संरक्षण को पूर्णतः नजर अंदाज किया गया हैं।
अधिसूचना में एकतरफा दृष्टिकोण अपनाते हुए समान अवसर के सिद्धांत को कमजोर करना बताया जो कि संविधान की मूल संरचना का अभिन्न अंग हैं। किसी भी विधिक प्रावधान का उद्देश्य सभी वर्गों के लिए संतुलित न्याय सुनिश्चित करना होना चाहिए, न कि किसी एक वर्ग के पक्ष में असंतुलन उत्पन्न करना। झूठी अथवा दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर किसी भी प्रकार के दंडात्मक प्रावधान के अभाव को लेकर व्यापक विवाद उत्पन्न हुआ था।
राष्ट्रीय प्रभाव और विप्र फाउंडेशन की मांग
ज्ञापन में बताया गया कि उत्तरप्रदेश सहित देश के अनेक राज्यों में यह अधिसूचना विश्वविद्यालयों पर लागू की जा चुकी है, जिसके परिणामस्वरूप शैक्षणिक परिसरों में भय, असंतोष एवं वैचारिक असंतुलन का वातावरण बन रहा है, जो शिक्षा के स्वास्थ्य एवं निष्पक्ष वातावरण के प्रतिकूल हैं।
- भारत की अनुमानित जनसंख्या लगभग 140 करोड़ है, जिसमें से लगभग एक तिहाई जनसंख्या सामान्य वर्ग की है।
- इस प्रकार की अधिसूचनाएँ सामान्य वर्ग के करोड़ों छात्रों एवं नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं जो सामाजिक समरसता एवं राष्ट्रीय एकता के लिए घातक हो सकता हैं।
- देश की आधारभूत संरचनाओं, विकास, सुशासन, शिक्षा, उद्योग एवं राजस्व सृजन में सामान्य वर्ग का योगदान ऐतिहासिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण एवं अग्रणी है।
विप्र फाउण्डेशन ने मांग करते हुए यूजीसी को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाने तथा सभी वर्गों के छात्रों के अधिकारों को समान रूप से ध्यान में रखते हुए एक निष्पक्ष, संतुलित एवं संविधानसम्मत नीति का निर्माण किया जाने की अपेक्षा की। पदाधिकारियों ने कहा कि “इस गंभीर एवं संवेदनशील विषय पर शीघ्र संज्ञान लेते हुए सामाजिक समरसता हेतु न्यायोचित एवं राष्ट्रहित में निर्णय प्रदान करना सभी की लिए हितकारी होगा।”

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