चित्तौड़गढ़ में बसंत पंचमी पर गूंजे वेद मंत्र: गायत्री शक्तिपीठ में भक्ति और संस्कारों का अनूठा संगम
चित्तौड़गढ़ के गायत्री शक्तिपीठ में बसंत पंचमी पर भव्य पंच कुंडीय गायत्री महायज्ञ और निःशुल्क संस्कार महोत्सव का आयोजन किया गया। पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के जन्मदिवस पर विद्यारंभ, अन्नप्राशन और पुंसवन जैसे संस्कारों के साथ वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सैकड़ों श्रद्धालुओं ने दी आहुतियां। अध्यात्म और संस्कार की इस अनूठी कवरेज को विस्तार से पढ़ें।

चित्तौड़गढ़। मेवाड़ की पावन धरा पर विद्या की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती का प्राकट्य उत्सव 'बसंत पंचमी' अध्यात्म और सेवा के एक नए संकल्प के साथ मनाया गया। शहर के गायत्री शक्तिपीठ में शुक्रवार को उमड़ा श्रद्धालुओं का जनसैलाब और पंच कुंडीय गायत्री महायज्ञ से उठती दिव्य लपटें साक्षात् सतयुग के आगमन का आभास करा रही थीं। युग निर्माण योजना के प्रणेता परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के आध्यात्मिक जन्मदिवस के इस विशेष अवसर पर पूरा परिसर 'वेद माता' के जयकारों और वैदिक मंत्रोच्चार से गुंजायमान हो उठा, जिसने चित्तौड़गढ़ के धार्मिक वातावरण में एक नई चेतना का संचार कर दिया।
समारोह का शुभारंभ पंच कुंडीय गायत्री महायज्ञ के साथ हुआ, जहाँ पीत वस्त्रों में सजे श्रद्धालुओं ने अपनी बुराइयों की आहुति देते हुए 'इदं न मम' (यह मेरा नहीं, राष्ट्र और समाज का है) के उदात्त भाव को चरितार्थ किया। आयोजन का सबसे मर्मस्पर्शी पक्ष 'निःशुल्क संस्कार महोत्सव' रहा, जहाँ गुरुदेव की सूक्ष्म उपस्थिति में जीवन के विभिन्न पड़ावों को शास्त्रीय मर्यादाओं के साथ जोड़ा गया। शिक्षा की शुरुआत करने वाले दस नन्हे बालकों को जब पहली बार स्लेट और चौक थमाकर गायत्री मंत्र की दीक्षा दी गई, तो उपस्थित जनसमूह भावुक हो उठा। विद्यारंभ के इन संस्कारों के साथ ही एक बालक का अन्नप्राशन संस्कार संपन्न हुआ, जबकि एक गर्भवती माता के पुंसवन संस्कार के माध्यम से आने वाली पीढ़ी के उज्जवल और संस्कारवान भविष्य की नींव रखी गई।
अध्यात्म की इस सरिता में केवल नवजात ही नहीं, बल्कि गृहस्थ और साधकों ने भी डुबकी लगाई। जहाँ एक साधक ने गुरुदेव के संरक्षण में दीक्षित होकर आत्म-कल्याण के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया, वहीं एक दंपत्ति ने अपनी वैवाहिक वर्षगांठ और एक अन्य श्रद्धालु ने अपना जन्मदिवस यज्ञ की वेदी के समक्ष सादगी और शुचिता के साथ मनाया। गायत्री परिवार के वरिष्ठ परिजनों ने इस अवसर पर बसंत पंचमी को चेतना के जागरण का पर्व बताते हुए स्पष्ट किया कि गुरुदेव के विचारों के अनुरूप 'मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण' ही इन आयोजनों की मूल आत्मा है।
इस भव्य आयोजन की सफलता में महिला प्रकोष्ठ और युवा मंडल के कार्यकर्ताओं की कर्तव्यनिष्ठा का विशेष योगदान रहा, जिन्होंने व्यवस्थाओं से लेकर महाप्रसादी के वितरण तक हर मोर्चे पर अपनी सेवाएँ समर्पित कीं। कार्यक्रम के अंत में नगरवासियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए गायत्री परिवार ने इस आयोजन को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज के नैतिक उत्थान का एक सशक्त माध्यम बताया। यज्ञ की पूर्णाहुति और आरती के पश्चात श्रद्धालुओं ने महाप्रसाद ग्रहण किया, जिससे यह उत्सव सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक तृप्ति के साथ संपन्न हुआ।

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